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Last Modified: सोमवार, 8 जून 2026 (18:48 IST)

जंगल का वह 'उलगुलान' जो आज भी गूंजता है: धरती आबा बिरसा मुंडा की शहादत की अनकही दास्तान

birsa munda shahid diwas
Birsa Munda History: इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे दर्ज होते हैं, जो वक्त की छोटी सी लकीर पर भी अपनी वीरता के अमिट निशान छोड़ जाते हैं। एक ऐसा ही नाम है- बिरसा मुंडा। जिन्हें आदिवासी समाज और देश आज भी आदर से 'धरती आबा' यानी पृथ्वी का पिता कहता है। 15 नवंबर को देश उनकी जयंती मनाता है, तो 9 जून का दिन उस महानायक की शहादत को नमन करने का है, जिसने महज 25 साल की उम्र में फिरंगी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। आइए जानते हैं, जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने वाला वह युवा कैसे अमर शहीद बन गया।
 

जब बचपन के अनुभवों ने बोए क्रांति के बीज

झारखंड के उलीहातु गांव में 15 नवंबर 1875 को जन्मे बिरसा मुंडा का बचपन कोई आम बचपन नहीं था। उन्होंने होश संभालते ही अपने समाज पर अंग्रेजों का जुल्म, जमींदारों का शोषण और जंगलों को छीनने की साजिशें देखीं। शुरुआती पढ़ाई के लिए वे जर्मन मिशन स्कूल भी गए, लेकिन वहां उन्होंने एक गहरी साजिश को भांप लिया। उन्हें समझ आ गया कि अंग्रेजों का असली मकसद आदिवासियों की संस्कृति को नष्ट करना और धर्मांतरण के जरिए देश को हमेशा के लिए गुलाम बनाए रखना है। बस, यहीं से उनके भीतर अपनी अस्मिता और परंपराओं को बचाने की जिद ने जनम लिया।
 

'बिरसाइत' का उदय और सामाजिक चेतना का शंखनाद

अंग्रेजों से सीधे टकराने से पहले बिरसा मुंडा ने अपने समाज को अंदर से मजबूत करने का बीड़ा उठाया। 1895 में उन्होंने 'बिरसाइत' नामक एक नई सामाजिक व्यवस्था की शुरुआत की। उन्होंने अंधविश्वास, नशाखोरी और कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने आदिवासियों को अपनी मूल संस्कृति और प्रकृति पूजा की अहमियत समझाई। नतीजा यह हुआ कि बिखरा हुआ मुंडा और ओरांव समुदाय एक ताकतवर मुट्ठी में तब्दील हो गया।
 

'उलगुलान' यानी वो महाविद्रोह, जिससे कांप उठी ब्रिटिश हुकूमत

यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं, बल्कि जल, जंगल और जमीन पर अपने हक का महादावा था, जिसे 'उलगुलान' कहा गया। बिरसा मुंडा के एक आह्वान पर हजारों तीर-कमान तीरंदाजों के हाथ में सज गए।
 
इस लड़ाई का सबसे खौफनाक और अंतिम अध्याय 9 जनवरी 1900 को रांची के पास डोंबारी बुरू पहाड़ी पर लिखा गया। एक तरफ आधुनिक हथियारों से लैस ब्रिटिश सेना थी और दूसरी तरफ अपनी जमीन के लिए मरने-मारने को तैयार आदिवासी। अंग्रेजों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। सैकड़ों आदिवासी शहीद हुए और तजना नदी का पानी अपनों के खून से लाल हो गया। इस भीषण नरसंहार के बाद भी फिरंगी सेना बिरसा मुंडा को पकड़ नहीं पाई।
 

गद्दारी का डंक और जेल का वो रहस्यमयी सन्नाटा

बिरसा मुंडा का खौफ अंग्रेजों के सिर चढ़कर बोल रहा था। उन्हें पकड़ने के लिए उस दौर में ₹500 का भारी-भरकम इनाम रखा गया था। आखिरकार, इतिहास की वही पुरानी कमजोरी आड़े आई—अपनों की गद्दारी। कुछ मुखबिरों के विश्वासघात के कारण 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर के जामकोपाई जंगल से सोते हुए इस शेर को गिरफ्तार कर लिया गया।
 
उन्हें रांची जेल की काल कोठरी में डाल दिया गया। इसके बाद आया 9 जून 1900 का वो काला दिन, जब महज 25 साल की अल्पायु में बिरसा मुंडा ने अंतिम सांस ली। ब्रिटिश हुकूमत ने दुनिया को दिखाने के लिए मौत का कारण 'हैजा' बता दिया, लेकिन इतिहासकार और आदिवासी समाज आज भी यही मानता है कि अंग्रेजों ने उन्हें जेल में धीमा जहर देकर मारा था, क्योंकि वे उनके जिंदा रहने के अंजाम से डरते थे।
 
आज का संदेश: बिरसा मुंडा भले ही शारीरिक रूप से चले गए, लेकिन उनकी शहादत आज भी हर उस इंसान के भीतर मशाल बनकर जलती है, जो अपनी संस्कृति, अपनी जमीन और अपने अधिकारों के लिए सीना तानकर खड़ा होता है। जो मुंडा उलगुलान की गर्जना सदियों पहले गूंजी थी, उसकी गूंज आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक स्वर्णिम अध्याय है।
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वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
पौराणिक कथा, इतिहास, धर्म और दर्शन के जानकार, अनुभवी ज्योतिष, लेखक और विषय-विशेषज्ञों द्वारा लिखे गए आलेखों का प्रकाशन किया जाता है।.... और पढ़ें