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धार की भोजशाला से मौलाना कमाल मस्जिद तक: जानिए इतिहास में कब और कैसे हुआ बदलाव

dhar bhojshala
धार भोजशाला को लेकर मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला परिसर मंदिर ही है। मस्जिद पक्ष को अलग जमीन दी जाएगी। इसके लिए मस्जिद पक्ष सरकार से याचिका करें। इस संदर्भ में जानिए कि कैसे राजा भोज की नगरी पर हुआ मुस्लिम आक्रांताओं का आक्रमण और कैसे इसे मस्जिद में बदल दिया गया। 

1. भोजशाला का स्वर्णिम काल: ज्ञान और कला का केंद्र

स्थापना: सन् 1034 में कला प्रेमी राजा भोज ने धार में माँ सरस्वती (वाग्देवी) के इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।
सांस्कृतिक महत्व: यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक महान विश्वविद्यालय था जहाँ वैश्विक स्तर पर संस्कृत, दर्शन, ज्योतिष और वास्तु की शिक्षा दी जाती थी।
ऐतिहासिक वैभव: राजा भोज के शासन में धार नगरी 'संस्कृति' और 'संस्कृत' का वैश्विक केंद्र मानी जाती थी।

2. स्थापत्य और साहित्यिक विशिष्टता

वास्तुकला: भोजशाला की बनावट तत्कालीन स्थापत्य कला का श्रेष्ठ उदाहरण है, जिसमें नक्काशीदार स्तंभ और कलात्मक छतें प्रमुख हैं।
शिलालेखों पर साहित्य: यहाँ काले पत्थर के शिलालेखों पर 'पारिजातमंजरी' (राजगुरु मदन द्वारा रचित) जैसे क्लासिकी संस्कृत नाटक खुदे हुए हैं।
दुर्लभ वर्णमाला: यहाँ के खंभों पर धातु प्रत्यय माला और वर्णमाला उकेरी गई है, जो इसे दुनिया का एक दुर्लभ 'साहित्यिक स्मारक' बनाती है।

3. विनाश का कालक्रम: मंदिर से मस्जिद का सफर

प्रथम हमला (1305): इतिहासकार शिवकुमार गोयल के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी ने इस भव्य केंद्र को पहली बार निशाना बनाया और क्षति पहुँचाई।
आंशिक परिवर्तन (1401): दिलावर खां गौरी ने मंदिर के एक ध्वस्त भाग पर मस्जिद का निर्माण कराया।
पूर्ण परिवर्तन (1514): महमूद शाह खिलजी के शासनकाल में परिसर के शेष भाग को भी मस्जिद के स्वरूप में बदल दिया गया।

4. मौलाना कमाल: परिचय और विवाद

कौन थे मौलाना: इनका पूरा नाम हजरत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती था। वे प्रसिद्ध सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
आगमन: वे 13वीं-14वीं शताब्दी के दौरान दिल्ली से मालवा (धार) आए थे और यहाँ सूफी मत का प्रचार किया।
विवादास्पद मत: कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्हें मुगलों का जासूस भी माना जाता है।
नामकरण: उनकी मृत्यु के बाद, उनके सम्मान में परिसर के पास मकबरा बनाया गया और खिलजी शासकों ने इस स्थान का नाम 'कमाल मौला मस्जिद' रख दिया।
 

5. वाग्देवी की प्रतिमा: लंदन में कैद विरासत

खुदाई और चोरी: सन् 1875 की खुदाई में यहाँ माँ सरस्वती की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा निकली थी।
विदेशी म्यूजियम: मेजर किनकेड नाम का एक अंग्रेज अधिकारी इस प्रतिमा को लंदन ले गया, जो वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय में रखी है।
वापसी की मांग: वर्तमान में न्यायालय में चल रही याचिकाओं में इस प्रतिमा को भारत वापस लाने की पुरजोर मांग की गई है।
 

6. वर्तमान स्थिति और पूजन व्यवस्था (2026 से पूर्व की स्थिति)

ASI का संरक्षण: वर्तमान में यह परिसर केंद्रीय पुरातत्व विभाग (ASI) के अधीन है।
पूजा और नमाज: पुरानी व्यवस्था के अनुसार, मंगलवार को हिंदू समाज को पूजा/अर्चना और शुक्रवार को मुस्लिम समाज को नमाज की अनुमति दी गई थी।
विशेष अवसर: बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती के तैलचित्र की विशेष पूजा का विधान आज भी निभाया जाता है।
 

7. धार यात्रा मार्गदर्शिका (ट्रैवल गाइड)

सड़क मार्ग: इंदौर से धार की दूरी मात्र 60 किमी है, जहाँ के लिए हर 15 मिनट में बसें उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग: निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन रतलाम जंक्शन (92 किमी) है।
स्थानीय पहुंच: धार बस स्टैंड से भोजशाला तक पैदल या ऑटो के माध्यम से आसानी से पहुँचा जा सकता है। मांडू जाने वाले पर्यटकों के लिए यह एक अनिवार्य पड़ाव है।
 
भोजशाला भारत की उस समृद्ध विरासत का प्रतीक है जिसने दुनिया को ज्ञान और विज्ञान का प्रकाश दिया। यह राजा भोज की वह अमर कृति है जो आज भी अपने अस्तित्व और न्याय की प्रतीक्षा कर रही है। हालांकि भले ही हाई कोर्ट का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आया हो लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट की लड़ाई बाकी है।

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लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें