उपनिषदों के पांच वचन


अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
हिन्दुओं का धर्मग्रंथ है वेद। वेद के 4 भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। चारों के अंतिम भाग या तत्वज्ञान को वेदांत और कहते हैं। उपनिषदों की संख्या लगभग 1,000 बताई गई है। उसमें भी 108 महत्वपूर्ण हैं। ये उपनिषद छोटे-छोटे होते हैं। लगभग 5-6 पन्नों के।
 
> > इन उपनिषदों का सार या निचोड़ है भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कही गई गीता। इतिहास ग्रंथ महाभारत को पंचम वेद माना गया है। वाल्मीकि रामायण और 18 पुराणों को भी इतिहास ग्रंथों की श्रेणी में रखा गया है।
 
।।प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं।तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।
 
अर्थ : जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा?
 
उपनिषदों को जिसने भी पढ़ा और समझा, यह मानकर चलिए कि उसका जीवन बदल गया। उसकी सोच बदल गई। उपनिषदों से ऊपर कुछ भी नहीं। दुनिया का संपूर्ण दर्शन, विज्ञान और धर्म उपनिषदों में समाया हुआ है। आओ हम जानते हैं उपनिषदों के उन 5 वचनों को जिसे हर मनुष्य को याद रखना चाहिए।
 
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