क्या साईं बाबा मुस्लिम फकीर थे?

sai baba
अगर शंकराचार्य की बातों पर यकीन करें तो सवाल यही उठता है कि फिर साईं बाबा कौन हैं? साईं कहां से आए और कैसे बने भक्तों के साईं बाबा जिनके एक दर्शन पाकर भक्त अपना जीवन धन्य मानने लगते हैं। यदि शंकराचार्य ने साईं को मुसलमान फकीर कहा है। खुद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहाकि साईं मांसाहारी था, लोगों के खतना करवाता था, पिंडारी समाज की औलाद था जो लुटेरा समाज था। ऐसे में वह हमारा आदर्श नहीं हो सकता। क्या शंकराचार्य ने ऐसे ही हवा में बात कह दी? बगैर किसी तथ्‍यों के? यदि नहीं, तो क्या है इसके पीछे के तथ्‍य?
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साईं बाबा के बारे में बहुत भ्रम फैला है। वे हिन्दू थे या मुसलमान? क्या वे कबीर, नामदेव, पांडुरंग आदि के अवतार थे। कुछ लोग कहते हैं कि वे शिव के अंश हैं और कुछ को उनमें दत्तात्रेय का अंश नजर आता है। अन्य लोग कहते हैं कि वे अक्कलकोट महाराज के अंश हैं। इसके विपरीत अब लोग मानने लगे हैं कि वे यवन देश के एक मुस्लिम फकीर थे। क्या सचमुच ऐसा था? जरूर है कि हम अपने संतों पर सवाल उठाएं, जो सोना होगा वह आग में तपकर और कुंदन हो जाएगा।> > यदि हम आचार्य चतुरसेन का उपन्यास 'सोमनाथ' पढ़ें तो पता चलता है कि मुगल और अंग्रेजों के शासनकाल में ऐसा अक्सर होता था कि जासूसी या हिन्दू क्षेत्र की रैकी करने के लिए सूफी संतों के भेष में फकीरों की टोली को भेजा जाता था, जो गांव या शहर के बाहर डेरा डाल देती थी। इनका काम था सीमा पर डेरा डाल कर वहां के लोगों और राजाओं की ताकत का अंदाजा लगाना और प्रजा में विद्रोह भड़काना।
अक्सर सूफी संतों की मजार आपको शहर या गांव की सीमा पर मिलेगी, क्योंकि सीमा पर से टोह लेने में आसानी भी होती और खतरा भी नहीं रहता था। चूंकि हिन्दुओं के मन में प्राचीनकाल से संतों के प्रति श्रद्धा और विश्वास सिखाया गया है, तो वे किसी भी संत पर सवाल नहीं उठाते और उसे संदेह की दृष्टि से नहीं देखते थे। खासकर गांव की भोली-भाली जनता तो संतों की तरह कपड़े पहने लोगों पर सहज ही विश्‍वास कर उसके चरणों में झुक जाती है। ये कथित संत आजीवन यहीं रहकर एक तरह जासूसी का कार्य करते तो दूसरी ओर धर्म का काम।

साईं के विरोधी और कट्टर हिन्दुओं का तर्क है कि ऐसे कई सूफी संत हुए हैं जिन्होंने राम-कृष्ण की भक्ति के माध्यम से हिन्दुओं को धीरे-धीरे इस्लाम के प्रति श्रद्धावान बनाया और अंतत: उन्हें इस्लाम की ओर मोड़ दिया। आज भी ऐसे कई संत सक्रिय हैं। साईं बाबा भी इसी साजिश का एक हिस्सा है।

साईं के बारे में ऐसे लोगों का तर्क है कि साई अपना ज्यादातर वक्त मुस्लिम फकीरों के संग बिताते थे। वे कुछ महीनों तक अजमेर में भी रहे थे। साई पूर्णत: एक मुस्लिम फकीर थे और मुसलमानों की तरह ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन-यापन किया। आओ जानते हैं कि साईं विरोधियों का साईं के बारे में क्या है तर्क...

1. 'साई' शब्द फारसी का है जिसका अर्थ होता है 'संत'। उस काल में आमतौर पर भारत के पाकिस्तानी हिस्से में मुस्लिम संन्यासियों के लिए इस शब्द का प्रयोग होता था। शिर्डी में साईं सबसे पहले जिस मंदिर के बाहर आकर रुके थे उसके पुजारी ने उन्हें साईं कहकर ही संबोधित किया था। मंदिर के पुजारी को वे मुस्लिम फकीर ही नजर आए तभी तो उन्होंने उन्हें साईं कहकर पुकारा।

2. साईं ने यह कभी नहीं कहा कि 'सबका मालिक एक'। साईं सच्चरित्र के अध्याय 4, 5, 7 में इस बात का उल्लेख है कि वे जीवनभर सिर्फ 'अल्लाह मालिक है' यही बोलते रहे। कुछ लोगों ने उनको हिन्दू संत बनाने के लिए यह झूठ प्रचारित किया कि वे 'सबका मालिक एक है' भी बोलते थे। यदि वे एकता की बात करते थे, तो कभी यह क्यों नहीं कहा कि 'राम मालिक है' या 'भगवान मालिक है।'

3. कोई हिन्दू संत सिर पर कफन जैसा नहीं बांधता, ऐसा सिर्फ मुस्लिम फकीर ही बांधते हैं। जो पहनावा साईं का था, वह एक मुस्लिम फकीर का ही हो सकता है। हिन्दू धर्म में सिर पर सफेद कफन जैसा बांधना वर्जित है या तो जटा रखी जाती है या किसी भी प्रकार से सिर पर बाल नहीं होते।

4. साईं बाबा ने रहने के लिए मस्जिद का ही चयन क्यों किया? वहां और भी स्थान थे, लेकिन वे जिंदगीभर मस्जिद में ही रहे। मस्जिद के अलावा भी तो शिर्डी में कई और स्थान थे, जहां वे रह सकते थे। मस्जिद ही क्यों? भले ही मंदिर में न रहते, तो नीम के वृक्ष के नीचे एक कुटिया ही बना लेते। उनके भक्त तो इसमें उनकी मदद कर ही देते।

5. साईं सच्चरित्र के अनुसार साईं बाबा पूजा-पाठ, ध्यान, प्राणायाम और योग के बारे में लोगों से कहते थे कि इसे करने की कोई जरूरत नहीं है। उनके इस प्रवचन से पता चलता है कि वे हिन्दू धर्म विरोधी थे। साईं बाबा का मिशन था- लोगों में एकेश्वरवाद के प्रति विश्वास पैदा करना। उन्हें कर्मकांड, ज्योतिष आदि से दूर रखना।

6. मस्जिद से बर्तन मंगवाकर वे मौलवी से फातिहा पढ़ने के लिए कहते थे। इसके बाद ही भोजन की शुरुआत होती थी। उन्होंने कभी भी मस्जिद में गीता पाठ नहीं करवाया या भोजन कराने के पूर्व 'श्रीगणेश करो' ऐसा भी नहीं कहा। यदि वे हिन्दू-मुस्लिम एकता की बात करते थे तो फिर दोनों ही धर्मों का सम्मान करना चाहिए था।

7. साईं को सभी यवन मानते थे। वे हिन्दुस्तान के नहीं, अफगानिस्तान के थे इसीलिए लोग उन्हें यवन का मुसलमान कहते थे। उनकी कद-काठी और डील-डौल यवनी ही था। साईं सच्चरित्र के अनुसार एक बार साईं ने इसका जिक्र भी किया था। जो भी लोग उनसे मिलने जाते थे उन्हें मुस्लिम फकीर ही मानते थे, लेकिन उनके सिर पर लगे चंदन को देखकर लोग भ्रमित हो जाते थे।

8. बाबा कोई धूनी नहीं रमाते थे जैसा कि नाथ पंथ के लोग करते हैं। ठंड से बचने के लिए बाबा एक स्थान पर लड़की इकट्ठी करके आग जलाते थे। उनके इस आग जलाने को लोगों ने धूनी रमाना समझा। चूंकि बाबा के पास जाने वाले लोग चाहते थे कि बाबा हमें कुछ न कुछ दे तो वे धूनी की राख को ही लोगों को प्रसाद के रूप में दे देते थे। यदि प्रसाद देना ही होता था तो वे अपने भक्तों को मांस मिला हुआ नमकीन चावल देते थे।

9. आजकल साईं बाबा को पुस्तकों और लेखों के माध्यम से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने की कहानी को प्रचारित किया जा रहा है। क्या कोई ब्राह्मण मस्जिद में रहना पसंद करेगा?

10. साईं के समय दो बार अकाल पड़ा लेकिन साईं उस वक्त अपने भक्तों के लिए कुछ नहीं कर पाए। एक बार प्लेग फैला तो उन्होंने गांव के सभी लोगों को गांव से बाहर जाने के लिए मना किया, क्योंकि कोई जाकर वापस आएगा तो वह भी इस गांव में प्लेग फैला देता, तो उन्होंने लोगों में डर भर दिया कि जो भी मेरे द्वारा खींची गई लकीर के बाहर जाएगा, वह मर जाएगा। इस डर के कारण भोली-भाली जनता गांव से बाहर नहीं गई और लोगों ने इसे चमत्कार के रूप में प्रचारित किया कि साईं ने गांव की प्लेग से रक्षा की। प्लेग उनके गांव में नहीं आ सका। साईं के पास कई ऐसे लोग आते जाते थे, जो उन्हें बाहर की दुनिया का हालचाल बता देते थे।

11. साईं का जन्म 1830 में हुआ, पर इन्होंने आजादी की लड़ाई में भारतीयों की मदद करना जरूरी नहीं समझा, क्योंकि वे भारतीय नहीं थे। वे अंग्रेजों के जासूस थे। अफगानिस्तानी पंडारियों के समाज से थे और उन्हीं के साथ उनके पिता भारत आए थे। उनके पिता का नाम बहरुद्दीन था और उनका नाम चांद मियां।

12. साईं के विरोधी साईं चरित में उल्लेखित घटना का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 1936 में हरि विनायक साठे (एक साईं भक्त) ने अपने साक्षात्कार में नरसिम्हा स्वामी को बोला था कि बाबा किसी भी हिन्दू देवी-देवता या स्वयं की पूजा मस्जिद में नहीं करने देते थे, न ही मस्जिद में किसी देवता के चित्र वगैरह लगाने देते।

एक बार उन्होंने शिवरात्रि के अवसर पर बाबा से पूछा कि वे बाबा की पूजा महादेव या शिव की तरह कर सकते हैं? तो बाबा ने साफ इंकार कर दिया, क्योंकि वे मस्जिद में किसी भी तरह के हिन्दू तौर-तरीके का विरोध करते थे। फिर भी साठे साहेब और मेघा रात में फूल, बेलपत्र, चंदन लेकर मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर चुपचाप पूजा करने लगे। तब तात्या पाटिल ने उन्हें देखा तो पूजा करने के लिए मना किया। उसी वक्त साईं की नींद खुल गई और उन्होंने जोर-जोर से चिल्लाना और गालियां देना शरू कर दिया जिससे पूरा गांव इकट्ठा हो गया और उन्होंने साठे और मेघा को खूब फटकार लगाई।

13. साईं सच्चरित्र साईं भक्तों और शिर्डी साईं संस्थान द्वारा बताई गई साईं के बारे में सबसे उचित पुस्तक है। पुस्तक के पेज नंबर 17, 28, 29, 40, 58, 78, 120, 150, 174 और 183 पर साईं ने 'अल्लाह मालिक' बोला, ऐसा लिखा है। पूरी पुस्तक में साईं ने एक बार भी किसी हिन्दू देवी-देवता का नाम नहीं बोला और न ही कहीं 'सबका मालिक एक' बोला। साईं भक्त बताएं कि जो बात साईं ने अपने मुंह से कभी कही ही नहीं, उसे साईं के नाम पर क्यों प्रचारित किया जा रहा है?

14. साईं को राम से जोड़ने की साजिश : 12 अगस्त 1997 को गुलशन कुमार की हत्या के ठीक 6 महीने बाद 1998 में साईं नाम के एक नए भगवान का अवतरण हुआ। इसके कुछ समय बाद 28 मई 1999 में 'बीवी नंबर 1' फिल्म आई जिसमें साईं के साथ पहली बार राम को जोड़कर 'ॐ साईं राम' गाना बनाया था।

15. बाबा बाजार से खाद्य सामग्री में आटा, दाल, चावल, मिर्च, मसाला, मटन आदि सब मंगाते थे और इसके लिए वे किसी पर निर्भर नहीं रहे थे। भिक्षा मांगना तो उनका ढोंग था। बाबा के पास घोड़ा भी था। शिर्डी के अमीर हिन्दुओं ने उनके लिए सभी तरह की सुविधाएं जुटा दी थीं। उनके कहने पर ही कृष्णा माई गरीबों को भोजन करवाती थीं, मस्जिद में साफ-सफाई करती थीं और सभी तरह की देख-रेख का कार्य करती थीं।

16. साईं मेघा की ओर देखकर कहने लगे, 'तुम तो एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हो और मैं बस निम्न जाति का यवन (मुसलमान) इसलिए तुम्हारी जाति भ्रष्ट हो जाएगी इसलिए तुम यहां से बाहर निकलो। -साई सच्चरित्र।-(अध्याय 28)

* एक एकादशी को उन्होंने पैसे देकर केलकर को मांस खरीदने लाने को कहा। -साईं सच्चरित्र (अध्याय 38)

* बाबा ने एक ब्राह्मण को बलपूर्वक बिरयानी चखने को कहा। -साईं सच्चरित्र (अध्याय 38)

* साईं सच्चरित्र अनुसार साईं बाबा गुस्से में आते थे और गालियां भी बकते थे। ज्यादा क्रोधित होने पर वे अपने भक्तों को पीट भी देते थे। बाबा कभी पत्‍थर मारते और कभी गालियां देते। -पढ़ें 6, 10, 23 और 41 साईं सच्चरित्र अध्याय।

* बाबा ने स्वयं कभी उपवास नहीं किया और न ही उन्होंने किसी को करने दिया। साईं सच्चरित्र (अध्याय 32)

* 'मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो। मैं तो एक फकीर हूं, मुझे गंगाजल से क्या प्रयोजन?- साई सच्चरित्र (अध्याय 28)

 

साईं विरोधियों द्वारा गढ़ी गई साईं की एकहानी...

 


 

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