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Written By अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

ये 10 चमत्कारिक और खतरनाक साधनाएं, जानिए...

भारत में बहुत-सी ऐसी साधनाएं है जिनका धर्म से कोई नाता नहीं और कुछ का है। तांत्रिक साधनाओं को नकारात्मक या वाम साधनाओं की श्रेणी में रखा जाता है। गायत्री और योगसम्मत दक्षिणमार्गी साधनाएं होती है वैसे ही उनसे अलग तंत्रोक्त साधनाएं भी होती है। हालांकि तांत्रिक साधनाओं के अलावा ऐसी भी साधनाएं हैं जिनको धर्म में निषेध माना गया है। शैव, शाक्त और नाथ संप्रदाय में सभी तरह की साधनाओं का प्रचलन है। 
तंत्र साधना में शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन और मारण नामक छ: तांत्रिक षट् कर्म होते हैं। इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:- मारण, मोहनं, स्तंभनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये नौ प्रयोग हैं।
 
उक्त सभी को करने के लिए अन्य कई तरह के देवी-देवताओं की साधना की जाती है। अघोरी लोग इसके लिए शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना करते हैं। बहुत से लोग भैरव साधना, नाग साधना, पैशाचिनी साधना, यक्षिणी साधा या रुद्र साधना करते हैं।
 
हमने खोजी है ऐसी 10 तरह की साधनाएं जिनके बारे में कहा जाता है कि जिनको करने से आपका जीवन सफल भी हो सकता है या बर्बाद भी। इन साधनाओं को करने में बहुत सावधानी और हिम्मत की जरूरत होती है। हालांकि कोई ऐसी साधना क्यूं करता है यह एक सवाल हो सकता है। आओ जानते हैं 10 तरह की खतरनाक साधनाओं के बारे में...
 
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नवदुर्गा साधना : माता दुर्गा की यह सात्विक साधना होती है जिसे नवरात्रि में किया जाता है। ये नौ दुर्गा है- 1.शैलपुत्री, 2.ब्रह्मचारिणी, 3.चंद्रघंटा, 4.कुष्मांडा, 5.स्कंदमाता, 6.कात्यायनी, 7.कालरात्रि, 8.महागौरी और 9.सिद्धिदात्री। लेकिन हम यहां आपको बताना चाहते हैं 10 महाविद्या के बारे में।
दिव्योर्वताम सः मनस्विता: संकलनाम ।
त्रयी शक्ति ते त्रिपुरे घोरा छिन्न्मस्तिके च।।
 
10 महाविद्या की साधनाएं : माता दुर्गा की एक सात्विक साधना होती है जिसे नवरात्रि में किया जाता है। नवरात्रि समाप्त होने के बाद गुप्त नवरात्रि शुरू होती है तब 10 महाविद्याओं की साधना की जाती है। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली नवरात्र को गुप्त नवरात्र कहा जाता है। गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
 
 
गुप्त नवरात्रि की प्रमुख देवियां : गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए दस महा विद्या:- 1.काली, 2.तारा, 3.त्रिपुरसुंदरी, 4.भुवनेश्वरी, 5.छिन्नमस्ता, 6.त्रिपुरभैरवी, 7.धूमावती, 8.बगलामुखी, 9.मातंगी और 10.कमला देवी की पूजा करते हैं। सभी की पूजा के अलग अलग लाभ और महत्व है। इनमें से किसी भी एक की साधना करने से वह देवी प्रसन्न होकर साधक को अपनी शक्ति देती है और सभी मनोकामना पूर्ण करती है।
 
शास्त्रों अनुसार इन दस महाविद्या में से किसी एक की नित्य पूजा अर्चना करने से लंबे समय से चली आ रही ‍बीमार, भूत-प्रेत, अकारण ही मानहानी, बुरी घटनाएं, गृहकलह, शनि का बुरा प्रभाव, बेरोजगारी, तनाव आदि सभी तरह के संकट तत्काल ही समाप्त हो जाते हैं और व्यक्ति परम सुख और शांति पाता है। इन माताओं की साधना कल्प वृक्ष के समान शीघ्र फलदायक और सभी कामनाओं को पूर्ण करने में सहायक मानी गई है।
 
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पिशाचिनी या पैशाचिनी साधनाएं : पिशाची देवी ही पिशाचिनी साधनाओं की अधिष्ठात्री देवी है। यह हमारे हृदय चक्र की देवी है। इसे बहुत ही खतरनाक तरह की साधनाएं माना जाता है। किसी भी एक पिशाचिनी की साधना करने के बाद व्यक्ति को चमत्कारिक सिद्धि प्राप्त हो जाती है। पिशाचिनी साधना में कर्ण पिशाचिनी, काम पिशाचिनी आदि का नाम प्रमुख है। पिशाच शब्द से यह ज्ञात होता है कि यह किसी खतरनाक भूत या प्रेत का नाम है लेकिन ऐसा नहीं है। यह साधनाएं भी तंत्र के अंतर्गत आती है।
 
कर्ण पिशाचिनी साधना को सिद्ध करने के बाद साधक में वो शक्ति आ जाती है कि वह सामने बैठे व्यक्ति की नितांत व्यक्तिगत जानकारी भी जान लेता है। कर्ण पिशाचिनी साधक को किसी भी व्यक्ति की किसी भी तरह की जानकारी कान में बता देती है। इस साधना की सिद्धि के पश्चात् किसी भी प्रश्न का उत्तर कोई पिशाचिनी कान में आकर देती है अर्थात् मंत्र की सिद्धि से पिशाच-वशीकरण होता है। मंत्र की सिद्धि से वश में आई कोई आत्मा कान में सही जवाब बता देती है। पारलौकिक शक्तियों को वश में करने की यह विद्या अत्यंत गोपनीय और प्रामाणिक है।
 
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भैरव साधना : भगवान भैरव की साधनाएं भी कई तरह की होती है। उनमें सबसे प्रमुख है काल भैरव और बटुक भैरव साधनाएं। इसके अलावा उग्र भैरव, असितंग भैरव, क्रोध भैरव, स्वर्णाकर्षण भैरव, भैरव-भैरवी आदि साधनाएं भी होती है।
 
 
भैरव को शिव का रुद्र अवतार माना गया है। तंत्र साधना में भैरव के आठ रूप भी अधिक लोकप्रिय हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रु-रु भैरव, 3. चण्ड भैरव, 4. क्रोधोन्मत्त भैरव, 5. भयंकर भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव तथा 8. संहार भैरव। आदि शंकराचार्य ने भी 'प्रपञ्च-सार तंत्र' में अष्ट-भैरवों के नाम लिखे हैं। तंत्र शास्त्र में भी इनका उल्लेख मिलता है। इसके अलावा सप्तविंशति रहस्य में 7 भैरवों के नाम हैं। इसी ग्रंथ में दस वीर-भैरवों का उल्लेख भी मिलता है। इसी में तीन बटुक-भैरवों का उल्लेख है। रुद्रायमल तंत्र में 64 भैरवों के नामों का उल्लेख है।
 
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योगिनी साधनाएं : समस्त योगिनियों का संबंध आदि शक्ति काली के कुल से है। घोर नामक दैत्य से साथ युद्ध के समय आदि शक्ति काली ने ही समस्त योगिनियों के रूप में अवतार लिया था। महा विद्याएं, सिद्ध विद्याएं भी योगनियों की ही श्रेणी में आती हैं ये भी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न भिन्न अवतारी अंश हैं। समस्त योगिनियां, अपने अंदर नाना प्रकार के अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं तथा इंद्रजाल, जादू, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं। मुख्य रूप से योगिनियां अष्ट योगिनी तथा चौसठ योगिनी के नाम से जानी जाती हैं, जो अपने गुणों तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न रूप धारण करती हैं। 
 
अष्ट योगिनियां- 1. सुर-सुंदरी योगिनी, 2. मनोहरा योगिनी 3. कनकवती योगिनी 4. कामेश्वरी योगिनी, 5. रति सुंदरी योगिनी 6. पद्मिनी योगिनी 7. नतिनी योगिनी और 8. मधुमती योगिनी हैं। 
 
चौसठ योगिनी- १.बहुरूप, २.तारा, ३.नर्मदा, ४.यमुना, ५.शांति, ६.वारुणी, ७.क्षेमंकरी, ८.ऐन्द्री, ९.वाराही १०.रणवीरा, ११.वानर-मुखी, १२.वैष्णवी, १३.कालरात्रि, १४.वैद्यरूपा, १५.चर्चिका, १६.बेतली १७.छिन्नमस्तिका, १८.वृषवाहन, १९.ज्वाला कामिनी, २०.घटवार, २१.कराकाली, २२.सरस्वती, २३. बिरूपा, २४.कौवेरी, २५.भलुका, २६.नारसिंही, २७.बिरजा, २८.विकतांना, २९.महालक्ष्मी, ३०.कौमारी, ३१.महामाया, ३२.रति, ३३.करकरी, ३४.सर्पश्या, ३५.यक्षिणी, ३६.विनायकी, ३७.विंद्यावालिनी, ३८.वीर कुमारी, ३९.माहेश्वरी, ४०.अम्बिका, ४१.कामिनी, ४२. घटाबरी, ४३. स्तुती, ४४. काली, ४५. उमा, ४६.नारायणी, ४७.समुद्र, ४८.ब्रह्मिनी, ४९.ज्वालामुखी, ५०.आग्नेयी, ५१.अदिति, ५२.चन्द्रकान्ति, ५३. वायुवेगा, ५४.चामुण्डा, ५५.मूरति, ५६.गंगा, ५७.धूमावती, ५८.गांधार, ५९.सर्व मंगला, ६०.अजिता, ६१.सूर्य पुत्री, ६२.वायु वीणा, ६३.अघोर और ६४.भद्रकाली हैं।
 
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यक्ष और यक्षिणी : यक्ष की स्त्रियों को यक्षिणियां कहते हैं। ये भी कई प्रकार के होते हैं जो भूमि में गड़े हुए खजाने आदि के रक्षक हैं, इन्हें निधि पति भी कहा जाता हैं। इनके सर्वोच्च स्थान पर निधि पति 'कुबेर' विराजित हैं तथा देवताओं के निधि के रक्षक हैं।
 
 
ये देहधारी होते हुए भी सूक्ष्म रूप से युक्त होकर जहां चाहे वहां विचरण कर सकते हैं। इनका प्रमुख कर्म धन से संबंधित हैं, ये गुप्त धन या निधियों की रक्षा करते हैं तथा समृद्धि, वैभव, राज पाट के स्वामी हैं। आदि काल से ही, मनुष्य धन से सम्पन्न होने हेतु, अपने धन की रक्षा हेतु, यक्षों की अराधना करते आए हैं। भिन्न-भिन्न यक्षों की प्राचीन पाषाण प्रतिमा भारत के विभिन्न संग्रहालयों में आज भी सुरक्षित हैं, जो खुदाई से प्राप्त हुए हैं।
 
तंत्रो के अनुसार, रतिप्रिया यक्षिणी, साधक से संतुष्ट होने पर 25 स्वर्ण मुद्राएं प्रदान करती हैं। इसी तरह सुसुन्दरी यक्षिणी, धन तथा संपत्ति सहित, पूर्णायु, अनुरागिनी यक्षिणी, 1000 स्वर्ण मुद्राएं, जलवासिनी यक्षिणी, भिन्न प्रकार के नाना रत्नों को, वटवासिनी यक्षिणी, नाना प्रकार के आभूषण तथा वस्त्र को प्रदान करती हैं। तंत्र ग्रंथों में यक्षिणी तथा यक्ष के साधना के विस्तृत विवरण मिलते हैं।
 
प्रमुख यक्षिणियां है - 1. सुर सुन्दरी यक्षिणी, 2. मनोहारिणी यक्षिणी, 3. कनकावती यक्षिणी, 4. कामेश्वरी यक्षिणी, 5. रतिप्रिया यक्षिणी, 6. पद्मिनी यक्षिणी, 7. नटी यक्षिणी और 8. अनुरागिणी यक्षिणी।
 
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अप्सरा साधना : हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार अप्सरा देवलोक में रहने वाली अनुपम, अति सुंदर, अनेक कलाओं में दक्ष, तेजस्वी और अलौकिक दिव्य स्त्री है। वेद और पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवी, परी, अप्सरा, यक्षिणी, इन्द्राणी और पिशाचिनी आदि कई प्रकार की स्त्रियां हुआ करती थीं। उनमें अप्सराओं को सबसे सुंदर और जादुई शक्ति से संपन्न माना जाता है।
 
 
अप्सरा साधना : माना जाता है कि अप्सराएं गुलाब, चमेली, रजनीगंधा, हरसिंगार और रातरानी की गंध पसंद करती है। वे बहुत सुंदर और लगभग 16-17 वर्ष की उम्र समान दिखाई देती है। अप्सरा साधना के दौरान साधक को अपनी यौन भावनाओं पर संयम रखना होता है अन्यथा साधना नष्ट हो सकती है। संकल्प और मंत्र के साथ जब साधना संपन्न होती है तो अप्सरा प्रकट होती है तब साधन उसे गुलाब के साथ ही इत्र भेंट करता है। उसे फिर दूध से बनी मिठाई, पान आदि भेंट दिया जाता है और फिर उससे जीवन भर साथ रहने का वचन लिया जाता है। ये चमत्कारिक शक्तियों से संपन्न अप्सरा आपकी जिंदगी को सुंदर बनाने की क्षमता रखती है।
 
कितनी हैं अप्सराएं : शास्त्रों के अनुसार देवराज इन्द्र के स्वर्ग में 11 अप्सराएं प्रमुख सेविका थीं। ये 11 अप्सराएं हैं- कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा। इन सभी अप्सराओं की प्रधान अप्सरा रम्भा थी।
 
अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008 तक बताई गई है। कुछ नाम और- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता, बुदबुदा, चन्द्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा, हर्षा, इन्द्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा, लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मिश्रास्थला, मृगाक्षी, नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा, रक्षिता, ऋतुशला, साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका, सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता, उमलोचा आदि।
 
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वीर या बीर साधना : सभी वीरों की शक्तियां एक-दूसरे से भिन्न हैं। ये अलग-अलग शक्तियों से संपन्न होते हैं। गुप्त नवरात्रि में और कुछ विशेष दिनों में वीर साधना की जाती है। वीर साधना को तांत्रिक साधना के अंतर्गत माना गया है। मूलत: 52 वीर हैं।
 
वीरों के विषय में सर्वप्रथम पृथ्वीराज रासो में उल्लेख है। वहां इनकी संख्या 52 बताई गई है। इन्हें भैरवी के अनुयायी या भैरव का गण कहा गया है। इन्हें देव और धर्मरक्षक भी कहा गया है। मूलत: ये सभी कालिका माता के दूत हैं। उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब आदि प्रांतों में कई वीरों की मंदिरों में अन्य देवी और देवताओं के साथ प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। राजस्थान में जाहर वीर, नाहर वीर, वीर तेजाजी महाराज आदि के नाम प्रसिद्ध हैं।
 
कहते हैं कि वीर साधना एक बंद कमरे में, श्मशान में या किसी एकांत स्थान पर की जाती है, जहां कोई आता-जाता न हो। कई दिन, कई रातों तक महाकाली की पूजा करने के पश्चात कहा जाता है कि पूजा के दौरान एक ऐसा क्षण आता है, जब काली के दूत सामने आते हैं और साधक की मनोकामना पूर्ण करते हैं। वीर साधना को तांत्रिक साधना के अंतर्गत माना जाता है इसलिए ध्यान रहे कि यह साधना किसी गुरु या जानकार से पूछकर ही करें।
 
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गंधर्व साधना : गंधर्वों को देवताओं का साथी माना गया है। गंधर्व विवाह, गंधर्व वेद और गंधर्व संगीत के बारे में आपने सुना ही होगा। एक राजा गंधर्वसेभी हुए हैं जो विक्रमादित्य के पिता थे। गंधर्व नाम से देश में कई गांव हैं। गांधार और गंधर्वपुरी के बारे में भी आपने सुना ही होगा। दरअसल, गंधर्व नाम की एक जाति प्राचीनकाल में हिमालय के उत्तर में रहा करती थी। उक्त जाति नृत्य और संगीत में पारंगत थी। वे सभी इंद्र की सभा में नृत्य और संगीत का काम करते थे। 
 
गन्धर्व नाम से एक अकेले देवता थे, जो स्वर्ग के रहस्यों तथा अन्य सत्यों का उद्घाटन किया करते रहते थे। वे देवताओं के लिए सोम रस प्रस्तुत करते थे। विष्णु पुराण के अनुसार वे ब्रह्मा के पुत्र थे और चूंकि वे मां वाग्देवी का पाठ करते हुए जन्मे थे, इसीलिए उनका नाम गंधर्व पड़ा। दरअसल, ऋषि कश्यप की पत्नी अरिष्ठा से गंधर्वों का जन्म हुआ। अथर्ववेद में ही उनकी संख्या 6333 बतायी गई है।
 
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नाग और सर्प साधनाएं : हिन्दू धर्म में नाग और सर्प को चमत्कारिक माना जाता है। नाग और सर्प में दिव्य आत्माएं निवास करती हैं। प्राचीनकाल में नाग नामक एक रहस्यमयी जाती हुआ करती थी। प्रजापकित कश्यप की पत्नी कद्रू से नागों की उत्पत्ति हुई है। नागों में प्रमुख- अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कार्कोटक और पिंगला- उक्त पांच नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। यह सभी कश्यप वंशी थे। इन्ही से नागवंश चला।
 
नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं, जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स।
 
ग्रामिण क्षेत्रों में बहुत से लोगों के शरीर में नागदेवता आकर लोगों की समस्या का समाधान करते हैं। सर्पो तथा नागों ने देवताओं की कठिन साधना, तपस्या की तथा उन के निकट का ही विशेष पद भी प्राप्त किया। आज भी नागों की कई आलौकिक शक्तियां विचरण कर रही है। नागों के आह्‍वान और उनकी साधना करके मनचाही सफलता और मनोकामना पाई जाती है। नाग पूजा और साधना के विशेष दिन होते हैं।
 
कद्रू को नागों की माता कहा गया है। देवी मनसा, जो भगवान शिव की बेटी हैं, उन्हें भी नाग माता कहा जाता हैं, जिनका विवाह जरत्कारू नाम के ऋषि के साथ हुआ था। जनमेजय द्वारा सर्पों के नाश के लिए किए गए यज्ञ से सर्पों की रक्षा की थी देवी मनसा के पुत्र आस्तिक ने।
 
सर्प प्रजाति के मुख्य 12 सर्प हैं जीने के नाम- 1. अनंत 2. कुलिक 3. वासुकि 4. शंकुफला 5. पद्म 6. महापद्म 7. तक्षक 8. कर्कोटक 9. शंखचूड़ 10. घातक 11. विषधान 12. शेष नाग।
 
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किन्नर और किन्नरियां साधना : प्राचीनकाल में देवाताओं के साथ जहां गंधर्व रहते थे वहीं एक दूसरे क्षेत्र में किन्नर जाति के लोग भी रहते थे। किन्नर जाति के लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे। ये लोग अपने अनुपम तथा मनमोहक सौन्दर्य के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध हैं।
 
किन्नरों को मृदुभाषी तथा गायन में निपुण माना गया है। हिन्दू तंत्र ग्रंथों में किन्नरियों को विशेष स्थान प्राप्त है। किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत काला होती है। गायन तथा सौंदर्यता हेतु इनकी साधना विशेष लाभप्रद हैं। परिणामस्वरूप प्राचीन काल से किन्नरियों की साधना ऋषि मुनियों द्वारा की जाती हैं। किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता हैं।
 
माना जाता है कि प्रमख रूप से छह किन्नरियों का समूह है- 1. मनोहारिणी किन्नरी 2. शुभग किन्नरी 3. विशाल नेत्र किन्नरी 4. सुरत प्रिय किन्नरी 5. सुमुखी किन्नरी और 6. दिवाकर मुखी किन्नरी। 
 
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नायिका साधना : यक्षिणियां तथा अप्सराओं की उपजाति में नायिकाएं आती हैं। यह भी यक्षिणियों और अप्सराओं की तरह मन मुग्ध करने वाले सौन्दर्य से परिपूर्ण होती है। इनकी साधना वशीकरण तथा सुंदरता प्राप्ति हेतु की जाती हैं।
 
माना जाता है कि नारियों को आकर्षित करने का हर उपाय इनके पास हैं। ये मुख्यतः 8 हैं- 1. जया 2. विजया 3. रतिप्रिया 4. कंचन कुंडली 5. स्वर्ण माला 6. जयवती 7. सुरंगिनी 8. विद्यावती। इन नायिकाओं का भी इस्तेमाल देवता लोग ऋषि-मुनियों की तपस्या भंग करने के लिए किया करते थे।
 
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अन्य साधनाएं : इसके अलावा डाकिनी-शाकिनी, विद्याधर, सिद्ध, दैत्य, दानव, राक्षस, गुह्मक, भूत, वेताल, अघोर और रावण आदि की साधना भी होती है। वैसे हम यहां साबर साधना के बारे में बता रहे हैं। यह साधाना तुरंत सिद्ध होने वाली और असरकारक होती है। साबर साधनाएं कई प्रकार की होती है।
 
साबर साधनाएं : वैदिक अथवा तांत्रोक्त अनेक ऐसे मंत्र हैं, जिसमें साधना करने के लिए अत्यंत सावधानी की जरूरत होती है। असावधानी से कार्य करने पर प्रभाव प्राप्त नहीं होता अथवा सारा श्रम व्यर्थ चला जाता है, परंतु शाबर मंत्रों की साधना या सिद्धि में ऐसी कोई आशंका नहीं होती। यह सही है कि इनकी भाषा सरल और सामान्य होती है। माना जाता है कि लगभग सभी साबर साधनाओं और मंत्रों का अविष्कार गुरु गोरखनाथ ने किया है।
 
।।ओम गुरुजी को आदेश गुरजी को प्रणाम, धरती माता धरती पिता, धरती धरे ना धीरबाजे श्रींगी बाजे तुरतुरि आया गोरखनाथमीन का पुत् मुंज का छड़ा लोहे का कड़ा हमारी पीठ पीछे यति हनुमंत खड़ा, शब्द सांचा पिंड काचास्फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा।।
 
इस मन्त्र को सात बार पढ़ कर चाकू से अपने चारों तरफ रक्षा रेखा खींच ले गोलाकार, स्वयं हनुमानजी साधक की रक्षा करते हैं। शर्त यह है कि मंत्र को विधि विधान से पढ़ा गया हो।
 
साबर मंत्रों को पढ़ने पर ऐसा कुछ भी अनुभव नहीं होता कि इनमें कुछ विशेष प्रभाव है, परंतु मंत्रों का जप किया जाता है तो असाधारण सफलता दृष्टिगोचर होती है। कुछ मंत्र तो ऐसे हैं कि जिनको सिद्ध करने की जरूरत ही नहीं है, केवल कुछ समय उच्चारण करने से ही उसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगता है। यदि किसी मंत्र की संख्या निर्धारित नहीं है तो मात्र 1008 बार मंत्र जप करने से उस मंत्र को सिद्ध समझना चाहिए।
 
दूसरी बात शाबर मंत्रों की सिद्धि के लिए मन में दृढ़ संकल्प और इच्छा शक्ति का होना आवश्यक है। जिस प्रकार की इच्छा शक्ति साधक के मन में होती है, उसी प्रकार का लाभ उसे मिल जाता है। यदि मन में दृढ़ इच्छा शक्ति है तो अन्य किसी भी बाह्य परिस्थितियों एवं कुविचारों का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता।