उत्तराखंड का नंदा देवी पर्वत, जिसका टूट गया था ग्लेशियर, जानिए रहस्य

उत्तराखंड के चमोली जिले में जोशीमठ के तपोवन क्षेत्र में का एक हिस्सा कुछ दिनों पूर्व टूट गया और इससे अलकनंदा नदी पर बने ऋषिगंगा बांध को नुकसान पहुंचा और धौलीगंगा में भी बाढ़ जैसे हालात हो गए। कई लोगों के लापता होने और मारे जाने की खबर है। आओ जानते हैं नंदा देवी पर्व के बारे में संक्षिप्त जानकारी।


1. उत्तराखंड के लोग नंदादेवी को अपनी अधिष्ठात्री देवी मानते हैं और यहां की लोककथाओं में उन्हें हिमालय की पुत्री कहा गया है, अर्थात वे माता पार्वती हैं। हर वर्ष उत्तराखंड की जनता द्वारा मां नंदा-सुनंदा की पूजा-अर्चना पूर्ण भक्ति भाव के साथ की जाती है। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष आयोजित होने वाला नंदादेवी मेला समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की याद दिलाता है। माता नंदा देवी का स्थान बहुत ऊंचा है। नंदा देवी पर्वत भारत की दूसरी एवं विश्व की 23वीं सर्वोच्च चोटी है। इस चोटी को उत्तरांचल राज्य में मुख्य देवी के रूप में पूजा जाता है। इससे ऊंची व देश में सर्वोच्च चोटी कंचनजंघा है। नंदा देवी पर्वत लगभग 25,643 फीट ऊंचा है।

2. नंदादेवी के दोनों ओर ग्लेशियर यानी हिमनद हैं। इन हिमनदों की बर्फ पिघलकर एक नदी का रूप ले लेती है। यहां दो बड़े ग्लेशियर है- नंदादेवी नॉर्थ और नंदा देवी साउथ। दोनों की लंबाई 19 किलोमीटर है। इनकी शुरुआत नंदा देवी की चोटी से ही हो जाती है जो नीचे घाटी तक आती हैं। नंदा देवी ग्लेशियर से पिघलकर पानी पिंडारगंगा, अलकनन्दा, ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों से बहता है। ऋषिगंगा का पानी आगे चल कर गंगा नदी में मिल जाता है। चमोली जिले में स्थित नंदा देवी ग्लेशियर के पश्चिम में ऋषिगंगा नदी और पूर्व में गौरीगंगा घाटी है।

नंदा देवी पहाड़ के उत्तरी तरफ उत्तनी नंदा देवी ग्लेशियर है। यह उत्तरी ऋषि ग्लेशियर से जुड़ती है। दक्षिण की तरफ दक्षिणी नंदा देवी देवी ग्लेशियर है जो दक्षिणी ऋषि ग्लेशियर से जुड़ती है। इन्हीं दोनों ग्लेशियरों का पानी ऋषिगंगा नदीं में जाता है। पूर्व की तरफ पाचू ग्लेशियर है, दक्षिण पूर्व की तरफ नंदाघुंटी और लावन ग्लेशियर हैं, इन सबका पानी बहकर मिलाम घाटी में जाता है। दक्षिण में स्थित पिंडारी ग्लेशियर का पानी पिंडार नदी में जाता है।

3. नंदा देवी की चढ़ाई अत्यधिक कठिन मानी जाती है। नंदा देवी की कुल ऊंचाई 7816 मीटर यानी 25,643 फीट है। यहां तक पहुंचने के लिए प्रत्येक 12 वर्ष में एक धार्मिक यात्रा का आयोजन होता है। चूंकि इस यात्रा का आयोजन कुंभ की तरह हर बारह वर्ष के बाद होता है, इसलिए इसे हिमालयी कुंभ के नाम से भी जाना जाता है। नंदा देवी राजजात यात्रा को विश्‍व की सबसे लम्बी पैदल और धार्मिक यात्रा माना जाता है। इस पहाड़ पर चढ़कर माता के दर्शन करना बहुत ही कठिन होता है। इस यात्रा की शुरुआत आदि शंकराचार्य ने ईसा पूर्व की थी।

4. नंदा देवी गढ़वाल के साथ साथ कुमाऊं कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थीं और वे उत्तराखंड की बेटी हैं, वह इस यात्रा के माध्यम से अपने ससुराल यानी कैलाश पर्वत जाती हैं। इस ऐतिहासिक यात्रा को गढ़वाल-कुमाऊं के सांस्कृतिक मिलन का प्रतीक भी माना जाता है।


5. नंदादेवी की यह ऐतिहासिक यात्रा चमोली जनपद के नौटी गांव से शुरू होती है जो रूपकुंड होकर हेमकुंड तक जाती है जो 18 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इस 280 किमी की धार्मिक यात्रा के दौरान रास्ते में घने जंगल, पथरीले मार्गों व दुर्गम चोटियों और बर्फीले पहाड़ों को पार करना पड़ता है। नंदादेवी चोटी के नीचे पूर्वी तरफ नंदा देवी अभयारण्य है। यहां कई प्रजातियों के जीव-जंतु रहते हैं। इसकी सीमाएं चमोली, पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिलों से जुड़ती हैं।

6. इस यात्रा को पूरा करने में 19 दिन का समय लग जाता है। इस यात्रा के 19 पड़ाव है। रास्ते में विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा में भिन्न-भिन्न पड़ावों पर लोग इस यात्रा में मिलकर इस यात्रा का हिस्सा बनते हैं। इस यात्रा का आयोजन नंदादेवी राजजात समिति द्वारा किया जाता है।

7. इस यात्रा का मुख्य आकर्षण चौसिंगा खाडू (चार सींगों वाला भेड़) होता है, जो कि स्थानीय क्षेत्र में राजजात यात्रा शुरू होने से पहले पैदा हो जाता है। उसकी पीठ में दो तरफ थैले में श्रद्धालु गहने, श्रृंगार सामग्री व अन्य भेंट देवी के लिए रखते हैं, जो कि हेमकुंड में पूजा होने के बाद आगे हिमालय की ओर प्रस्थान करता है। यात्रा में जाने वाले लोगों का मानना है कि यह चौसिंगा खाडू आगे विकट हिमालय में जाकर विलुप्त हो जाता है। माना जाता है कि यह नंदादेवी के क्षेत्र कैलाश में प्रवेश कर जाता है, जो आज भी अपने आप में एक रहस्य बना हुआ है।



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