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क्या है पुरुषोत्तम माह का महत्व, जानें पौराणिक कथा

Updated: सोमवार, 17 जुलाई 2023 (13:41 IST)
Adhik Maas Katha 2023 
 
Purshottam Maas 2023: महत्व- जैसा कि आप जानते हैं कि हिन्दू धर्म, ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार खरमास यानी मलमास को निकृष्ट मानकर इस मास में किसी भी प्रकार के शुभ कार्य को वर्जित माना जाता है। पुरुषोत्तम मास का अर्थ जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती वह अधिक मास कहलाता होता है। इनमें खास तौर पर सभी तरह के मांगलिक कार्य वर्जित माने गए है, लेकिन यह माह धर्म-कर्म के कार्य करने में बहुत फलदायी है। 
इस मास में किए गए धार्मिक आयोजन पुण्य फलदायी होने के साथ ही ये आपको दूसरे माहों की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक फल देने वाले माने गए हैं। पुरुषोत्तम मास में सभी नियम अपने सामर्थ्य अनुसार करना चाहिए। जितना हो सके उतना संयम यानी ब्रह्मचर्य का पालन, फलों का भक्षण, शुद्धता, पवित्रता, ईश्वर आराधना, एकासना, देवदर्शन, तीर्थयात्रा आदि अवश्य करना चाहिए। 
 
हिन्दू कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2023 में श्रावण माह के अंतर्गत ही अधिकमास/पुरुषोत्तम मास का प्रारंभ हो रहा है। इस बार सावन 4 जुलाई से प्रारंभ होकर 31 अगस्त तक जारी रहेगा, जबकि अधिकमास 18 जुलाई से प्रारंभ होकर 16 अगस्त को रहेगा। आपको बता दें कि अधिकमास आने के कारण इस बार 59 दिनों का श्रावण मास होगा।

अब आइए जानते हैं इसकी कथा : Adhik Maas Vrat Katha
 
मास कि दृष्टि से देखें तो निश्चित ही यह अपमानजनक है, परंतु यहीं से प्रारंभ होती है इस मास के भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय अधिकमास/पुरुषोत्तम बनने की रोचक कथा। 
 
इस कथा के अनुसार, खरमास को जब देवताओं एवं मनुष्यों के द्वारा नकारा गया और इसकी निंदा की गई, तब खरमास इस निंदा और अपमान से दुखी होकर भगवान विष्णु के पास पहुंचा और अपनी व्यथा सुनाई। मास ने कहा कि उसकी हर जगह निंदा होती है और वह किसी के लिए भी स्वीकार्य नहीं है। अत: उसका कोई स्वामी नहीं है।
 
मास की बात सुन भगवान विष्णु उसे अपने साथ गौलो‍क में भगवान श्रीकृष्ण के पास लेकर गए। रत्नरड़ि‍त सिंहासन पर वैजयंती माला धारण कर विराजित श्री कृष्ण को जब यह व्यथा सुनाई गई कि खरमास में कोई मांगलिक कार्य नहीं होता और हर जगह उसका अनादर होता है, तो श्री कृष्ण ने उसकी व्यथा सुनकर कहा- कि इस संसार में अब मैं तुम्हारा स्वामी हूं। मैं तुम्हें स्वीकार करता हूं। अब कोई तुम्हारी निंदा नहीं करेगा। 
 
भगवान श्री कृष्ण ने मलमास को स्वीकार कर उसे अपना नाम दिया, अर्थात् पुरुषोत्तम मास। भगवान ने कहा कि अब तुम्हें पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाएगा। जो तप गोलोक धाम में पद को पाने के लिए मुनि, ज्ञानी कठोर करते हैं, वह इस माह में अनुष्ठान, पूजन और पवित्र स्नान से प्राप्त होगा।

यही कारण है कि पुरुषोत्तम मास में किया जाने वाला स्नान, ध्यान, अनुष्ठान हमें ईश्वर के निकट ले जाता है।

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