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भीली बोली में रामायण

1400 पृष्ठों में भावार्थ

Written By ND
Updated: बुधवार, 13 मई 2009 (12:25 IST)
- जयप्रकाश तापड़िय ा
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देश में आदिवासियों की भीली बोली में पहली बार तुलसीकृत रामचरित मानस का भावार्थ मध्यप्रदेश के बाग ( धार) में रहने वाले और ईसुरी अलंकरण से सम्मानित भानुशंकर गेहलोत द्वारा किया गया है। इसी वर्ष इसका प्रकाशन मप्र आदिवासी लोक कला परिषद द्वारा किया जाएगा।

उन्होंने बताया की भीली में रचित ग्रंथ में दोहा, चौपाई, सौरठा, छंद वगैरह वही हैं, केवल हिन्दी भावार्थ के स्थान पर भीली भाषा का उपयोग किया गया है। इसे तैयार करने में ढाई-तीन वर्ष का समय लगा। भावार्थ में 99 फीसद से अधिक भीली भाषा का उपयोग किया है। कुछ ही शब्द ऐसे हैं जो भीली में नहीं हैं।

लुप्त हो रही है भीली : भीली में अनुवाद पर श्रीगेहलोत ने बताया कि आदिवासी कस्बों का शहरीकरण हो रहा है। भीली बोली लुप्त हो रही है। पढ़े-लिखे आदिवासी भी भीली बोली में बात न करते हुए हिन्दी बोलते हैं। ऐसे में भीली बोली को बचाने के मकसद से यह कोशिश की गई है। आदिवासी राम को मानता है, लेकिन ज्यादा जानकारी नहीं है। ऐसे अनपढ़ ग्रामीणों को यह अनुवादित ग्रंथ पढ़कर सुनाना काफी उपयोगी साबित होगा।

महाभारत पर भी काम : गेहलोत ने पंडवानी गीत एवं भजन तथा भागवत गीता के 18वें अध्याय का भीली भावार्थ भी तैयार किया है। वे आदिवासी लोक कला परिषद के सौजन्य से महाभारत का भी भीली में अनुवाद करने की इच्छा रखते हैं।

आदिवासी लोक कला परिषद, भोपाल के सहायक संपादक अशोक मिश्र ने कहा कि वाचिक परंपराओं को प्रोत्साहित करने हेतु रामचरित मानस का भीली बोली में प्रकाशन किया जा रहा है। गेहलोत ने 700 पृष्ठ के रामचरित मानस का हस्तलिखित भीली भावार्थ 1400 पृष्ठ में उपलब्ध कराया है। पिछले 3 माह से भावार्थ का परीक्षण कार्य चल रहा है। चालू वित्तीय वर्ष में इस ग्रंथ का प्रकाशन हो जाएगा।

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