suvichar

देवशयनी एकादशी पर पंढरपुर की दिंडी यात्रा

Updated: शुक्रवार, 30 जून 2017 (15:44 IST)
* दिंडी यात्रा : विट्ठल के दर्शन करने पंढरपुर पहुंचेंगे वारकरी 
 
देवशयनी/आषाढ़ी एकादशी पर महाराष्ट्र के कोने-कोने से वारकरी पालकियों और दिंडियों के साथ पंढरपुर में विट्ठल के दर्शन को पहुंचते हैं। पंढरपुर महाराष्ट्र का एक सुविख्यात तीर्थस्थल है। जो भीमा नदी के तट पर बसा है, यह तीर्थस्थल सोलापुर जिले में है। भीमा नदी को चंद्रभागा के नाम से भी जाना जाता है। यहां प्रतिवर्ष दर्शन को उमड़ने वाले इस हुजूम की संख्या का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है।

महाराष्ट्र अनेक महान संतों की कर्मभूमि है, इसीलिए प्रतिवर्ष देवशयनी एकादशी पर इन संतों के जन्म या समाधि स्थलों से ये पालकियां व दिंडियां निकलती हैं, जो लंबा सफर तय कर पंढरपुर पहुंचती हैं। हर वारकरी की जीवन की अंतिम अभिलाषा यही होती है कि प्रभु, हमें मुक्ति न देते हुए फिर मानव जन्म ही देना ताकि हर जन्म में विट्ठल की भक्ति का लाभ मिल सकें। 
 
इन पालकियों के साथ एक मुख्य संत के मार्गदर्शन में समूह यानी दिंडी (कीर्तन/भजन मंडली) चलता है, जिसमें शामिल होते हैं वारकरी। महाराष्ट्र में ईश्वर के सगुण-निर्गुण और बहुदेव रूप की विविधता को एकरूप या एकता में बांधने का कार्य किया है वारकरी संप्रदाय ने।

ALSO READ: देवशयनी एकादशी, पढ़ें व्रत कथा, विधि एवं आरती...
 
हर साल पंढरपुर की वारी (तीर्थयात्रा) करने वाला वारकरी कहलाता है,जो विठू का भक्त है। पंढरपुर के वारकरी संप्रदाय के उपास्य विट्ठल की प्राचीनता अट्ठाईस गुना अट्ठाईस यानी सात सौ चौरासी युगों से अधिक बताई जाती है। इतने लंबे समय से श्री विट्ठल अपने भक्त की दहलीज पर प्रतीक्षा में कमर पर हाथ धरे खड़े हैं कि वे उन्हें बैठने को तो कहे, जो अब तक भक्त ने कहा नहीं।


 
साल-दर-साल लाखों मील का सफर तय कर आने वाले सैलानी परिंदों के मानिंद है वारकरी। कितना सफर, किस राह से कितनी देर में, कब और कहां रुकना है, कहां भोजन करना है, सबका समय सालों-साल पीढ़ियों से तय है। वैसे तो कोई इसे भूलता नहीं और यदि कोई भूला भी तो उसे वहीं छोड़ वारी आगे बढ़ जाती है।
 
एक पीढ़ी खत्म, दूसरी आती है, कोई किसी से पूछता नहीं। चलते-चलते, उड़ते-उड़ते सब अपने-आप समझ जाते हैं। नई पीढ़ी हाथों-हाथ तैयार होती है। हर वारकरी एक दिंडी का सदस्य होता है, जिसका एक नंबर व चलने का क्रम तय है, जिसमें अनुशासन सिखाने के लिए रिंग मास्टर नहीं होता। सब अपने रिंग मास्टर खुद होते हैं।
 
हर दिंडी का एक मुखिया होता है, जिसके पास खर्च हेतु वारकरी रुपए-पैसे जमा करते हैं। सामान लाने ले-जाने हेतु किराए का टेम्पो भी तय होता है, जिस पर मुखिया अगले मुकाम पर पहले ही से पहुंच कर खाने-पीने का बंदोबस्त करता है, यही उसकी वारी है। खर्च के पैसे वह कभी भी खुद पर खर्च नहीं करता, न ही कभी ऐसा हुआ हो कि कोई पैसे लेकर चंपत हुआ हो। सारा व्यवहार बिलकुल साफ पारदर्शी इंसान की ईमानदारी पर विश्वास रखने वाला।
 
एक दिंडी यानी 250-300 लोगों का परिवार, जो सालभर एक-दूसरे के संपर्क में रहता है। वारी के दौरान प्यार आत्मीयता के साथ लाया नाश्ता लड्डू-चकली, चिवड़ा एक-दूसरे को खिलाते अपनी दुनियादारी का दर्द बांटते हैं। सास-बहू व भाई-भाई के आपसी झगड़े वारी में शामिल होने पर कैसे खुद-ब-खुद खत्म हुए, इसके तो कई किस्से सुनने को मिल जाएंगे। वारी के 20 दिनों में जमा सुख की पूंजी को सालभर किफायत के साथ खर्च करते रहना और इंतजार करना फिर अगली वारी का, यही वारी का सीधा सच्चा मैनेजमेंट होता है।  
 
Show comments

सभी देखें

मंगल का मृगशिरा नक्षत्र में गोचर, 3 राशियों को रहना होगा 12 अगस्त तक सावधान

Rationalism: सत्य की वैज्ञानिक खोज: देकार्त का बुद्धिवाद और आधुनिक दर्शन का जन्म

मिथुन में मार्गी बुध का प्रभाव: भारत समेत दुनिया में होंगे ये बड़े बदलाव

Rakhi 2026: कब है रक्षा बंधन का त्योहार, राखी बांधने का शुभ मुहूर्त?

चातुर्मास में सुख-समृद्धि लाने के लिए इन 4 महीनों में राशि के अनुसार ये खास उपाय

सभी देखें

सिंह राशि में बुधादित्य योग से 5 राशियों का चमकेगा भाग्य, खुलेंगे सफलता के द्वार

सितंबर माह 2026: इस माह के प्रमुख व्रत और त्योहारों की पूरी लिस्ट

Aaj ka panchang: आज का शुभ मुहूर्त: 28 अगस्‍त 2026: शुक्रवार का पंचांग और शुभ समय

भाद्रपद मास का महत्व और पौराणिक कथा

लव-कुश जयंती 2026: प्रभु श्रीराम के जुड़वा पुत्र लव-कुश के बारे में जानें 5 खास बातें

अगला लेख