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विस्मृत होती दादी-नानी

Updated: बुधवार, 9 जुलाई 2014 (18:19 IST)
NDND
बचपन में अपने लाड़-प्यार से हमारा लालन-पालन करने वाली दादी-नानी आज बदलते समय के रिश्तों की भेंट चढ़ गई हैं। महानगरीय सभ्यता व एकल परिवार प्रणाली में दादी-नानी की जगह आया माँ व नौकरानी ने ले ली है, जिसको बच्चों की परवरिश के लिए पैसा दिया जाता है, जिससे बच्चों के बचपन में दादी-नानी की भूमिकाएँ समाप्त सी हो जाती है।

अपने बहू-बेटों को रिश्तों की अहमियत का पाठ पढ़ाती, दुख के थपेड़ों में परिवार की हिम्मत बढ़ाती, अपनी लोरी से व चंदा मामा की कहानियों से अपने नवासों और पोते-पोतियों को मीठी नींद सुलाने वाली दादी-नानी अब अपने ही परिवार में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आ रही हैं। लोग कहते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ अब उनके अनुभव व सोच भी बूढ़े हो गए हैं इसलिए वो नई पीढ़ी के लोगों के साथ रहने के काबिल नहीं है।

  अपनी लोरी से व चंदा मामा की कहानियों से अपने नवासों और पोते-पोतियों को मीठी नींद सुलाने वाली दादी-नानी अब अपने ही परिवार में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आ रही हैं। लोग कहते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ अब उनके अनुभव व सोच भी बूढ़े हो गए हैं      
बुजुर्ग व अनुभवी इंसान के रूप में घर की शोभा बढ़ाने वाली दादी-नानी आज वृद्धाश्रमों की शोभा बढ़ा रही हैं तथा कँपकँपाते हाथों से अपने बच्चों की तस्वीरों स्वार्थ की धूल झाड़ ममता के आँसुओं से उसका अभिषेक कर रही हैं। उनके मन में आज भी अपनों के प्रति कोई गिला-शिकवा नहीं है। अभावों की धूप में भी वे अपनों को सुखी जीवन के आशीष की छाँव दे रही हैं इस दुख को भी वह अपनी किस्मत का लिखा कहकर सारा दोष उस पर मढ़ देती हैं।

दूर से ही अपने नाती,पोतों को देखकर खुश होना, उनके जन्मदिन पर मिठाई बाँटना, उनके दुख-दर्द में दिन-रात खुशियों की तलाश करना ... बस अब यही काम होता है दादी-नानी का, जो आज भी अपनी फूटी ऐनक से दुनिया को देखती हैं व परायों के बच्चों में अपने पोते-पोतियों का आभास करके खुश होती हैं।

क्या शोहरत इतनी अच्छी होती है कि अपने आँचल में छुपाकर दूध पिलाने वाली माँ का आँचल आज हमें मैला नजर आता है? उसका लाड़-प्यार आज हमें दकियानूसी बातें लगती हैं तथा उनकी संगत हमारे बच्चों को भटकाव की राह पर ले जाने वाली लगती है। यदि ऐसा है तो शायद हम भ्रम में जी रहे हैं। यह मत भूलिए कि कल को आपकी दुर्दशा भी यही हो सकती है तथा आज के बच्चों कल को आपकी सोच को भी पुराना कहने लगेंगे।

कहते हैं पैसे से सब कुछ मिल जाता है परंतु याद रखिए कि पैसे से दादी-नानी का प्यार व उनके संस्कार नहीं मिलते। वो तो ममता की वो खदान होती हैं, जिसमें संस्कार, प्यार व रिश्तों की अहमियत का सोना छुपा होता है लेकिन क्या करें आजकल के बच्चों का परिवार तो उनके माँ-बाप तक ही सिमटकर रह गया है।

अब भी वक्त है सँभल जाइए तथा अपने परिवार से जुदाई सहते इन बड़े-बुजुर्गों को अपने घर व दिल में स्थान दीजिए। जब तक इनका साथ है तब तक आपके साथ ईश्वर की कृपा है। आज इन्हें आपकी दुत्कार व तानों की नहीं बल्कि प्यार की जरूरत है।

लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा
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