राखी ने ये कहते हुए बात खत्म कर दी - 'जाने भी दो, चलो छोड़ो। हम अपनी पार्टी एंजॉय करते हैं।' उसने न सिर्फ ये कहा, बल्कि ये सोच रखते हुए पूरी पार्टी में होने वाले नुकसान या परेशानी की शिकन तक अपने चेहरे पर नहीं आने दी।
ये बड़ी अचूक दवा है, छोटी-छोटी बातें जो हमें डिस्टर्ब या उद्वेलित कर देती हैं, उन पर यदि 'जाने भी दो' की खाक डाल दी जाए तो हम बहुत सारी भावनात्मक ऊब-डूब से बच सकते हैं। आखिर ये सच है कि जो नुकसान होना था, वो तो हो ही चुका था। अब उस नुकसान को याद करते हुए अपने आयोजन का मजा खराब करने में क्या तुक है? इससे नुकसान की भरपाई तो नहीं की जा सकती है न...! इसकी बजाय ये सोचा जाए कि यदि नुकसान अपनी वजह से हुआ है तो उसकी पुनरावृत्ति से किस तरह बचा जाए? और यदि नुकसान होने में हमारा कोई हाथ नहीं है तो फिर उस नुकसान को कम कैसे किया जाए?