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हिन्दी कविता : मेरे पिता के कदम

Updated: मंगलवार, 20 जून 2017 (18:09 IST)
मनीषा कुशवाह
आराध्य निश्छल सा मन
मेरे कदमों की आहट के साथ
चलते मेरे पिता के कदम
 
न शिकवों की शिकन
न शिकायतों का आडंबर
दुनिया के इस बीहड़ वन में
मेरे लिए पगडंडी बनाते हैं
उनके कदम...
 
जब तपिश की धूप में
झुलसे मेरा तन
शब्दों की अभिव्यक्ति से 
बांध देते मेरा मन
 
प्रशस्त करते मेरा मार्ग 
प्रकाश पुंज की तरह
मेरे नन्हे कदमों से बिदाई तक
हर पल यूंही मेरे सपनों को बुनते
मेरे पिता के कदम...
 
और एक दिन पिया के साथ चल देती मैं 
किसी और का घरोंदा सजाने को
फिर भी कम न होता 
उनका अगाध प्रेम
 
आश्वासन से भरी उनकी बातें
जिंदगी के हर मोड़ पर साथ देती मेरा
और निहारिका की भांति अपलक जाग कर
मेरा इंतजार करते 
मेरे पिता के नयन...
 
आराध्य निश्छल सा मन
मेरे कदमों की आहट के साथ चलते
मेरे पिता के कदम...।
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