शक्ति मिल्स गैंगरेप : हाईकोर्ट ने 3 दोषियों की मौत की सजा को उम्रकैद में किया तब्दील

पुनः संशोधित शुक्रवार, 26 नवंबर 2021 (00:48 IST)
मुंबई। ने मध्य मुंबई में बंद पड़े परिसर में 2013 में 22 वर्षीय एक के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार के मामले के तीन दोषियों को सुनाई गई मौत की सजा को बृहस्पतिवार को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया।
अदालत ने कहा कि वे अपने अपराध का पश्चाताप करने के लिए आजीवन कारावास की सजा भुगतने के हकदार हैं क्योंकि मृत्यु पश्चाताप की अवधारणा खत्म कर देती है। अदालत ने बलात्कार को ‘किसी महिला के सर्वोच्च सम्मान और गरिमा को एक गंभीर आघात’ करार देते हुए कहा कि दोषी समाज में रहने के हकदार नहीं हैं।

अदालत के अनुसार, इस तरह के लोगों के समाज में रहने से अन्य लोगों का वहां रहना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि वे (दोषी) महिलाओं को उपहास, दुराचार, तिरस्कार और इच्छा की वस्तु के रूप में देखते हैं। न्यायमूर्ति साधना जाधव और न्यायमूर्ति पृथ्वीराज चव्हाण की खंडपीठ ने विजय जाधव, मोहम्मद कासिम शेख उर्फ कासिम बंगाली और मोहम्मद अंसारी को सुनाई गई मौत की सजा की पुष्टि करने से इनकार कर दिया और उनकी सजा को उनके शेष जीवन के लिए आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया।

मुंबई की एक निचली अदालत द्वारा उन्हें मौत की सजा सुनाए जाने के सात साल बाद यह फैसला आया है। उच्च न्यायालय ने कहा कि हालांकि अपराध बर्बर और जघन्य था, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि दोषी सिर्फ मौत की सजा के हकदार हैं और उससे कम सजा के नहीं। उच्च न्यायालय ने कहा, मौत की सजा अपरिवर्तनीय होती है और इसलिए, सजा सुनाने का बुनियदी सिद्धांत नियम के तौर पर उम्रकैद होगा और मौत की सजा एक अपवाद है।

अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालत सिर्फ जनाक्रोश पर विचार करते हुए सजा नहीं सुना सकती। पीठ ने अपने आदेश में कहा कि एक संवैधानिक अदालत होने के नाते उसकी ओर से यह उपयुक्त नहीं होगा कि कानून द्वारा स्थापित वाजिब प्रक्रिया का पालन किए बगैर जीवन को समाप्त कर दिया जाए।

फैसले में कहा गया है, हम अपनी भावनाओं को आपराधिक न्याय व विधान के प्रक्रियागत प्रावधान के सिद्धांत पर लाद नहीं सकते...हमारा मानना है कि दोषी सश्रम उम्रकैद की सजा के हकदार हैं, ताकि वे अपने शेष जीवन में पूरे समय अपने अपराध का पश्चाताप कर सकें।

फैसले में कहा गया है, आरोपी किसी नरमी, दया या सहानुभूति के हकदार नहीं हैं। हर दिन उगता हुआ सूर्य उन्हें उनके द्वारा किए गए बर्बर कृत्य की याद दिलाएगा और रात में उनका दिल अपराध बोध और ग्लानि से भर आएगा। अदालत ने कहा कि दोषी पैरोल या फरलो के हकदार नहीं होंगे, क्योंकि उन्हें समाज में घुलने की अनुमति नहीं दी जा सकती और उनके सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है।

घटना के समय 2013 में जाधव की उम्र 19 साल, कासिम शेख की 21 साल और अंसारी की 28 साल थी। अदालत ने कहा, बलात्कार का हर मामला एक जघन्य अपराध है। पीड़िता को पहुंचे आघात ने सामूहिक अंतरआत्मा को झकझोर दिया। बलात्कार पीड़िता केवल शारीरिक चोट नहीं झेलती है बल्कि उसका मानसिक स्वास्थ्य और जीवन में स्थिरता भी प्रभावित होती है।

अदालत ने इस बात का जिक्र किया कि दोषियों का कृत्य और घटना के समय पीड़िता से उनके द्वारा यह कहना, कि उनकी इच्छा की पूर्ति करने वाली वह पहली (महिला) नहीं है, उनके (दोषियों के) सुधार या पुनर्वास की गुंजाइश को खत्म कर देता है। अदालत ने अपने फैसले में कवि खलील जिबरान को उद्धृत करते हुए कहा, और आप उन्हें कैसे दंडित करेंगे जिनका पश्चाताप उनकी करतूतों से कहीं अधिक है?

पीठ ने 108 पृष्ठों के अपने फैसले की शुरूआत महिला अधिकार कार्यकर्ता लुक्रेटिया मॉट को उद्धृत करते हुए किया, विश्व ने अब तक सचमुच में एक महान और सच्चरित्र राष्ट्र नहीं देखा है क्योंकि महिलाओं की स्थिति में गिरावट से जीवन को अपने स्रोत में ही विषाक्त कर दिया गया है।

अदालत ने कहा कि महिलाएं हर राष्ट्र की रीढ़ की हड्डी हैं और इसलिए वे अपने वाजिब सम्मान की हकदार हैं तथा महिलाओं का आदर सम्मान एक सभ्य समाज की पहचान है। उच्च न्यायालय ने कहा कि पीड़िता महाराष्ट्र राज्य पीड़िता मुआवजा योजना के तहत मुआवजा पाने की हकदार है।

निचली अदालत ने 22 अगस्त 2013 को 22 साल की फोटो पत्रकार के साथ हुई घटना के मामले में मार्च, 2014 में चार लोगों को दोषी ठहराया था। अदालत ने जाधव, बंगाली और अंसारी को मौत की सजा सुनाई थी, क्योंकि इन तीनों को फोटो पत्रकार के साथ बलात्कार से कुछ महीनों पहले इसी स्थान पर 19 वर्षीय एक टेलीफोन ऑपरेटर के सामूहिक बलात्कार के मामले में भी दोषी ठहराया गया था। इन तीनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (ई) के तहत मौत की सजा सुनाई गई।

मामले के चौथे दोषी सिराज खान को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और एक नाबालिग आरोपी को सुधार केंद्र भेज दिया गया था। जाधव, बंगाली और अंसारी ने अप्रैल 2014 में उच्च न्यायालय में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (ई) की वैधता को चुनौती दी थी और दावा किया था कि सत्र अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाकर अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर कदम उठाया।(भाषा)



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