सावन में उत्तराखंड के नीलकंठ महादेव के दर्शन क्यों हैं खास? जानें समुद्र मंथन और भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक मान्यता
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में ऋषिकेश के निकट स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर सावन में शिवभक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है। मान्यता है कि समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष का पान करने के बाद भगवान शिव ने इसी क्षेत्र में तपस्या की थी।
सीएम धामी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, ऋषिकेश के निकट पौड़ी गढ़वाल जनपद में स्थित देवाधिदेव महादेव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर अत्यंत पावन तीर्थस्थल है। पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण यह धाम सावन मास में विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है।
उन्होंने कहा कि देशभर से लाखों शिवभक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर नीलकंठ महादेव पहुंचते हैं और भोलेनाथ का जलाभिषेक कर उनकी कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। पौड़ी गढ़वाल जनपद आगमन पर आप भी इस पावन मंदिर के दर्शन अवश्य करें।
ऋषिकेश के निकट पौड़ी गढ़वाल जनपद में स्थित देवाधिदेव महादेव को समर्पित नीलकंठ महादेव मंदिर अत्यंत पावन तीर्थस्थल है। पौराणिक मान्यताओं और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण यह धाम सावन मास में विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है।
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) August 12, 2026
देशभर से लाखों शिवभक्त कांवड़ में गंगाजल लेकर नीलकंठ… pic.twitter.com/xK7yjxEpAz
2 नदियों के संगम पर बना मंदिर
नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर, समुद्र तल से करीब 1,330 मीटर की ऊंचाई पर, मणिकूट, ब्रह्मकूट और विष्णुकूट पहाड़ियों के बीच पंकजा और मधुमती नदियों के संगम पर बसा है।
क्या है पौराणिक मान्यता?
मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल (कालकूट) विष का पान भगवान शिव ने यहीं किया था। विष पीने से भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे उनका नाम 'नीलकंठ' पड़ा। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए भगवान शिव ने यहां लंबे समय तक तपस्या की थी।

