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केदारनाथ में मानव अवशेषों का मिलना हैरानी की बात नहीं

Updated: रविवार, 16 अक्टूबर 2016 (14:56 IST)
देहरादून। केदार घाटी में अब तक मिल रहे मानव अवशेषों को लेकर जारी बहस के बीच रुद्रप्रयाग के जिला मजिस्ट्रेट राघव लांगर ने रविवार को कहा कि वर्ष 2013 में हुई त्रासदी की विकरालता को देखते हुए घाटी के विभिन्न हिस्सों से 1 दशक बाद भी अगर मानव अवशेष मिलें तो यह हैरानी की बात नहीं होगी।
 
लांगर ने कहा कि केदार घाटी में मिल रहे मानव कंकालों को लेकर राजनीतिक दलों के हंगामे की वजह से उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के मुख्य स्रोत पर्यटन को नुकसान पहुंचेगा।
 
उन्होंने कहा कि हादसे के 3 साल बाद भी केदार घाटी में मानव अवशेषों के मिलने को लेकर जारी बहस के पीछे तर्क मेरी समझ से परे है। हादसे की विकरालता तो देखें। अकेले केदार घाटी में 3,985 लोग लापता हुए थे जिन्हें बाद में मृत घोषित कर दिया गया था। इनमें से केवल 827 लोगों के ही कंकाल मिले थे और उनका क्रिया-कर्म किया गया था। 
 
लांगर ने बताया कि इसकी वजह से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि शेष लोगों का अब तक पता नहीं चल पाया है और कई टन मलबे के नीचे उनके अवशेष दबे हैं। इस तथ्य को देखते हुए अब से अगर 25 साल बाद भी केदार घाटी में मानव कंकाल मिलते रहे तो मुझे कोई हैरानी नहीं होगी। 
 
उन्होंने कहा कि वर्ष 2013 की त्रासदी के बाद घाटी के भौगोलिक परिदृश्य में भी व्यापक बदलाव हो गया और इसे अपने मूल रूप में आने में लंबा समय लगेगा।
 
लांगर ने पहाड़ियों और ऊंचे इलाकों में मानव अवशेषों को खोजने के लिए विभिन्न एजेंसियों द्वारा लंबा अभियान चलाए जाने की सराहना करते हुए कहा कि राशन की समुचित आपूर्ति न हो पाने और अन्य विषमताओं के बीच लगभग जमा देने वाले तापमान में 12,000 फुट की ऊंचाई पर 827 लोगों के अवशेषों का पता लगाने के लिए किए गए प्रयासों की खातिर निश्चित रूप से वे सराहना के पात्र हैं।
 
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने हाल ही में कहा था कि वे हमेशा से ही कहते रहे हैं कि केदारनाथ इलाके में अब भी शव पड़े हैं, लेकिन राज्य सरकार ने उनके दावे को असत्य बताते हुए खारिज कर दिया था।
 
रुद्रप्रयाग के जिला मजिस्ट्रेट ने कहा कि बृहस्पतिवार को त्रियुगीनारायण और केदारनाथ के बीच घने तथा चढ़ाई वाले जंगल के रास्ते में मानव कंकाल मिले हैं। तथ्यों का पता लगाने के लिए अभियान चलाया गया लेकिन फिलहाल कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
 
बहरहाल, उन्होंने कहा कि ज्यादातर संभावना यह है कि मार्ग पर मिले मानव कंकाल उन श्रद्धालुओं के हैं, जो आपदा के दौरान मारे गए थे। वैसे भी इस इलाके में अंतिम मानव बस्ती वाले तोशी गांव और कंकाल मिलने वाले स्थान के बीच की दूरी कम से कम 15 किमी है वह भी चढ़ाई वाली।
 
लांगर ने कहा कि उस ऊंचाई पर उन लोगों के अलावा और कौन जाएगा जिन्हें अभूतपूर्व संकट का सामना करना पड़ा और जो अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे थे। जाहिर है कि लोग भ्रमित होकर घने जंगल की ओर पहुंच गए और उनकी जान चली गई। (भाषा)
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