उत्तर रामायण : काकभुशुंडी की 5 खास बातें

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अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: बुधवार, 22 अप्रैल 2020 (14:41 IST)
चित्र सौजन्य : सीरियल, रामानंद सागर
रामायण और रामचरित मानस में काकभुशुण्डि का उल्लेख मिलता है। में इसका उल्लेख मिलता है। आओ जानते हैं कि यह काकभुशुंडी कौन था।

1. कहते हैं कि सर्वप्रथम श्रीराम की कथा भगवान श्री शंकर ने माता पार्वतीजी को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का पुनर्जन्म काकभुशुंडी के रूप में हुआ। जब राम बालक थे तब वे उनके पास ही रहते थे। काकभुशुण्डि को पूर्व जन्म में भगवान शंकर के मुख से सुनी वह रामकथा पूरी की पूरी याद थी। इसीलिए वे राम का पास रहकर बाल लीला देखते रहते थे। लेकिन एक बार उन्होंने राम के हाथ से रोटी का एक टुकड़ा छीन लिया तो राम रोने लगे। काकभुशुण्डि सोच में पड़ गए कि क्या तीनों लोका का स्वामी रोटी के एक छोटे टुकड़े के लिए रो सकता है।

उनके मन भ्रम उत्पन्न हो गया और वे यह सोच कर वहां से उड़ चले कि यह तो कोई साधारण बालक है। आकाश में बहुत ऊंचे और बहुत दूर जाने के बाद अचानक उनकी नजर पीछे पड़ी तब पता चला कि वह बाल की अपनी शक्ति से उनके पीछे आ रहा है। काकभुशुण्डि तभी चक्कर खाकर नीचे गिरने लगे। जब उन्हें होश आया तो देखा कि वे तो उसी बालक के चरणों में गिरे पड़े हैं तो महल में ही अभी तक रो रहा है। प्रभु की यह लीला देखकर उनकी आंखों से आंसू निकल आए।

2. काकभुशुण्डि के राम कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार रामकथा का प्रचार-प्रसार हुआ। काकभुशुण्डि इस कथा को भगवान गरूड़ ने सुनी। गरुढ़ से ऋषि याज्ञ्यवल्यक ने सुनी। कहते हैं कि वाल्मीकि को यह राम कथा राम के वनवास से लौट आने के बाद नारदजी ने सुनाई थी।

जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गिद्धराज गरूड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरूड़ को संदेह हो गया। गरूड़ का संदेह दूर करने के लिए देवर्षि नारद उन्हें ब्रह्माजी के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उनको शंकरजी के पास भेज देते हैं। भगवान शंकर ने भी गरूड़ को उनका संदेह मिटाने के लिए काकभुशुण्डिजी के पास भेज दिया। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरूड़ के संदेह को दूर किया।

3. लोमश ऋषि के शाप के चलते काकभुशुण्डि कौवा बन गए थे। लोमश ऋषि ने शाप से मु‍क्त होने के लिए उन्हें राम मंत्र और इच्छामृत्यु का वरदान दिया। कौवे के रूप में ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया।


लोमश ऋषि परम तपस्वी तथा विद्वान थे। इन्हें पुराणों में अमर माना गया है। हिन्दू महाकाव्य महाभारत के अनुसार ये पाण्डवों के ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर के साथ तीर्थयात्रा पर गए थे और उन्हें सब तीर्थों का वृत्तान्त बतलाया था। लोमश ऋषि बड़े-बड़े रोमों या रोओं वाले थे। इन्होंने भगवान शिव से यह वरदान पाया था कि एक कल्प के बाद मेरा एक रोम गिरे और इस प्रकार जब मेरे शरीर के सारे के सारे रोम गिर जाऐं, तब मेरी मृत्यु हो।

4. कहा जाता है कि काकभुशुण्डि ने भुशुंडीरामायण (विरचित) लिखी थी।

5. एक कथा के अनुसार एक बार अयोध्या में अकाल पड़ा और काकभु‍शुंडी अवंतिका (उज्जैन)। तब वह एक क्षूद्र था। वहां जाकर वह एक वीप्र की सेवा करने लगा। वीप्र ने उसे अपने यहां ही आश्रय दिया। एक बार जब वीप्र भगवान शंकर की पूजा प्रार्थना कर रहा था तब इससे उसका घोर अपमान कर दिया।

इस पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके उसे शाप दे दिया कि, तुमने अपने गुरु का निरादर किया है इसलिए अब तुझे सर्प की अधम योनि मिलेगी और उस योनि के बाद तुझे 1000 बार अनेक योनि में जन्म लेना पड़ेगा। काकभुशुंडी के गुरु बड़े दयालु थे इसलिए उन्होंने शिवजी की स्तुति करके अपने शिष्य के लिए क्षमा प्रार्थना की।

गुरु के द्वारा क्षमा याचना करने पर भगवान शंकर ने आकाशवाणी करके कहा, ब्राह्मण! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जाएगा। इसको 1000 बार जन्म अवश्य ही लेना पड़ेगा किन्तु इसे जन्म-मरण का दुख नहीं होगा और ना ही यह अपने किसी भी जन्म की स्मृति को भूलेगा। इसे अपने प्रत्येक जन्म का स्मरण बना रहेगा। जगत् में इसे कुछ भी दुर्लभ न होगा और मेरी कृपा से इसे भगवान श्रीराम के चरणों के प्रति भक्ति भी प्राप्त होगी।

इस तरह काकभुशुंडी को हर जन्म की याद बनी रही। समय के साथ श्रीरामजी के प्रति भक्ति भी उसमें उत्पन्न हो गई। उसने अंतिम शरीर ब्राह्मण का पाया। ब्राह्मण बनने पर वह ज्ञानप्राप्ति के लिए लोमश ऋषि के पास गया। जब लोमश ऋषि उसे ज्ञान देते थे तो वह उनसे अनेक प्रकार के तर्क-कुतर्क करता था। उसके इस व्यवहार से कुपित होकर लोमश ऋषि ने उसे शाप दे दिया कि जा तू कौआ हो जा। वह तत्काल कौआ बनकर उड़ गया।

श्राप देने के बाद लोमश ऋषि को पश्चाताप हुआ और उन्होंने उस कौए को वापस बुलाकर राममंत्र दिया और साथ ही इच्छा मृत्यु का वरदान भी दिया। कहते हैं कि कौए का शरीर पाने के बाद ही राममंत्र मिलने के कारण उस शरीर से उन्हें प्रेम हो गया और वे कौए के रूप में ही रहने लगे कालांतर में काकभुशुण्डि के नाम से पहचाने गए।



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