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सौभाग्य सुंदरी व्रत : शिव-पार्वती के पूजन का पर्व

Updated: शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016 (12:36 IST)
* उत्साह और उमंग का त्योहार गणगौर
 

 
भारत भर में गणगौर के त्योहार को उमंग, उत्साह और जोश से मनाया जाता है। इसे सौभाग्य सुंदरी व्रत भी कहते हैं। प्रतिवर्ष होली के दूसरे दिन से ही गणगौर का त्योहार आरंभ हो जाता है, जो पूरे अठारह दिन तक लगातार चलता रहता है। बड़े सवेरे ही होली की राख को गाती-बजाती महिलाएं अपने घर लाती हैं। मिट्टी गलाकर उससे सोलह पिंडियां बनाती हैं, शिव और पार्वती बनाकर सोलह दिन बराबर उनकी पूजा करती हैं।
 
दीवार पर सोलह बिंदिया कुंकुम की, सोलह बिंदिया मेहंदी की और सोलह बिंदिया काजल की प्रतिदिन लगाती हैं। कुंकुम, मेहंदी और काजल तीनों ही श्रृंगार की वस्तुएं हैं। सुहाग की प्रतीक हैं। शंकर को पूजती हुई कुंआरी कन्याएं प्रार्थना करती हैं कि उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो।

शंकर और पार्वती को आदर्श दंपत्ति माना गया है। दोनों के बीच अटूट प्रेम है। शंकरजी के जीवन और मन में कभी दूसरी स्त्री का ध्यान नहीं आया। सभी विवाहित महिलाएं भी अपने जीवन में पति का अखंड प्रेम चाहती हैं। किसी और की साझेदारी की वे कल्पना तक करना पसंद नहीं करतीं।
 
कन्याएं भी एक समूह में सजधज कर दूब और फूल लेकर गीत गाती हुई बाग-बगीचे में जाती हैं। घर-मोहल्लों से गीतों की आवाज से सारा वातावरण गूंज उठता है। कन्याएं कलश को सिर पर रखकर घर से निकलती हैं तथा किसी मनोहर स्थान पर उन कलशों को रखकर इर्द-गिर्द घूमर लेती हैं। मिट्टी की पिंडियों की पूजा कर दीवार पर गवरी के चित्र के नीचे सोलह कुंकुम और काजल की बिंदिया लगाकर हरी दूब से पूजती हैं। साथ ही इच्छा प्राप्ति के गीत गाती हैं।
 

 
एक बुजुर्ग औरत फिर पांच कहानी सुनाती है। यह होती हैं शंकर-पार्वती के प्रेम की, दाम्पत्य जीवन की मधुर झलकियों की। उनके आपस की चुहलबाजी की सरस, सुंदर साथ ही शिक्षाप्रद छोटी-छोटी कहानियां और चुटकुले। महिलाएं इस त्योहार को उमंग, उत्साह और पूरे जोश से मनाती है। महिलाएं गहनों-कपड़ों से सजी-धजी रहती हैं। नाचना और गाना तो इस त्योहार का मुख्य अंग है ही। 
 
घरों के आंगन में, सालेड़ा आदि नाच की धूम मची रहती है। परदेश गए हुए इस त्योहार पर घर लौट आते हैं। जो नहीं आते हैं उनकी बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा की जाती है। आशा रहती है कि गणगौर की रात को जरूर आएंगे। झुंझलाहट, आह्लाद और आशा भरी प्रतीक्षा की मीठी पीड़ा को व्यक्त करने का साधन नारी के पास केवल उनके गीत हैं। यह गीत उनकी मानसिक दशा के बोलते चित्र हैं। 
 
चैत्र शुक्ल तीज को गणगौर की प्रतिमा एक चौकी पर रख दी जाती है। यह प्रतिमा लकड़ी की बनी होती है। उसे जेवर और वस्त्र पहनाए जाते हैं। फिर उस प्रतिमा की शोभायात्रा निकाली जाती है। आज के आधुनिक दौर में पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही हैं। युवा वर्ग का रुझान इन प्रचलनों की तरफ कम होने लगा है। मगर साथ ही कई युवक-युवतियां ऐसे भी हैं, जो इन परंपराओं को जीवंत रखने के लिए उनका निर्वहन करने का प्रयास कर रहे हैं।      


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