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Sanja Festival 2019 : 16 दिनों का लोक पर्व 'संजा', जानिए पौराणिक महत्व

Updated: गुरुवार, 26 सितम्बर 2019 (09:49 IST)
* श्राद्ध के 16 दिन और संजा पर्व 
 
 
प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक अर्थात् पूरे श्राद्ध पक्ष में 16 दिनों तक संजा पर्व मनाया जाता है। कई स्थानों पर कन्याएं आश्विन मास की प्रतिपदा से इस व्रत की शुरुआत करती हैं। 
 
इस त्‍योहार को कुंआरी यु‍वतियां बहुत ही उत्‍साह और हर्ष से मनाती हैं। श्राद्ध पक्ष में 16 दिनों तक इस पर्व की रौनक ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक देखी जा सकती है। आइए जानते हैं संजा लोक पर्व का पौराणिक महत्व। क्यों माना गया है यह पर्व खास- 
 
* इन दिनों चल रहे श्राद्ध पक्ष के पूरे 16 दिनों तक कुंआरी कन्याएं हर्षोल्लासपूर्ण वातावरण में दीवारों पर बहुरंगी आकृति में 'संजा' गढ़ती हैं तथा ज्ञान पाने के लिए सिद्ध स्त्री देवी के रूप में इसका पूजन करती हैं। 
 
* एक लोक मान्यता के अनुसार- 'सांझी' सभी की 'सांझी देवी' मानी जाती है। संध्या के समय कुंआरी कन्याओं द्वारा इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। संभवतः इसी कारण इस देवी का नाम 'सांझी' पड़ा है।
 
* कुछ शास्त्रों के अनुसार धरती पुत्रियां सांझी को ब्रह्मा की मानसी कन्या संध्या, दुर्गा, पार्वती तथा वरदायिनी आराध्य देवी के रूप में पूजती हैं।
 
* सांजी, संजा, संइया और सांझी जैसे भिन्न-भिन्न प्रचलित नाम अपने शुद्ध रूप में संध्या शब्द के द्योतक हैं।
 
* संजा पर्व के पांच अंतिम दिनों में हाथी-घोड़े, किला-कोट, गाड़ी आदि की आकृतियां बनाई जाती हैं।
 
* सोलह दिन के लोक पर्व के अंत में अमावस्या को सांझी देवी को विदा किया जाता है।
 
16 दिनों कि प्रतिदिन गोबर से अलग-अलग संजा बनाकर फूल व अन्य चीजों से उसका श्रृंगार किया जाता है तथा अंतिम दिन संजा को तालाब व नदी में विसर्जित किया जाता है। इस तरह इस पर्व का समापन हो जाता है।

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लेखक के बारे में
राजश्री कासलीवाल
श्रीमती राजश्री कासलीवाल पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों का अनुभव। धर्म, व्रत-त्योहार, ज्योतिष, रेसिपी, साहित्य, लाइफ स्टाइल और अन्य विषयों पर लेखन का कार्य। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सीनियर सब-एडिटर (कंटेंट) के पद पर कार्यरत हैं।  .... और पढ़ें

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