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Mahalakshami Muhurat 2025? महालक्ष्मी ज्येष्ठा गौरी व्रत कब से कब तक, जानिए शुभ मुहूर्त, मंत्र और पूजा विधि

Written By WD Feature Desk
Updated: गुरुवार, 28 अगस्त 2025 (17:13 IST)
Mahalaxmi Puja 2025: इस बार महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला 3 दिवसीय महालक्ष्मी का व्रत 31 अगस्त 2025 रविवार से शुरू हो रहा है जो 2 सितंबर 2025 मंगलवार को समाप्त होगा। यहां पर महालक्ष्मी की पूजा गौरी के रूप में होती है, इसलिए इसे ज्येष्ठ गौरी व्रत भी कहते हैं। ज्येष्ठा गौरी देवी पार्वती का ही एक रूप हैं। यह त्योहार देवी गौरी को समर्पित होता है, जो धन, समृद्धि और शांति का प्रतीक हैं।
 
तीन दिवसीय व्रत में क्या करते हैं?
1. गौरी मूर्ति स्थापना: इस तीन दिवसीय उत्सव में देवी गौरी की मूर्ति घर लाकर स्थापना करते हैं। इस अवसर पर अनुराधा नक्षत्र में देवी के आगमन का उत्सव मानाकर मूर्ति स्थापित करते हैं।
 
2. गौरी आवाहन और पूजन: दूसरे दिन उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। ज्येष्ठा नक्षत्र में गौरी पार्वती की पूजा की जाती है और महानैवेद्य अर्पित किया जाता है।
 
3. गौरी विसर्जन: तीसरे दिन मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। तीसरे दिन, मूल नक्षत्र में गौरी का विसर्जन किया जाता है।
महालक्ष्मी ज्येष्ठा गौरी स्थापना, पूजा और विसर्जन का शुभ मुहूर्त:
1. स्थापना: अनुराधा नक्षत्र समय 31 अगस्त को शाम को 05:27 तक। अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11:56 से 12:47 के बीच।
2. पूजन: ज्येष्ठा नक्षत्र समय 01 सितंबर को शाम को 07:55 तक। अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11:55 से 12:46 के बीच।
3. विसर्जन: मूल नक्षत्र समय 2 सितंबर को रात्रि 09:51 तक। अभिजीत मुहूर्त- दोपहर 11:55 से 12:46 के बीच।
 
इस तरह 3 दिवसीय ज्येष्ठा गौरी व्रत 31 अगस्त से शुरू होकर 2 सितंबर 2025 को इसका समापन होगा। इसके साथ ही सोलह दिवसीय महालक्ष्मी पर्व भी इस वर्ष 31 अगस्त 2025 से शुरू होकर 14 सितंबर 2025 तक चलेगा। यह व्रत पूरे 16 दिनों तक चलता है और माना जाता है कि इसे करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है और दरिद्रता दूर होती है।
 
महालक्ष्मी पूजा विधि:
- महालक्ष्मी व्रत के दिन प्रात:काल में स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें। 
- व्रत संकल्प के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करें। 
 
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रतमें त्वत्परायणा।
तदविघ्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:।।
- अर्थात् हे देवी, मैं आपकी सेवा में तत्पर होकर आपके इस महाव्रत का पालन करूंगा/करूंगी। मेरा यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो। 
 
- मां लक्ष्मी जी से यह कहकर अपने हाथ की कलाई में डोरा बांध लें जिसमें 16 गांठें लगी हों। 
- यह व्रत भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रतिदिन आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तक किया जाता है। 
- तत्पश्चात 16वें दिन व्रत पूरा हो जाने पर वस्त्र से एक मंडप बनाकर उसमें लक्ष्मी जी की प्रतिमा रखें।
- माता की पूजन सामग्री में चंदन, ताड़ के वृक्ष का पत्ता/ ताड़ पत्र, पुष्प माला, अक्षत, दूर्वा, लाल सूत, सुपारी, नारियल तथा नाना प्रकार की सामग्री रखी जाती है। 
- पूजन के दौरान नए सूत 16-16 की संख्या में 16 बार रखें। इसके बाद निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
 
क्षीरोदार्णवसम्भूता लक्ष्मीश्चन्द्र सहोदरा।
व्रतोनानेत सन्तुष्टा भवताद्विष्णुबल्लभा।।
- अर्थात् क्षीरसागर से प्रकट हुईं लक्ष्मी, चन्द्रमा की सहोदर, विष्णुवल्लभा मेरे द्वारा किए गए इस व्रत से संतुष्ट हों। 
- श्री लक्ष्मी को पंचामृत से स्नान कराएं फिर 16 प्रकार से पूजन करके व्रतधारी व्यक्ति 4 ब्राह्मण और 16 ब्राह्मणियों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें। 
 
- इस प्रकार यह व्रत पूरा होता है।
- 16वें दिन महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन किया जाता है।
- अगर कोई व्रतधारी किसी कारणवश इस व्रत को 16 दिनों तक न कर पाए तो केवल 3 दिन तक भी इस व्रत को कर सकता है जिसमें पहले, 8वें और 16वें दिन यह व्रत किया जाता है।

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