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सुख और सौभाग्य देता हर छठ / हल षष्ठी व्रत, जानिए इसकी विशेषता और कैसे करें पूजन

Updated: मंगलवार, 20 अगस्त 2019 (16:15 IST)
21 अगस्त 2019, बुधवार को हर छठ व्रत मनाया जाएगा। भारत भर में हर छठ (हल षष्ठी) व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व भगवान श्री कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन श्री बलराम जी का जन्म हुआ था। 
 
श्री बलराम जी का प्रधान शस्त्र हल तथा मूसल है। इसी कारण उन्हें हलधर भी कहा जाता है। उन्हीं के नाम पर इस पर्व का नाम 'हल षष्ठी या हर छठ' पड़ा। भारत के कुछ पूर्वी हिस्सों में इसे 'ललई छठ' भी कहा जाता है।
 
विशेषता : पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रतिवर्ष भाद्रपद माह की छठी तिथि को महिलाएं अपने पुत्र के दीर्घायु होने और उन्हें असामयिक मौत से बचाने के लिए हर छठ या हल षष्ठी व्रत करती हैं। इस दिन महिलाएं ऐसे खेत में पैर नहीं रखतीं, जहां फसल पैदा होनी हो और ना ही पारणा करते समय अनाज व दूध-दही खाती है।
 
आइए जानें हर छठ (हल षष्ठी) व्रत की विशेषता
 
* इस दिन हल पूजा का विशेष महत्व है।
 
* इस दिन गाय के दूध व दही का सेवन करना वर्जित माना गया है।
 
* इस दिन हल जुता हुआ अन्न तथा फल खाने का विशेष माहात्म्य है।
 
* इस दिन महुए की दातुन करना चाहिए।
 
* यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को विशेष तौर पर करना चाहिए। 
 
* हर छठ के दिन दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद शाम को पसही के चावल या महुए का लाटा बनाकर पारणा करने की मान्यता है।
 
कैसे करें हर छठ व्रत :-  
 
* भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।
 
* तपश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर गोबर लाएं।
 
* इसके बाद पृथ्वी को लीपकर एक छोटा-सा तालाब बनाएं।
 
* इस तालाब में झरबेरी, ताश तथा पलाश की एक-एक शाखा बांधकर बनाई गई 'हर छठ' को गाड़ दें।
 
* पश्चात इसकी पूजा करें।
 
* पूजा में सतनाजा (चना, जौ, गेहूं, धान, अरहर, मक्का तथा मूंग) चढ़ाने के बाद धूल, हरी कजरियां, होली की राख, होली पर भुने हुए चने के होरहा तथा जौ की बालें चढ़ाएं।
 
* हर छठ के समीप ही कोई आभूषण तथा हल्दी से रंगा कपड़ा भी रखें।
 
* पूजन करने के बाद भैंस के दूध से बने मक्खन द्वारा हवन करें।
 
* पश्चात कथा कहें अथवा सुनें।
 
अंत में निम्न मंत्र से प्रार्थना करें : -
 
गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलेपर्वते।
स्नात्वा कनखले देवि हरं लब्धवती पतिम्‌॥
ललिते सुभगे देवि-सुखसौभाग्य दायिनि।
अनन्तं देहि सौभाग्यं मह्यं, तुभ्यं नमो नमः॥
 
- अर्थात् हे देवी! आपने गंगा द्वार, कुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी आपको बारंबार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिए।
 

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