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डोल ग्यारस का दिन है बहुत खास : सुख-समृद्धि के लिए क्या करें आज

Updated: रविवार, 8 सितम्बर 2019 (17:11 IST)
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को जलझूलनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इसे परिवर्तिनी एकादशी एवं डोल ग्यारस आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान वामन की पूजा का विशेष महात्म्य है। कुछ स्थानों पर इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की सूरज पूजा (जन्म के बाद होने वाला मांगलिक कार्यक्रम जलवा पूजन) की जाती है। 
 
कहते हैं इस एकादशी में चन्द्रमा अपनी 11 कलाओं में उदित होता है जिससे मन अतिचंचल होता है इसलिए इसे वश में करने के लिए इस दिन पद्मा एकादशी का व्रत रखा जाता है।
 
मान्यताओं के अनुसार इस दिन (श्रीकृष्ण के जन्म के 18 दिन बाद) यशोदाजी का जलवा पूजन किया था। उनके संपूर्ण कपड़ों का प्रक्षालन किया था। उसी परंपरा के अनुसरण में डोल ग्यारस का त्योहार मनाया जाता है।
 
इस वृत को करने से जातक को वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। जब कोई व्यक्ति अपने प्रतिस्पर्धियों में सबसे आगे निकलना चाहता है। सम्राट के समान उपाधि प्राप्त करना चाहता है तो इस मनोकामना पूर्ति के लिए वाजपेय यज्ञ किया जाता है। डोल ग्यारस व्रत का नियम पालन दशमी तिथि की रात से ही शुरू करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान वामन की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथासंभव उपवास करें उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।
 
इसके बाद भगवान वामन की पूजा विधि-विधान से करें यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं। भगवान वामन को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़कें और उस चरणामृत को पीएं। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।
 
विष्णु सहस्त्रनाम का जाप एवं भगवान वामन की कथा सुनें। रात को भगवान वामन की मूर्ति के समीप ही सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें जो मनुष्य श्रद्धा के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं उनके समस्त पाप नष्ट हो कर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
 
डोल ग्यारस का महत्व
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है। इससे जीवन से समस्त संकटों, कष्टों का नाश हो जाता है और व्यक्ति को मृत्यु के उपरांत मोक्ष प्राप्त हो जाता है। वह सीधा भगवान विष्णु के परम लोक बैकुंठ चला जाता है। जीवन में मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, पद, धन-धान्य की प्राप्ति के लिए यह एकादशी प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए।

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