बच्चों के मन में डर क्यों?
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बच्चा सहम गया। अब दोबारा जब वह साड़ी के पास आएगा तो हाथ में भय होगा। सोचेगा दो बार, दस बार- पकड़ना साड़ी कि नहीं पकड़ना! पहले माँ के चेहरे को पहचान लो। पता नहीं इनकार हो जाए। क्योंकि तब बड़ा दुःख सालता है, घाव हो जाता है। जब तुम्हारे प्रेम को कोई इनकार कर दे, तो इससे बड़ी कोई पीड़ा संसार में दूसरी नहीं।
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फिर बच्चा बड़ा होता है; स्कूल जाता है। वहाँ कोई अपना नहीं है। शिक्षक अपना नहीं, संगी-साथी अपने नहीं, वह सिकुड़ा हुआ है। धीरे-धीरे बड़ी दुनिया में प्रवेश करता है, वह सिकुड़ जाता है। अब वह डरता है। अब उसको भय है कि वह किसी के पास प्रेम का निवेदन करे और वह कह दे, हटो भी! अपनी शक्ल आईने में देखो!
तो इससे बेहतर है, अपमान से तो बेहतर है इस उपाय को भी कभी न करना। चुप रहो। कभी कोई प्रेम करेगा तो शायद खुद आ जाएगा।
लेकिन दूसरे की भी यही मुसीबत है। वह भी डरा हुआ है। लोग प्रेम करने को पैदा हुए हैं, और प्रेम से भयभीत हैं। लोग बिना प्रेम के जीवन की गहनता को न जान पाएँगे, और प्रेम से भयभीत हैं। लोग बढ़ना चाहते हैं, प्रेम करना चाहते हैं, लेकिन डर है अस्वीकार का। चोट लगेगी। उससे बेहतर अकेले जी लेना है। कम से कम किसी को चोट देने का मौका तो नहीं दिया; अपमान तो नहीं हुआ।
इसलिए तुमसे कहता हूँ कि चट्टान से, वृक्ष से- वे तुम्हें इनकार न करेंगे। और वे उतने ही प्रेम के लिए आतुर हैं जितना कोई और। और उनसे तुम्हें कभी चोट न पहुँचेगी।
साभार : सबै सयाने एक मत
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन
