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जब Gen-Z सड़कों पर उतरी, हिल गईं सरकारें! 5 साल में 5 देशों में गिरी सरकारें, कहीं राष्ट्रपति भागे तो कहीं PM ने छोड़ी कुर्सी

Student Protests
Student Protests: कभी छात्रों को केवल विश्वविद्यालयों की राजनीति तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब दुनिया के कई देशों में वही छात्र सत्ता परिवर्तन की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं। पिछले पांच वर्षों में नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, केन्या, सर्बिया समेत कई देशों में छात्र और जेन-जी आंदोलनों ने सरकारों को झुकाया या सत्ता परिवर्तन का रास्ता बनाया। जानिए इन आंदोलनों का इतिहास, कारण और वैश्विक असर।

नेपाल में तो देखते ही देखते सत्ता Gen-Z के हाथों में आ गई। श्रीलंका में राष्ट्रपति को देश छोड़ना पड़ा, बांग्लादेश में 15 साल पुरानी सरकार गिर गई, केन्या में सरकार को टैक्स कानून वापस लेना पड़ा और सर्बिया में छात्रों के दबाव में प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दे दिया। सवाल है—क्या दुनिया एक नए 'स्टूडेंट स्प्रिंग' के दौर में प्रवेश कर चुकी है?

छात्र राजनीति से जनक्रांति तक

"युवा किसी देश का भविष्य ही नहीं, वर्तमान की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति भी होते हैं।"नेल्सन मंडेला

विश्व इतिहास गवाह है कि जब भी युवाओं ने संगठित होकर व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाई, राजनीति की दिशा बदल गई। 1968 का पेरिस छात्र आंदोलन, चीन का तियानआनमेन आंदोलन, दक्षिण अफ्रीका का सोवेटो विद्रोह और अरब स्प्रिंग—इन सभी में छात्रों की निर्णायक भूमिका रही।

1968 के फ्रांसीसी छात्र आंदोलन के दौरान पूरे देश में हड़ताल और प्रदर्शन फैल गए थे। उस समय राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने स्वीकार किया था कि देश गंभीर राजनीतिक संकट में है। हालांकि उनकी सरकार तत्काल नहीं गिरी, लेकिन आंदोलन के बाद उन्हें समय से पहले चुनाव कराने पड़े और अगले वर्ष इस्तीफा देना पड़ा। यह उदाहरण बताता है कि छात्र आंदोलनों का प्रभाव केवल विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी बदल सकता है।

लेकिन 2022 के बाद जो बदलाव दिखा है, वह अलग है। इस बार आंदोलनों का नेतृत्व किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि जेन-जी (1997-2012 के बीच जन्मी पीढ़ी) ने किया। सोशल मीडिया पर संगठित, विकेंद्रीकृत और बिना किसी एक नेता के चलने वाले इन आंदोलनों ने कई देशों की राजनीति बदल दी। विशेषज्ञ इसे "डिजिटल सिविल रेजिस्टेंस" का नया मॉडल मान रहे हैं।

पिछले पांच वर्षों में जहां छात्रों ने सत्ता को चुनौती दी


1. श्रीलंका (2022): आर्थिक संकट से सत्ता परिवर्तन
2022 में श्रीलंका गहरे आर्थिक संकट में डूब गया। ईंधन, दवाइयों और खाद्य पदार्थों की भारी कमी हो गई। विश्वविद्यालयों के छात्रों और युवाओं ने "अरगलया" (संघर्ष) आंदोलन शुरू किया।
क्या हुआ?
  • राष्ट्रपति भवन पर प्रदर्शनकारियों का कब्जा।
  • राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर भागे।
  • अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
  • दशकों से प्रभावशाली राजपक्षे परिवार की राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई।
यह आंदोलन आज भी दुनिया के सबसे सफल शांतिपूर्ण जनआंदोलनों में गिना जाता है।

2. बांग्लादेश (2024): छात्रों ने गिराई 15 साल पुरानी सरकार
2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण (कोटा) नीति के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन जल्द ही भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और लोकतांत्रिक अधिकारों के व्यापक आंदोलन में बदल गया।
परिणाम
  • व्यापक हिंसा और सैकड़ों लोगों की मौत।
  • प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद छोड़ना पड़ा।
  • अंतरिम सरकार का गठन हुआ।
  • नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस को अंतरिम प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
यह आंदोलन पूरी तरह सोशल मीडिया आधारित नेटवर्किंग, छात्र संगठनों और विकेंद्रीकृत नेतृत्व पर आधारित था।


3. केन्या (2024): टैक्स कानून वापस
केन्या में सरकार नया वित्त विधेयक (Finance Bill) लाई, जिसमें टैक्स बढ़ाने का प्रस्ताव था।

युवाओं ने क्या किया?
  • TikTok, X और Instagram के जरिए आंदोलन संगठित हुआ।
  • लाखों युवा संसद के बाहर जुटे।
  • संसद भवन में घुसने तक की नौबत आई।
नतीजा
  • सरकार ने पूरा वित्त विधेयक वापस लिया।
  • राष्ट्रपति विलियम रुटो को कई फैसले बदलने पड़े।
हालांकि सरकार नहीं गिरी, लेकिन यह दुनिया का पहला बड़ा उदाहरण बना जहां सोशल मीडिया आधारित जेन-जी आंदोलन ने आर्थिक नीति पलटवा दी।

4. सर्बिया (2024-25) : छात्रों ने प्रधानमंत्री का इस्तीफा कराया
नवी साद रेलवे स्टेशन हादसे में 15 लोगों की मौत के बाद छात्रों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।
आंदोलन धीरे-धीरे राष्ट्रीय अभियान बन गया।

परिणाम
  • लाखों लोग सड़कों पर उतरे।
  • प्रधानमंत्री मिलोस वुचेविच ने इस्तीफा दिया।
  • सरकार पर व्यापक सुधारों का दबाव बना।
छात्रों की सबसे बड़ी ताकत उनका गैर-राजनीतिक और विकेंद्रीकृत संगठन माना गया।

5. नेपाल (2025–26) : जेन-ज़ी आंदोलन से उभरा नया नेतृत्व

नेपाल में 2025 में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बेरोज़गारी के खिलाफ शुरू हुआ Gen Z आंदोलन जल्द ही राष्ट्रीय जनआंदोलन में बदल गया। इसकी अगुवाई किसी एक राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि छात्रों और युवाओं के विकेंद्रीकृत नेटवर्क ने की।

क्या हुआ? 
  • विश्वविद्यालयों के छात्रों और युवाओं ने देशव्यापी प्रदर्शन शुरू किए।
  • सोशल मीडिया प्रतिबंध के विरोध ने भ्रष्टाचार और सुशासन के मुद्दों को भी आंदोलन का हिस्सा बना दिया।
  • व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और अंतरिम व्यवस्था बनी। 
परिणाम 
  • 2026 के आम चुनाव में युवा मतदाताओं ने पारंपरिक दलों के बजाय बदलाव का समर्थन किया।
  • काठमांडू के लोकप्रिय पूर्व मेयर बालेंद्र "बालेन" शाह (Balen Shah), जिन्हें Gen Z का चेहरा माना जाता है, भारी जनसमर्थन के साथ नेपाल के प्रधानमंत्री बने।
  • नेपाल का उदाहरण बताता है कि छात्र और युवा आंदोलन हमेशा सीधे सत्ता नहीं बदलते, लेकिन वे राजनीतिक नेतृत्व बदलने की ज़मीन तैयार कर सकते हैं। यहाँ सड़कों पर शुरू हुई युवा असंतोष की लहर अंततः लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए नए नेतृत्व के उदय में बदल गई।

इन आंदोलनों में क्या समानता थी?

"जेन-जी आंदोलनों की सबसे बड़ी वजह आर्थिक असुरक्षा, सत्ता से दूरी और भ्रष्टाचार के प्रति बढ़ता असंतोष है।"जर्नल ऑफ डेमोक्रेसी, 2026,

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इन सभी आंदोलनों में पांच समान तत्व दिखाई देते हैं—

1. कोई बड़ा नेता नहीं
पारंपरिक आंदोलनों की तरह यहां कोई एक चेहरा नहीं था। आंदोलन ऑनलाइन नेटवर्क के जरिए चलता रहा।

2. सोशल मीडिया बना मुख्य हथियार
WhatsApp, Telegram, TikTok, Instagram और X पर मिनटों में लाखों लोगों को संगठित किया गया।

3. भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा
लगभग हर देश में युवाओं का सबसे बड़ा आरोप था कि पुरानी राजनीतिक व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी है।

4. बेरोजगारी और महंगाई
महंगाई, रोजगार संकट और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं में असंतोष बढ़ाया।

5. राजनीति से निराशा
जेन-जी खुद को पारंपरिक राजनीतिक दलों से जुड़ा हुआ नहीं मानती। इसलिए उनके आंदोलन अधिक स्वस्फूर्त और वैचारिक रूप से विविध रहे।

इतिहास बताता है, छात्र हमेशा बदलाव की धुरी रहे हैं






भारत का 1974 जेपी आंदोलन: जब छात्रों ने राजनीति की दिशा बदल दी

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 1974 का बिहार छात्र आंदोलन एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। उस समय देश महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता से जूझ रहा था। बिहार में छात्रों ने पहले स्थानीय मुद्दों पर आंदोलन शुरू किया। जल्द ही यह आंदोलन राज्य सरकार के विरोध से आगे बढ़कर व्यापक राजनीतिक असंतोष का प्रतीक बन गया।

इसी दौर में स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) सक्रिय राजनीति में लौटे। उन्होंने छात्रों का नेतृत्व स्वीकार किया और "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान किया। उनका तर्क था कि केवल सरकार बदलने से समस्या का समाधान नहीं होगा; राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और समाज—सभी में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। उनके गांधी मैदान, पटना के भाषण ने आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

1974 और 1975 के दौरान आंदोलन बिहार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया। इसी बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य ठहराया, जिससे राजनीतिक संकट और गहरा गया। बढ़ते विरोध और अस्थिरता के बीच 25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित किया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगी, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए।

जब मार्च 1977 में आम चुनाव हुए तो जनता ने पहली बार केंद्र में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया और जनता पार्टी की सरकार बनी। इतिहासकारों का सामान्य आकलन है कि 1974 का छात्र आंदोलन, जेपी का नेतृत्व, आपातकाल का अनुभव और विपक्ष की एकजुटता—इन सभी ने मिलकर 1977 के सत्ता परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार की।

यही कारण है कि भारत का जेपी आंदोलन केवल एक छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के पुनर्जागरण का अध्याय माना जाता है।
 

'मंडल बनाम कमंडल' की राजनीति

अगस्त 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने (अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC को सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण देने) की घोषणा के बाद देशव्यापी आंदोलन छिड़ गया। विशेषकर उत्तर भारत के सवर्ण छात्रों ने इसका हिंसक विरोध किया। इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति और समाज को हमेशा के लिए बदल दिया। इसने सामाजिक न्याय को मजबूत किया, लेकिन साथ ही जातिगत ध्रुवीकरण और आरक्षण की राजनीति को भी गहरा कर दिया। इसी दौरान, राजनीतिक संतुलन साधने के लिए भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 'सोमनाथ से अयोध्या राम रथ यात्रा' शुरू कर दी (इसे राजनीति में 'मंडल बनाम कमंडल' का दौर कहा जाता है)। बिहार में आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार गिर गई।
Student Protests

क्या हर आंदोलन सरकार बदल देता है?

नहीं। राजनीति विज्ञान के विशेषज्ञ मानते हैं कि सफल आंदोलन के लिए केवल जनसमर्थन पर्याप्त नहीं होता। हार्वर्ड के प्रोफेसर एरिका चेनोवेथ (Erica Chenoweth) और मैथ्यू सेबुल के अनुसार "1990 से 2020 के बीच जिन अहिंसक आंदोलनों में युवाओं की बड़ी भागीदारी रही, उनके सफल होने की संभावना अन्य आंदोलनों की तुलना में दो गुना से अधिक रही।"

उनका शोध यह भी बताता है कि जेन-जी आंदोलन भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक जवाबदेही जैसे मुद्दों पर सबसे तेजी से संगठित होते हैं, लेकिन इनकी सबसे बड़ी चुनौती आंदोलन की ऊर्जा को संस्थागत और चुनावी राजनीति में बदलना होती है।

सत्ता परिवर्तन अक्सर इन परिस्थितियों में संभव होता है—
  • आर्थिक संकट गहरा हो।
  • सरकार की वैधता कमजोर पड़ जाए।
  • सुरक्षा तंत्र पूरी तरह सरकार के साथ न रहे।
  • विपक्ष या वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध हो।
  • आंदोलन लंबी अवधि तक शांतिपूर्ण और संगठित बना रहे।
यही कारण है कि कई देशों में आंदोलन नीति परिवर्तन तक सीमित रहते हैं, जबकि कुछ में सत्ता परिवर्तन हो जाता है।

लेकिन सत्ता बदलना और शासन चलाना अलग बात है
हालिया अनुभव यह भी बताते हैं कि सरकार गिराने के बाद सबसे बड़ी चुनौती शासन चलाने की होती है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और अन्य देशों में नई सरकारों को आर्थिक संकट, राजनीतिक ध्रुवीकरण और संस्थागत सुधार जैसी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई विश्लेषकों का मानना है कि आंदोलन को चुनावी और संस्थागत राजनीति में बदलना सबसे कठिन चरण होता है।

क्या यह नई वैश्विक राजनीतिक लहर है?

राजनीतिक वैज्ञानिकों का मानना है कि 21वीं सदी के छात्र आंदोलन विचारधारा (Ideology) की बजाय 'गवर्नेंस' (सुशासन) के मुद्दों पर केंद्रित हैं। यही कारण है कि श्रीलंका, बांग्लादेश, केन्या और सर्बिया जैसे देशों में युवाओं ने पारंपरिक राजनीतिक दलों के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्वयं को संगठित किया।

हार्वर्ड कैनेडी स्कूल और काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस जैसे संस्थानों के शोध बताते हैं कि जेन-जी की राजनीति पहले की पीढ़ियों से अलग है। यह वैचारिक पहचान की बजाय भ्रष्टाचार, जवाबदेही, रोजगार, महंगाई और सुशासन जैसे मुद्दों पर तेजी से संगठित होती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत डिजिटल नेटवर्क है और सबसे बड़ी कमजोरी स्थायी नेतृत्व का अभाव।

विश्वविद्यालय अब सिर्फ शिक्षा के नहीं, राजनीति की भी प्रयोगशाला बन रहे हैं

इतिहास बताता है कि हर छात्र आंदोलन सरकार नहीं गिराता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब किसी देश के विश्वविद्यालयों में भविष्य को लेकर बेचैनी बढ़ने लगती है, तो उसकी गूंज देर-सबेर संसद और सत्ता के गलियारों तक जरूर पहुंचती है।

श्रीलंका से लेकर सर्बिया तक की घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि 21वीं सदी में राजनीतिक बदलाव की सबसे बड़ी प्रयोगशाला शायद अब संसद नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय परिसर और डिजिटल प्लेटफॉर्म बनते जा रहे हैं। Gen Z ने यह साबित किया है कि आज की राजनीति केवल चुनावी रैलियों से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन, सोशल मीडिया नेटवर्क और कैंपस की बहसों से भी तय हो सकती है।

हालांकि इतिहास यह भी सिखाता है कि किसी सरकार को बदलना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन एक बेहतर और जवाबदेह व्यवस्था खड़ी करना कहीं अधिक कठिन। आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा प्रश्न यही होगा—क्या Gen Z केवल सत्ता परिवर्तन की ताकत बनकर उभरेगी, या वही पीढ़ी भविष्य की नई राजनीतिक व्यवस्था की भी निर्माता बनेगी?
लेखक के बारे में
संदीप सिंह सिसोदिया
वन-लाइनर बायो: IIM इंदौर से प्रशिक्षित और 20+ वर्षों का अनुभव रखने वाले डिजिटल मीडिया लीडर व वरिष्ठ संपादक, जिन्होंने BBC,  DW, Yahoo और MSN जैसे वैश्विक संस्थानों के साथ कार्य किया है। वे जियो-पॉलिटिक्स, पर्यावरण और समसामयिक  मुद्दों पर अपने प्रखर लेखन और गहन विश्लेषण के लिए विशेष रूप से.... और पढ़ें
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