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ओशो थे हिन्दू धर्म के विरोधी और बौद्ध धर्म के समर्थक?

Updated: शनिवार, 7 दिसंबर 2024 (17:59 IST)
चन्द्र मोहन जैन ऊर्फ ओशो रजनीश खुद को भगवान कहते थे। दुनिया उन्हें धर्म विरोधी और सेक्स गुरु कहती है। ओशो कहते हैं कि यदि आप मेरा समर्थन नहीं कर सकते को कृपया करके विरोध जरूर करना, आलोचना जरूर करना। क्योंकि यदि में सही हूं तो इस विरोध और आलोचना से निखर जाऊंगा और यदि गलत हूं तो इतिहास के गर्त में खो जाऊंगा।
 
 
20वीं सदी के महान विचारक तथा आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश आज भी प्रासंगिक है तो उनके चाहने और उनके विरोधियों के कारण। ओशो संगठित धर्म, समाज और राष्‍ट्र के विरोधी रहे हैं। ओशो कहते हैं कि दुनिया अनुयायियों की वजह से बेहाल है इसलिए तुम मेरी बातों से प्रभावित होकर मेरा अनुयायी मत बनना अन्यथा एक नए तरीके की बेवकूफी शुरू हो जाएगी। मैं जो कह रहा हूं उसका अनुसरण करने मत लग जाना। खुद जानना की सत्य क्या है और जब जान लो कि सत्य यह है तो इतना कर सको तो करना कि मेरे गवाह बन जाना। इसके लिए भी कोई आग्रह नहीं है।
 
 
70 के दशक में ओशो और ओशो के संन्यासियों को दुनियाभर में प्रताड़ित किया गया, यह बात सर्वविदित है, लेकिन इससे भी ज्यादा दुखदायी बात यह है कि ओशो प्रेमियों को आज भी इस संदेह से देखा जाता है कि मानो वह कोई अनैतिक या समाज विरोधी हैं।
 
 
ओशो ने जब पहली बार धर्मग्रंथों पर सदियों से जमी धूल को झाड़ने का काम किया तो तलवारें तन गईं। यह तलवारें आज भी तनी हुई हैं, जबकि दबी जबान से वही तलवारबाज कहते हैं कि कुछ तो बात है ओशो में। लेकिन हम खुलेआम इस बात को कह नहीं सकते। चोरी से पढ़ते हैं ओशो को और फिर रचते हैं अपना साहित्य, अपना दर्शन और अपना धार्मिक संगठन। खैर... आज हम यहां ओशों की आलोचना करेंगे और वह भी उनके जम्मोत्सव के दिन।
 
 
बौद्ध धर्म के समर्थक ओशो?
ओशो के ऐसे कई विचार आपको उनके प्रवचनों में मिल जाएंगे जो कि धर्म, समाज और देश विरोधी माने जाते हैं। उन्होंने हिन्दू धर्म और देवी देवताओं की खूब जमकर आलोचना की है। हालांकि उन्होंने बौद्ध धर्म को छोड़कर सभी धर्मों की खूब जमकर आलोचना की है। इसका मतलब यह कि वे बौद्ध धर्म के फालोअर थे?
 
 
यदि आपने ओशो को सुना और पढ़ा है तो आपको एक बात यह समझ में आ जाएगी कि वे अपने हर प्रवचनों में भगवान बुद्ध को जरूर कोड करते हैं। वे कुछ भी कहें लेकिन वे आपके मन को बुद्ध की ओर बड़े ही सुंदर तरीके से मोड़ने में सक्षम हैं। उनकी नजर में गौतम बुध से बड़कर पहले कोई न तो हुआ और न ही होगा। ओशो बुद्ध के प्रेमी हैं यह बात उन्होंने अपने कई प्रवचनों में स्पष्ट कर दी है। वे कहते भी हैं कि गौतम बुद्ध इस संसार का अंतिम सत्य और दर्शन है। उनका ही धर्म अंतिम धर्म है।
 
 
यदि आपने ओशो को सुना और पढ़ा है तो आपको एक बात यह समझ में आ जाएगी कि वे अपने हर प्रवचनों में भगवान बुद्ध को जरूर कोड करते हैं। वे कुछ भी कहें लेकिन वे आपके मन को बुद्ध की ओर बड़े ही सुंदर तरीके से मोड़ने में सक्षम हैं। उनकी नजर में गौतम बुध से बड़कर पहले कोई न तो हुआ और न ही होगा। ओशो बुद्ध के प्रेमी हैं यह बात उन्होंने अपने कई प्रवचनों में स्पष्ट कर दी है। वे कहते भी हैं कि गौतम बुद्ध इस संसार का अंतिम सत्य और दर्शन है। उनका ही धर्म अंतिम धर्म है।
 
 
*ओशो ने आदि शंकराचार्य का बहुत जगह विरोध किया। हालांकि उन्होंने शंकराचार्य के ब्रह्मसूत्र पर बहुत ही सुंदर प्रवचन दिए हैं। इन प्रवचन श्रृंखला का नाम है 'भज गोविंदम भज गोविंदम मूढ़मते'। मतलब यह कि यह समझ में नहीं आता है कि वे शंकराचार्य के विरोधी हैं या समर्थक। ओशो के अनुसार शंकराचार्य ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनके कारण इस देश में बौद्ध धर्म नहीं फैल पाया।... लेकिन अब यदि आप शंकराचार्य के जीवन को पढ़ेंगे तो मात्र 32 साल की उम्र में उन्होंने देह त्याग दी थी। 11 वर्ष की उम्र में घर छोड़ा था। 32 में से 11 घटा दें तो 21 वर्ष उन्होंने धर्म की सेवा की। इस दौरान वे संपूर्ण भारत में पैदल ही भ्रमण करते रहे। पैदल भ्रमण में कितना समय लगता है आप अनुमान लगा सकते हैं। मतलब जिंदगी का आधा समय पैदल भ्रमण में ही निकल गया।
 
 
भ्रमण के दौरान वे चतुर्मास में जहां भी रुके वहां उन्होंने वैदिक सनातन धर्म के बारे में प्रवचन उन लोगों को ही दिए जो हिन्दू ही थे। उन्होंने किसी बौद्ध राजा या अनुयायियों को धर्मान्तरित करने का काम नहीं किया। 21 वर्ष में उन्होंने दसनामी संप्रदाय का गठन किया, चार मठों के पास अपने चार पीठ स्थापित किए थे बस। संभवत: ओशो को इतिहास की जानकारी नहीं होगी इसलिए वे ऐसा बोल गए होंगे। बौद्ध धर्म इस देश से कैसे नष्ट हो गया इसके लिए आपको मुगलों का इतिहास पढ़ना चाहिए। तक्षशिला और नालंदा के विद्यालय किसी शंकराचार्य के शिष्य ने नहीं तोड़े थे। तक्षशिला में 10 हजार भिक्षुओं का कत्लेआम किसी शंकराचार्य के शिष्यों ने नहीं किया था।
 
 
हिन्दू धर्म के विरोधी हैं ओशो:-
ओशो ने हिन्दुओं की संन्यास पद्धति और संन्यासियों का खूब मजाक उड़ाया। उन्होंने अपने 'नव-संन्यास' की नींव ही इस आधार पर रखी कि व्यक्ति को कहीं हिमालय, जंगल, आश्रम या गुफा में बैठकर ध्यान करने की जरूरत नहीं। किसी को भी घर छोड़कर मोक्ष के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं यहीं गृहस्थ में रहकर ही मोक्ष पाया जा सकता है। यहीं ओशो संन्यासियों के बीच रहकर नाच-कूदकर मोक्ष पाया जा सकता। लेकिन हमने देखा है कि ओशो संन्यासी वर्षों से नाचते-कूदते आएं हैं लेकिन हमें तो कोई मोक्ष प्राप्त व्यक्ति नजर नहीं आया।
 
 
इस नव-संन्यास में संन्यासी को कोई भगवा या गेरुए वस्त्र पहनने की जरूरत नहीं। माला और नियमों का पालन करने की जरूरत भी नहीं। पूजा-पाठ, ईश्वर-प्रार्थना आदि करने की जरूरत नहीं। यम, निमय का पालन करने की जरूरत भी नहीं। वे आचरण की शुद्धता पर भी बल नहीं देते हैं। ओशो ने हिन्दुओं के संन्यास को पाखंड बताया है। वे जोरबा-टू-बुद्ध जैसे संन्यास की बात करते हैं। 'जोरबा' का अर्थ होता है- एक भोग-विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति और 'बुद्धा' का अर्थ निर्वाण पाया हुआ। अब सोचीए क्या यह संभव है। इंद्रियों को भोग-विलास की आदत हो जाएगी तो वह कैसे मोक्ष की ओर मुड़ेगी? ऊपर हम कामी और शराबी का उदाहरण दे आए हैं।
 
 
दलितों के समर्थक और ब्राह्मण विरोधी ओशो:-
*ओशो पर आरोप है कि उन्होंने अपने तर्कों से हिन्दू धर्म का विरोध कर दलितों को भड़काने का कार्य भी खूब किया है। वे कहते हैं कि मोची समाज के लोग तो जन्मजात ही बौद्ध होते हैं, जबकि ओशो को मोची समाज के इतिहास के बारे में रत्तीभर भी जानकारी नहीं है कि वे मोची कैसे और कब बन गए। वे पहले से ही या प्राचीनकाल से ही मोची नहीं थे। जब चमड़े के चप्पल और जूते का अविष्कार हुआ तभी तो वे मोची बने होंगे? इसके पहले वे क्या थे इस पर कोई विचार नहीं करता है। मुगल और अंग्रेज काल का सही से जिसे इतिहास नहीं मालूम वह वर्तमान को देखकर ही अपने विचारगढ़ता है।
 
 
ओशो कहते हैं कि ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों ने दलितों पर 10 हजार वर्षों तक अत्याचार किए है तो निश्चत ही उन्हें 10 हजार वर्षों तक तो आरक्षण मिलना ही चाहिए।.... यदि ओशो सच बोलते और वह धर्म की राजनीति नहीं करते तो निश्चित ही वह यह कहते हैं कि ब्राह्मण या मनुवाद जैसा कोई वाद नहीं होता है। प्राचीनकाल में ऐसे कई लोग राजा, पुरोहित या संन्यासी हुए हैं जिन्हें वर्तमान के युग में प्रचलित धारणा के अनुसार दलित समाज का माना जाएगा। ऐसे कई ऋषि कुमार, राजपुत्र थे जो कि दलित थे। भारतीय राजनीति में सेक्युलरवादियों ने जिन दो शब्दों का सर्वाधिक उपयोग या दुरुपयोग किया वह है 'मनुवाद और ब्राह्मणवाद।' इन शब्दों के माध्यम से हिन्दुओं में विभाजन करके दलितों के वोट कबाड़े जा सकते हैं या उनका धर्मान्तरण किया जा सकता है। मनुवाद की आड़ में धर्म और राजनीति की रोटियां सेंकी जा सकती है।
 
 
धर्म विरोधी ओशो:-
ओशो कहते हैं कि 'सदियों से आदमी को विश्वास, सिद्धांत, मत बेचे गए हैं, जो कि एकदम मिथ्‍या हैं, झूठे हैं, जो केवल तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं, तुम्हारे आलस्य का प्रमाण हैं। तुम करना कुछ चाहते नहीं, और पहुंचना स्वर्ग चाहते हो।' परंतु कोई पंडित-पुरोहित या तथाकथित धर्म नहीं चाहते कि तुम स्वयं तक पहुंचो, क्योंकि जैसे ही तुम स्वयं की खोज पर निकलते हो, तुम सभी तथाकथित धर्मों- हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई के बंधनों से बाहर आ जाते हो। उस सभी के बाहर आ जाते हो, जो मूढ़तापूर्ण और निरर्थक हैं, क्योंकि तुमने स्वयं का सत्य पा लिया होता है।
 
 
धर्म तुम्हें भयभीत कर विश्‍वास करना सिखाता है ताकि तुम उनके ग्रंथों पर सवाल खड़े न करो। प्रॉफेटों पर सवाल खड़े न करो। सदियों से धर्मों ने यही किया है। दुनिया में अब धर्मों की जरूरत नहीं। धर्म का कोई भविष्‍य नहीं। मनुष्य ने अपनी पहचान को धर्म की पहचान से व्यक्त कर रखा है। कोई हिन्दू है, कोई मुसलमान, कोई सिख तो कोई ईसाई। धर्म के नाम पर आपसी भेदभाव ही बढ़े हैं। नतीजा यह है कि आज धर्म पहले है मनुष्य और उसकी मनुष्यता बाद में। ओशो कहते हैं, आनंद मनुष्य का स्वभाव है और आनंद की कोई जाति नहीं, उसका कोई धर्म नहीं।
 
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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