भारतीय रंग में अमेरिका
- सहीराम
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इधर भारत जब अमेरिका होने को आतुर है। अगर ज्ञानीजनों की मानें तो काफी कुछ तो हो भी लिया है, जिसकी पुष्टि इस बात से होती है कि देश के हर शहर और कस्बे में एक अमेरिका बसता है। तब अचानक ऐसे लगने लगा है कि अब तो खुद अमेरिका ही भारतीय रंग में रंगता जा रहा है। जी, निश्चित रहिए, हम यह नहीं बताने जा रहे हैं कि हॉलीवुड का कौन-सा सितारा, हमारे कौन-से बाबा की शरण में पहुँचा है और न ही हम यह बता रहे हैं कि किस अमेरिकी सेलिब्रिटी ने संस्कृत में टैटू गुदवाए हैं।
बात न संस्कृति की है और न संस्कृत की बल्कि बात तो गणित की है। ओबामा साहब अमेरिकी बच्चों को सीख दे रहे हैं कि गणित की पढ़ाई करो, वरना भारतीय बच्चे तुमसे आगे निकल जाएँगे। इधर उन्हें यही डर सताता रहता है कि बेंगलुरु कहीं बफैलो से आगे न निकल जाए, जबकि बफैलो को तो रहना ही पीछे है। वह न कछुआ है और न खरगोश। ज्ञानीजन खरगोश तो चीन को कह रहे हैं और कछुआ समझते हैं भारत को।
हमेशा की तरह उन्हें डर अब भी यही सता रहा है कि कहीं कछुआ फिर आगे न निकल जाए। शायद इसी डर से ओबामा साहब का भी स्वदेशीकरण हो रहा है और वे आउटसोर्सिंग बंद कर रहे हैं। उन्होंने घोषणा कर दी है कि उन्हीं कंपनियों को करों में छूट मिलेगी जो देश में रोजगार पैदा करेंगी। हमारे यहाँ के स्वदेशी आंदोलन वाले तो आजकल चुप हैं। कहीं उनका पेटेंट ओबामा साहब ने तो नहीं उड़ा लिया? रंग-ढंग तो वैसे ही हैं। पर ऐसे अमेरिका फिर अमेरिका कैसे रहेगा?
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पर यह जरूर लग रहा है कि वहाँ भी राजनीति हमारी तरह ही जाति और धर्म के रंग में रंगने लगी है क्योंकि बहुत से अमेरिकी यह मानने लगे हैं कि ओबामा साहब मुसलमान हैं, जबकि व्हाइट हाउस घोषणा कर रहा है कि वे क्रिश्चियन हैं। चिढ़कर ओबामा साहब कह रहे हैं कि मैं अपना जन्म प्रमाण पत्र हमेशा माथे पर चिपकाकर नहीं रख सकता। फिर हमारी तरह का ही कुछ मंदिर-मस्जिदनुमा झगड़ा भी वहाँ शुरू हो गया। ब
ताते हैं कि ओबामा प्रशासन ग्राउंड जीरो पर मस्जिद बनाना चाहता है और अमेरिकियों की बड़ी तादाद इसका विरोध कर रही है। इस पर ओबामा ने कहा कि जब वहाँ चर्च बन सकता है तो मस्जिद क्यों नहीं बन सकती? पर प्यारे, भारतीय रंग रंगना इतना आसान नहीं है। यह अध्यात्म नहीं है कि चोटी रखकर और गेरुआ पहनकर हरे रामा, हरे कृष्णा गाने लगोगे।

