sawan somwar

यह उनकी गलती थी? #UriAttack

Updated: मंगलवार, 20 सितम्बर 2016 (12:35 IST)
- सजन
उड़ी में मेरे 17 भाइयों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया है। मैं यह सब भारी मन से लिख रहा हूं।  इसलिए मुझे अपनी शुरुआत उनकी आत्माओं की शांति के साथ करने की इजाजत दें। 
रविवार, 18 सिंतबर की सुबह को जब हमने सुना तो हमारा खून खौल गया..... इससे पहले भी हम पर कई बार हमले किए गए हैं लेकिन हर बार हमने उन्हें चेतावनी दी और भारी भरकम शब्दों से लदे बयानों का इस्तेमाल किया। हमने उनकी निंदा की लेकिन किया कुछ नहीं।  हमने यह सोचकर एक नई सरकार को अपना वोट दिया, इसलिए कि इसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं करेगी लेकिन हम पर फिर एक बार हमला हुआ है....बार बार हमले हुए हैं...गुरदासपुर, उधमपुर, पठानकोट, हेरात, मजार-ए-शरीफ, जलालाबाद, पंपोर, पुंछ और अब उड़ी पर। यह किसकी गलती है?
हममें से बहुत से यह सही सवाल पूछते हैं कि हम क्यों नहीं सीमा पार जाते और उन्हें खदेड़कर क्यों नहीं मारते, आतंकी शिविरों पर हमला क्यों नहीं करते, उन पर मिसाइलों से हमले क्यों नहीं करते, उन पर ड्रोन से क्यों हमला नहीं करते ? ठीक वैसे ही हमले जैसे इसराइली और अमेरिकी करते हैं। महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाला देश महाशक्ति की तरह कार्रवाई क्यों नहीं करता है?  दस लाख से ज्यादा जवानों की हमारी सेना क्या कर रही है? हम बैठकों पर बैठकों क्यों करते हैं और विकल्पों पर ही क्यों विचार करते रहते हैं?  जब सांप निकल जाता है तो हम लकीर पीटते रहते हैं?     
 
इन सभी सवालों का जवाब है कि इन सभी बातों के लिए हम ही जिम्मेदार हैं? हां, हम ही अपने सबसे बड़े दुश्मन हैं... हम हमेशा ही एक दूसरे पर हावी होने का खेल खेलते हैं? जो अपना काम अच्छी तरह जानता है हम उसे अधिक चालाकी से मात देने में लगे रहते हैं। मैं नौकरशाहों (बाबुओं) के बारे में बात कर रहा हूं, उन नेताओं की बात कर रहा हूं और सशस्त्र सेनाओं के उन केवल अपना भला देखने वाले शीर्ष अधिकारियों की बात कर रहा हूं।   
 
 
अगर हमें तेजी से निर्णायक जवाब देना है तो हमें अपने सशस्त्र बलों को हमेशा पूरी तरह से तैयार रखना होगा। लेकिन इसके बावजूद हमारी सेनाओं के पास अधिकारियों, उपकरणों और गोला बारूद की कमी है? आधुनिक उपकरणों की खरीद के लिए चार वर्ष पहले कहा गया है लेकिन अब भी उन्हें खरीदने की स्वीकृति नहीं मिली है ? क्यों?  जब हम गंगा नदी को साफ करने पर करोड़ों की राशि बहा सकते हैं, बुलेट ट्रेन्स चला सकते हैं और कई अन्य नई-नई योजनाएं चला सकते हैं तो हम सुरक्षा बलों पर पर्याप्त पैसा क्यों नहीं खर्च कर सकते और उन्हें हमेशा ही युद्ध के लिए सौ फीसदी तैयारी के साथ रख सकते हैं?    
 
लेकिन जब जरूरत होती है वास्तविक तौर पर हथियार चलाने तो हम केवल बातों के गोला बारूद चलाकर अपनी कथित ताकत का निरर्थक प्रदर्शन करते हैं? हम किसी न किसी बहाने से सेना पर होने वाले खर्चे को कम करते जाते हैं। हम अपने सैनिकों को एक रैंक-एक पेंशन न देकर उनके नैतिक साहस को तोड़ते हैं? लेकिन हमारे पास घाटा उठाने वाले बैंकों की कई गुना भरपाई करने के लिए पैसा है? हम सीएपीएफ (सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज) की तुलना में सेना को नीचे रखते हैं और बलों पर धौंस जमाते हैं? हम उनके वाजिब भुगतान भी नहीं करते    
 
 
यदि हमने जल्दी से और निर्णायक जवाब दिया तो हमें जरूरत होगी पहले से तैयार रक्षाबलों की। फिर भी, हमें अभी कमी होगी अधिकारियों, उपकरण और गोला-बारूद की। चार साल पहले हमने आधुनिक उपकरणों की मांग की थी लेकिन अभी तक उसकी मंजूरी नहीं मिली! क्यों? हम गंगा की सफाई और बुलेट ट्रेनों के निर्माण पर करोड़ों रुपए खर्च करते हैं और कई अन्य योजनाएं चला सकते हैं, लेकिन 100 प्रतिशत युद्ध के लिए तैयार रहने वाले रक्षाबलों पर पैसा खर्च नहीं करते। हम किसी न किसी बहाने रक्षाबलों के लिए व्यय में कमी लाने का प्रयास करते हैं। 
 
अगर 17 जवानों की मौत टेंट में आग लगने से हुई है तो कई ने ठीक ही पूछा है कि वे क्यों टेंट में थे? क्या यह उनकी गलती थी कि वे कई वर्षों से बनी एक चौकी होने के बावजूद टेंट में थे? इसका जवाब तो सेना के लिए योजनाएं बनाने वाले ही दे सकते हैं। एक बाबू के तुच्छ तरीके की आपत्ति के कारण 8 महीने बीतने के बाद भी जवानों को टेंट में रहना पड़ रहा था, जबकि इसका बजट पारित हो चुका था। हर क्षेत्र में कार्यों की प्रगति धीमी है। और उपलब्ध धनराशि कम कर रहे हैं। ऐसा क्यों? 
 
यहां से बाहर निकलने का एक रास्ता है। सशस्त्र बल तैयार करने के निर्णय से बाबुओं को अलग रखना होगा। अनुरोध है कि सेना की संरचना को प्राथमिकता के आधार पर प्रदान किया जाना चाहिए। वित्तीय निर्णयों में बाबुओं का दखल नहीं हो। सेना में आदमी, मशीन और उपकरण पूरी तरह से तैयार हों। यदि हम पैसा देकर 'स्वच्छ भारत अभियान' से देश को स्वच्छ बना सकते हैं तो हम देश की रक्षा को भी पूरी तरह से तैयार करने में पैसा खर्च कर सकते हैं। 
 
देश की हानि के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं, जिनके कंधों पर पिन पाइंट की बड़ी जिम्मेदारी थी। रक्षामंत्री के पद से राजनेताओं को दूर रखा जाना चाहिए और यह जिम्मेदारी एक ऐसे व्यक्ति को दी जानी चाहिए, जिसकी पृष्ठभूमि सेना से जुड़ी हुई हो। रक्षामंत्री और पूर्व जनरलों को भी दी जा सकती है, जिन्हें इस फील्ड का पूरा ज्ञान होता है और वे सेना की अच्छे तरीके से तैयारी कर सकते हैं। यदि हम किसी से इस तरह का अनुरोध करेंगे तो वह सहर्ष तैयार भी हो जाएगा और अपने काम को प्रभावी ढंग से भी करेगा। उसके बाद ही हम सशस्त्र बलों को सही मायने में उचित प्रतिकार देने में सक्षम हो सकते हैं। 
(SajanSpeaks से साभार, लेखक सजन पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)
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