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कोई नहीं जानता मां का दर्द कश्मीर में...

Updated: मंगलवार, 12 सितम्बर 2017 (19:17 IST)
श्रीनगर। नर्क और मौत की वादी बन चुकी वादी-ए-कश्मीर में मां का दर्द कोई नहीं जानता। अपने बेटे का जनाजा देखना या फिर गुमशुदा बेटे की वापसी की आस में आंखों का पथरा जाना, शायद यही कश्मीर की मांओं की किस्मत में लिखा है। इनमें से कई मांएं तो विधवा हैं जिनके सहारे सिर्फ उनके बेटे हैं और कश्मीर की इन मांओं और विधवाओं की दुखभरी दास्तानें यह हैं कि आतंकवादी अब उनके बच्चों विशेषकर लड़कों को निशाना बना रहे हैं।
 
मां चाहे आतंकी की हो या फौजी की। मां सिर्फ मां होती है। उसके लिए बेटे का जनाजा देखना बहुत मुश्किल होता है। इसका सुबूत सोमवार को दक्षिण कश्मीर के हावूरा-कुलगाम में आतंक का पर्याय बने आतंकी दाऊद के जनाजे में भी मिला था।
 
आतंकियों की महिमा गाने वाले जब आतंकी दाऊद के जनाजे में जिहादी नारे लगाते हुए स्थानीय युवकों को बंदूक थामने के लिए उकसा रहे थे तो उस समय दिवंगत आतंकी की मां ने जैसे ही अपने बेटे की लाश को अपने घर आते देखा तो वह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई। उसे ब्रेन हैमरेज हो गया। बुजुर्ग औरत को उसी समय निकटवर्ती अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे शेरे कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान सौरा में भेज दिया। फिलहाल उसकी हालत चिंताजनक बनी हुई है।
 
और कश्मीर की इन मांओं और विधवाओं की दुखभरी दास्तानें यह हैं कि आतंकवादी अब उनके बच्चों विशेषकर लड़कों को निशाना बना रहे हैं। यही कारण था कि कुपवाड़ा के दरालापोरा की रहने वाली असिया बेगम अपने दो युवा बेटों और एक मासूम बेटी के साथ अब पलायन करने को मजबूर है। उसके पति को आतंकवादियों ने चार साल पहले मुखबिरी के आरोप में मार डाला था। उसने किसी तरह से पाल-पोसकर अपने तीनों बच्चों को बड़ा किया तो अब आतंकवादी उससे दोनों बेटों को मांग रहे हैं। ऐसा न करने पर दोनों की हत्या करने की धमकी देते हैं।
 
असिया बेगम तो पलायन कर अपने बच्चों को बचाने में कामयाब हो गई लेकिन रजिया बी ऐसा नहीं कर पाई। आतंकवादियों ने उसके बेटे की हत्या कर दी। पति पहले ही 14 सालों से सुरक्षाबलों की हिरासत में गायब हो गया था।
 
नतीजतन स्थिति आज कश्मीर में यह है कि आतंकवाद का शिकार होने वाली विधवाओं को दोहरी मार सहन करनी पड़ रही है। फाकाकशी के दौर से गुजर रही इन विधवाओं को अपने बेटों और बेटियों को बचाने की दौड़ लगानी पड़ रही है। सरकार उनकी मदद को आगे नहीं आ रही और सुरक्षाबल मात्र आश्वासन देकर काम चला रहे हैं।
 
ऐसी स्थिति सिर्फ कश्मीर के आतंकवादग्रस्त गांवों में ही नहीं है बल्कि जम्मू संभाग के अधिकतर आतंकवादग्रस्त क्षेत्रों में भी यही हाल है। हालांकि जम्मू संभाग के आतंकवादग्रस्त क्षेत्रों की कुछ विधवाओं ने अपने बेटों को इसलिए आतंकवादियों के साथ जाने से नहीं रोका ताकि कम से कम उनकी जानें बच जाएं। यह बात अलग है कि कइयों के अपहरण कर लिए गए और बाद में सीमा पार से उन्हें संदेश मिला कि उन्हें वहां ले जाया गया है।
 
गौरतलब है कि दाऊद और सयार को सुरक्षाबलों ने खुडवनी में हुई एक मुठभेड़ में मार गिराया था। दाऊद की मां की हालत पर प्रतिक्रिया जताते हुए एक स्थानीय बुजुर्ग अख्तर हुसैन ने बताया कि बेचारी बूढ़ी मां ने कई बार अपने बेटे को हथियार डालने के लिए कहा था। वह नहीं माना और आज उसकी लाश देखकर वह खुद मौत की दहलीज पर पहुंच गई है। कौन मां चाहेगी कि वह अपने बेटे की लाश देखे। खाविंद पहले ही मर चुका था, आज बेटा भी मर गया।
 
उन्होंने आतंकी के जनाजे में जिहादी तकरीरें कर कुछ लोगों की तरफ संकेत करते हुए कहा कि इन्हें दाऊद की मां का ख्याल नहीं है, इन्हें यहां किसी की मां का ख्याल नहीं है। अगर यह दाऊद के खैरख्वाह होते तो उसकी मां की फिक्र कर रहे होते, लेकिन इन्हें आम लोगों से क्या।
लेखक के बारे में
सुरेश एस डुग्गर
सुरेश डुग्गर वेबदुनिया के लिए जम्मू कश्मीर से समाचार संकलन के लिए अधिकृत हैं। वे तीन दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं।.... और पढ़ें
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