operation tiger devendra fadnavis: भारतीय जनता पार्टी में शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचने का रास्ता केवल चुनाव जिताने, विकास कार्य कराने या संगठन के प्रति निष्ठा दिखाने से नहीं बनता। कई बार सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर मौजूद शक्ति संतुलन होता है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस को लेकर आज यही सवाल उठ रहा है।
पिछले एक दशक में फडणवीस ने लगभग वही राजनीतिक मॉडल अपनाया, जिसने कभी नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति के शिखर तक पहुंचाया था। उन्होंने खुद को विकास पुरुष की छवि से जोड़ा, बड़े उद्योगपतियों और निवेशकों को महाराष्ट्र लाने की कोशिश की, बुनियादी ढांचे की राजनीति को आगे बढ़ाया और वैचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाए रखा।
राजनीतिक विरोधी अक्सर उन पर उद्योगपति समूहों के करीब होने का आरोप लगाते रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे कभी मोदी पर लगाए जाते थे। लेकिन भारतीय राजनीति में बड़े उद्योग और बड़े विजन की राजनीति अक्सर साथ-साथ चलती है। समस्या तब शुरू होती है जब कोई क्षेत्रीय नेता अपनी राज्य सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय संभावना में बदलने लगता है।
ऑपरेशन टाइगर की असल कहानी
महाराष्ट्र में चल रहा कथित 'ऑपरेशन टाइगर' केवल उद्धव ठाकरे या उनकी पार्टी को कमजोर करने की कहानी नहीं हो सकती। इसकी एक दूसरी व्याख्या यह भी है कि राज्य में किसी एक नेता को अत्यधिक शक्तिशाली बनने से रोकने की कोशिश हो रही है।
उद्धव ठाकरे ने अपनी राजनीतिक क्षति के बावजूद कई बार संकेत दिए हैं कि महाराष्ट्र की राजनीति में असली लड़ाई केवल शिवसेना की विरासत की नहीं, बल्कि भविष्य के नेतृत्व की भी है। वहीं राज ठाकरे ने आरोप लगाया कि अमित शाह विभिन्न राज्यों में अलग-अलग शक्ति केंद्र तैयार कर रहे हैं ताकि भविष्य में राष्ट्रीय राजनीति में समर्थन का व्यापक आधार मौजूद रहे। ये आरोप राजनीतिक हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन राजनीतिक बहस में इनका महत्व है।
सवाल यह है कि क्या एकनाथ शिंदे का राजनीतिक महत्व केवल महाराष्ट्र की सत्ता तक सीमित है या उसके पीछे राष्ट्रीय रणनीति भी काम कर रही है?
भाजपा का इतिहास बताता है कि पार्टी में राष्ट्रीय नेतृत्व का उभार बेहद नियंत्रित और संगठित प्रक्रिया के तहत होता है। लालकृष्ण आडवाणी के पास जनाधार था, वैचारिक स्वीकार्यता थी और संगठन पर गहरी पकड़ थी, लेकिन प्रधानमंत्री पद उनसे दूर रह गया।
राजनाथ सिंह पार्टी अध्यक्ष और सफल मुख्यमंत्री रहे, लेकिन राष्ट्रीय उत्तराधिकार की चर्चा में कभी निर्णायक स्थान नहीं बना सके। नितिन गडकरी को उनकी प्रशासनिक क्षमता और विकास मॉडल के बावजूद सीमित दायरे में रखा गया। शिवराज सिंह चौहान चार बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व की दौड़ में उनका नाम कभी गंभीरता से आगे नहीं बढ़ा।
क्या अब वही पैटर्न फडणवीस के सामने खड़ा है?
उनके पास प्रशासनिक अनुभव है, शहरी मतदाताओं में स्वीकार्यता है, निवेशकों का भरोसा है और संगठन में भी उनका विरोध नगण्य है। यही कारण है कि कई राजनीतिक विश्लेषक उन्हें भाजपा की अगली पीढ़ी के संभावित राष्ट्रीय चेहरों में गिनते हैं। लेकिन भारतीय राजनीति में संभावना और उत्तराधिकार दो अलग-अलग चीजें हैं।
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका केंद्रीय नेतृत्व रहा है। ऐसे में पार्टी शायद ही कभी किसी राज्य नेता को इतना बड़ा होने देना चाहेगी कि वह समानांतर राष्ट्रीय केंद्र बन जाए। यही कारण है कि मजबूत क्षेत्रीय नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखना भी संगठनात्मक रणनीति का हिस्सा माना जाता है।
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी और मात्र एक कयास होगा कि फडणवीस के प्रधानमंत्री बनने की राह में कोई राजनीतिक अवरोध खड़ा किया जा रहा है। लेकिन यह जरूर सच है कि महाराष्ट्र में बदलते समीकरणों को केवल राज्य की राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जा सकता।
क्योंकि दिल्ली की राजनीति में उत्तराधिकारी घोषित नहीं किए जाते, बल्कि समय के साथ तय होते हैं। और कई बार सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लड़ाइयां चुनावी मंचों पर नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में लड़ी जाती हैं।