आंदोलन किसी दल के भरोसे नहीं : अशोक सिंघल

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अयोध्या राम की जन्मस्थली है यह पूरी दुनिया जानती है। हिंदू पक्षकारों ने विवादित स्थल पर हिंदू मंदिर होने के पक्ष में ढेर सारे प्रमाण दिए हैं। कोर्ट के आदेश पर पुरात्तव विभाग के लोगों ने वहां खुदाई की। मंदिर के प्रमाण मिले। खुदाई के काम में हिंदू मुसलमान दोनों तरफ के लोग थे। यदि कोर्ट का फैसला किसी वजह से हमारे पक्ष में नहीं आया तो सुप्रीम कोर्ट का रास्ता खुला है। हिंदू कानूनी लड़ाई भी लड़ेगा और जनआंदोलन भी करेगा।

* कोर्ट का फैसला कोई मानेगा नहीं। वार्ता होगी नहीं। आखिर यह विवाद कितने साल चलेगा?
- रामजन्मभूमि के लिए हिंदू समाज 15वीं सदी से लड़ रहा है। तब से जब विदेशी आक्रामणकारी बाबर के आदेश पर रामजन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर एक मस्जिदनुमा ढांचा बनाया गया था। कभी-कभी मुझे लगता है कि यह विवाद मस्जिद का नहीं है बल्कि जन्मभूमि पर न बनने देने की एक महा जिद है। मुस्लिम समाज को हिंदुओं के नजरिए से अयोध्या और राम के महत्व को समझना चाहिए। तय मुस्लिम समाज को करना है कि वह हिंदुओं के साथ प्रेम के संबंध रखकर देश में रहना चाहता है या ताल ठोक कर।

* अयोध्या में यदि एक मंदिर नहीं बनेगा तो क्या हो जाएगा?
- यदि अयोध्या में जन्मभूमि पर राम का मंदिर नहीं बनेगा तो इस देश में हिंदू समाज और उसकी पहचान भी नहीं बचेगी। भारत की पहचान राम से और हिंदू की पहचान भी राम से और अयोध्या ऐसे राम की जन्मस्थली है। सवाल एक मंदिर का नहीं है बल्कि राम की जन्मभूमि का है। हमसे तो यह सवाल होता है कि यदि एक मंदिर नहीं बनेगा तो क्या होगा? लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि यदि रामजन्मभूमि पर एक मस्जिद नहीं बनेगी तो क्या हो जाएगा। दुनिया भर में अयोध्या को राम की नगरी के लिए जाना जाता है इस्लाम के लिए नहीं।

* मंदिर भी बन जाए और पास ही मस्जिद भी। आपको यह प्रस्ताव मंजूर होगा?
- संतों की हाल ही में दिल्ली में बैठक हुई थी, जिसमें संत समाज ने दो टूक शब्दों में कहा है कि श्रीरामजन्मभूमि का तथाकथित विवादित 90 गुणा 130 वर्ग फुट भूखंड सहित संपूर्ण 70 एकड़ अधिगृहीत परिसर अविभाज्य रूप से विराजमान रामलला का जन्म, लीला और क्रीड़ा स्थल है। इस परिसर में यदि मस्जिद बनने का प्रस्ताव आता है तो उसका जबरदस्त विराध किया जाएगा। अयोध्या में पहले से कोई चौहद मस्जिदें हैं। अयोध्या में जितने मुसलमान नहीं हैं उससे ज्यादा मस्जिदें हैं। फिर पता नहीं क्यों उसी स्थान पर बार-बार मस्जिद की वकालत की जाती है।

* यदि मंदिर-मस्जिद के निर्माण पर समझौता नहीं हो पा रहा है तो क्यों न कोई राष्ट्रीय समारक बना दिया जाए?
- सवाल रामजन्मभूमि का है, दिल बहलाने का नहीं। आपको ऐसा सवाल नहीं करना चाहिए। बाबर ने भी यही सोच कर मंदिर को तुड़वाया था कि भारत की पहचान और हिंदू समाज की आस्था को मिटाना है। आस्था का केंद्र होते हैं। मनोरंजन का स्थान नहीं। ऐसे सवाल आस्थाओं को ठेस पहुंचाने वाले हैं।

* तो आखिर इसका समाधान है क्या?
- मुस्लिम समाज सद्भाव दिखाए और जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण में अपना सहयोग दे। आखिर हम कब तक लड़ेंगे। दोनों को ही इस देश में रहना है। मैं मानता हूँ कि मुसलमानों में अधिकांश लोग शांतिप्रिय हैं, लेकिन कुछ जेहादी तत्व हैं जो भड़काते हैं क्योंकि उन्हें इस काम के लिए विदेशों से पैसा मिलता है।

* मुस्लिम समाज विवादित स्थल से अपना दावा वापस ले ले तो क्या गारंटी है कि किसी और स्थल को लेकर विवाद खड़ा नहीं किया जाएगा?
- मुस्लिम समाज अयोध्या में हिंदू समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए प्रेम और सद्भाव का रास्ता खोलने की पहल तो करे।

* भाजपा ने राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाया, लेकिन सत्ता में आने के बाद कुछ नहीं किया। कुछ नेता बदल गए। क्या ऐसे नेताओं के नाम लेना चाहेंगे?
- रामजन्मभूमि का आंदोलन किसी राजनीतिक दल के भरोसे नहीं है। यह आंदोलन रामभक्तों का है। भाजपा ने इस आंदोलन का इस्तेमाल सत्ता के लिए किया। उन्हें सत्ता मिली भी। अच्छा होता अपने शासनकाल में उन्होंने मंदिर निर्माण के लिए सहमति बनाने का काम किया होता। संतों का मानना रहा है कि आडवाणी की रथयात्रा से भाजपा को राजनीतिक फायदा हुआ लेकिन राम मंदिर आंदोलन को नुकसान भी हुआ। इससे ज्यादा मैं और कुछ कहना नहीं चाहता।

* आपको नहीं लगता कि अयोध्या का मुद्दा धार्मिक कम राजनीतिक अधिक हो गया है?
- भाजपा पर मंदिर की राजनीति करने का आरोप लगा, लेकिन कई दल ऐसे हैं जिन्होंने मस्जिद की राजनीति की। खासतौर से पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने। उत्तर प्रदेश में निहत्थे रामभक्त पर गोली चलवाई गई। कांग्रेस ने भी अयोध्या से अपना चुनावी रथ निकाला। मैं सभी दलों से अपील करूंगा कि अयोध्या को राजनीति के नजरिए से मत देंखे। क्या हमारे नेताओं को शोभा देता है कि रामलला कपड़े के टैंट में बैठे हैं। खुद को गाँधी का अनुयायी कहते हैं, क्या यह उन्हें शोभा देता है।

* संसद से कानून बनाकर मंदिर निर्माण का रास्ता निकल पाएगा?
- राम किसी एक दल के नहीं हैं और न ही राम मंदिर का मुद्दा किसी एक पार्टी का है। राम भारत की आत्मा हैं। रामभक्त कांग्रेस में भी हैं और भाजपा में भी। दूसरे दलों में भी राम को मानने वाले हैं। मेरा मानना है कि संसद और सांसद जरूर इस पर विचार करेंगे। नहीं करेंगे तो विचार करने के लिए मजबूर कर देंगे।

* चर्चा है कि अयोध्या आंदोलन को लेकर संत भी बंटे हुए हैं। शंकराचार्य स्वरूपानंद अलग मुहिम चला रहे हैं?
- यह कुप्रचार है। संतों में फूट डालने की तमाम कोशिशें विफल हो चुकी हैं। समस्त संत समाज रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के पक्ष में है।

* आपकी छवि एक कट्टर हिंदूवादी नेता और मुस्लिम विरोधी की बन गई या बना दी गई है। आपका क्या कहना है?
- मैं न तो इस्लाम के खिलाफ हूँ और न मस्जिद के। मैं भी हर धर्म का आदर करता हूँ। लेकिन मैं यह भी चाहता हूँ कि दूसरे मजहब के लोग भी हिंदू आस्थाओं और भावनाओं का सम्मान करें। लेकिन जिस प्रकार से एक वर्ग विशेष को लेकर राजनीति होती है और बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा की जाती है तब मुझे कष्ट होता है और भी लोगों को कष्ट होता होगा। अंतर इतना है कि मैं बोलता हूँ।

* भगवा आतंकवाद का मुद्दा बहस का विषय बना हुआ है? आपका क्या मानना है?
नई दिल्ली(रासविहारी/मनोज वर्मा)। अयोध्या का मुद्दा एक बार फिर गर्माया हुआ है। सुप्रीम ने विवादित स्थल के मालिकाना हक को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के आने वाले फैसले को रोकते हुए वार्ता के जरिए रास्ता निकालने का एक मौका दिया है। हिंदू और पक्षकार दोनों ही फैसला चाहते हैं। संत और विश्व हिंदू परिषद की गतिविधियाँ बढ़ गई हैं। अयोध्या के प्रस्तावित फैसले के बीच विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने 'नईदुनिया' से बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश।* सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर वार्ता के जरिए समाधान निकालने का मौका दिया है। आपको लगता है कि वार्ता के जरिए अयोध्या मामले में कोई समाधान निकल आएगा? - मैं कोर्ट के फैसले पर कोई टिप्पणी नहीं करूँगा। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से ठीक एक सप्ताह पहले फैसले को टलवाने की कोशिश क्यों की गई। मुझे इसके पीछे एक बड़ा षडयंत्र लगता है। कुछ शक्तियाँ हैं जो नहीं चाहतीं कि इस मुद्दे पर कोर्ट कोई फैसला दे। जहाँ तक वार्ता का सवाल है तो पूर्व में भी कई बार हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के बीच वार्ता के कई दौर हो चुके हैं, लेकिन बातचीत से कोई समाधान नहीं निकल पाया। वैसे, मैं बता दूँ कि अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को जो ढाँचा गिरा था वह मस्जिद नहीं था। वहाँ कोर्ट के आदेश से ही रामलला की पूजा हो रही थी।
* यदि फैसला हिंदू पक्षकारों के खिलाफ आया तो क्या आप उसे स्वीकार करेंगे?
- हमारे संतों ने साफ कर दिया है कि मंदिर वहीं बनेगा जहाँ है। पहली बात तो फैसला खिलाफ आएगा ऐसा हम नहीं मानते।
- जो लोग भगवा आतंकवाद की बात कर रहे हैं उन्हें पता ही नहीं है कि भगवा है क्या। राजनीतिक साजिश के साथ इसको बड़ा बनाकर पेश किया जा रहा है। इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे। भगवा रंग इस देश की पहचान है और इस पहचान को बदनाम करने का पाप कुछ लोग कर रहे हैं।



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