उपराष्ट्रपति चुनाव : इन चुनावों के संदेश महत्वपूर्ण हैं

उपराष्ट्रपति के रूप में जगदीप धनखड़ निर्वाचित होंगे इसे लेकर किसी को कोई संदेह नहीं था। कुल 780 सांसदों में से राजग के 441 सांसदों एवं पांच मनोनीत सांसदों के अलावा बीजू जनता दल, वाईआरएससी, बसपा, तेलुगूदेशम, अकाली दल और शिवसेना ने भी समर्थन दिया था जिनके कुल 81 सांसद हैं।

तृणमूल ने अपने 36 सांसदों के साथ पहले ही मतदान के बहिष्कार की घोषणा कर दिया था। इसलिए कुल मत 734 रह गया था। इनमें भी 725 सांसदों ने मतदान किया। धनखड़ को अपेक्षा के अनुरूप ही 528 वोट मिले। हालांकि मारग्रेट अल्वा को केवल 182 वोट मिलना विपक्ष के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

पूरा विपक्ष अगर उपराष्ट्रपति चुनाव में एकजुट होकर मतदान नहीं कर सकता तो इसका अर्थ गंभीर है। 1997 यानी 25 वर्ष बाद चुनाव में विजय का यह सबसे बड़ा अंतर है। वास्तव में धनखड़ की विजय महत्वपूर्ण तो है ही, लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण उस विजय के पीछे का अंकगणित तथा विपक्ष के उम्मीदवार को वोट कम मिलना है। यह वर्तमान एवं भविष्य की भारतीय राजनीति की एक बड़ी रूपरेखा है, जिसे गहराई से समझने की आवश्यकता है।

वास्तव में उपराष्ट्रपति चुनाव परिणाम के दो प्रमुख पहलू हैं। पहला, राजनीति का संकेत एवं दूसरा, जगदीप धनखड़ की भावी भूमिका। राष्ट्रपति से लेकर उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में वर्तमान और भावी भारतीय राजनीति के दृष्टि से एक बात समान थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और संघ का विरोध करते हुए भी भाजपा विरोधी पार्टियां दयनीय बिखराव का शिकार रहीं।

जिन 15 सांसदों के मत अमान्य हुए संभव है कुछ ने जानबूझकर ऐसा किया होगा। उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनाव को देखें तो ऐसा लगता है जैसे आजादी के बाद से 1977 तक विपक्ष कांग्रेस के सामने बिल्कुल कमजोर पड़ जाता था, थोड़े भिन्न रूप में भाजपा और नरेंद्र मोदी के संदर्भ में वही स्थिति बनती जा रही है। हालांकि आज विपक्षी दलों की संख्या उस समय से ज्यादा है,शक्ति भी अधिक है, मीडिया में उनकी मुखरता भी है।

बावजूद ऐसा लगता है जैसे भारतीय राजनीति भविष्य की दृष्टि से भाजपा के एकल वर्चस्व की ओर अग्रसर है। तृणमूल कांग्रेस उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान का बहिष्कार करेगा यह कल्पना से परे था। राज्यपाल के रूप में जगदीप धनखड़ एवं ममता बनर्जी सरकार के संबंध हमेशा तीखे रहे। बावजूद यदि ममता बनर्जी ने मतदान से अलग रहने का फैसला किया तो उसके मायने गंभीर है।

इन दोनों चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि विपक्ष चाहे नरेंद्र मोदी और

भाजपा के विरुद्ध अलग-अलग जितना जितनी आक्रामकता प्रकट करें वैचारिकता एवं दिशा का सर्वथा अभाव है। जब आपकी विचारधारा नहीं होती तो दिशा स्पष्ट नहीं होती और फिर आप समझ नहीं पाते कि हमें किस प्रसंग में क्या भूमिका निभानी है।
विपक्ष इसी दुरवस्था का शिकार है और यह राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों चुनावों में प्रकट हुआ है। तो लोकसभा चुनाव के पहले के ऐसे चुनाव में, जहां उसे एकजुटता से रोकने वाला कारक मौजूद नहीं था, इस तरह बिखरा रहा तो वह मिलजुल कर आगे मोदी के लिए चुनौतियां पेश करेंगे ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा हर प्रकार की सफलता को उत्सव के रूप में प्रतिध्वनि करती है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में इस प्रकार का उत्सव जैसा माहौल पहले भारत में नहीं देखा गया। इन सबसे समर्थकों और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ता है तथा वे सकारात्मक आत्मविश्वास के साथ पार्टी के लिए काम करते रहते हैं।

एक तरफ आत्मविश्वास से भरी हुई भाजपा तथा दूसरी तरफ वैचारिक दिशा भ्रम एवं बिखराव का शिकार विपक्ष। उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनाव ने संपूर्ण भारतीय राजनीति का यही परिदृश्य उत्पन्न किया है।
किंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उपराष्ट्रपति के रूप में जगदीप धनखड़ के लिए बिल्कुल सुगम और अनुकूल परिस्थितियां होंगी। हमारे देश में उपराष्ट्रपति यद्यपि कार्यकारी पद है लेकिन राज्यसभा का सभापति होने के कारण वे संसद के भी अंग हैं। उपराष्ट्रपति की मुख्य भूमिका राज्य सभा के संचालन में ही होती है। देश में राजनीतिक विरोध जितना तीखा एवं हिंसक होता जा रहा है उसका शिकार भारतीय संसद भी हुआ है। हमने देखा विपक्षी दल किस तरह सभापति के आसन पर कागज फेंकने से लेकर मेज पर चढ़कर हंगामा करते हैं।

वेंकैया नायडू जैसे अनुभवी नेता के सामने भी सांसदों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की नौबत आ गई। उन्हें बार-बार अपना क्षोभ प्रकट करना पड़ा है। विपक्ष के ज्यादातर दल अब इस स्थिति में नहीं कि जनता के बीच उनके मुद्दों के आधार पर लोकप्रियता पाने तथा सरकार को दबाव में लाने की स्थिति पैदा करें। वे जमीन पर आंदोलन वगैरह नहीं कर सकते इसलिए उनके पास संसद सत्र
अवसर होता है अपना विरोध प्रदर्शित करने का। ज्यादातर पार्टियों ने संसद को अपने विरोध का शिकार बनाना शुरू कर दिया है। इसमें जगदीप धनखड़ की सूझबूझ और कार्यशैली की परीक्षा होनी है। उन्हें कानून और संविधान का ज्ञाता होने के साथ शांत सहनशील, समझ - बूझ वाला माना जाता है। तृणमूल कांग्रेस के साथ टकराव होते हुए भी कभी उनके चेहरे पर गुस्से और तमतमाहट का भाव नहीं देखा गया। बावजूद वे आक्रामक विपक्ष को संभालने में सफल होंगे ऐसा निश्चयात्मक तौर पर नहीं कहा जा सकता।

जिस तरह आम राजनीतिक विरोध भी हिंसा का शिकार हो रहा है उससे देश के वातावरण का आभास होता है। नीतियों या मुद्दों के विरोध में हो रही भयानक हिंसा, आगजनी हमको आपको डरा सकती है लेकिन भारत की वर्तमान स्थिति का यही सच है जिसकी प्रतिध्वनि हमें संसद के अंदर भी सुनाई पड़ती है।

निश्चित रूप से नरेंद्र मोदी सरकार सदन में अपने एजेंडे को पूरा करने की कोशिश करेगी और विपक्ष उसके रास्ते लगातार बाधाएं खड़ी करेगा। ऐसे में राज्यसभा के उपसभापति के रूप में धनखड़ के लिए संचालन आसान नहीं होगा। वर्तमान माहौल को देखते हुए आश्चर्य नहीं हो यदि विपक्ष उन पर पक्षपात का भी आरोप लगा दे। तो देखना होगा जगदीप धनखड़ कैसे स्थितियों को संभालते हैं। वेंकैया नायडू के कार्यकाल में राज्य सभा के अंदर कुछ महत्वपूर्ण विधायकों पर हमने ऐसे परिदृश्य देखे जिससे लगता था कि इसका संभालना मुश्किल होगा। तीन तलाक विधेयक, नागरिकता संशोधन विधेयक ,धारा 370 हटाने वाली जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, कृषि विधायक आदि के दौरान संसद के अंदर और बाहर पूरे देश का तीखा विभाजन साफ दिखाई दे रहा था। नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर भारत के साथ दुनिया भर से प्रतिक्रियाएं हुईं।

जम्मू कश्मीर पुनर्गठन विधेयक को तो गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा से पहले राज्यसभा में ही पेश किया था। उस दौरान वेंकैया नायडू ने जिस सूझबूझ से सदन को संभाला वह अवश्य अविस्मरणीय है। संभव है आने वाले दिनों में सरकार कुछ ऐसे विधेयक लाए जिन पर उसी तरह विभाजन और हंगामे की स्थिति बने। तो धनखड़ के पास वेंकैया नायडू के रूप में उदाहरण है। कृषि कानून को तो उन्होंने विपक्ष के बहिर्गमन के बावजूद पारित घोषित कर दिया था क्योंकि उनकी दृष्टि में अगर मतदान करने के लिए विपक्ष तैयार नहीं हो केवल इसलिए विधायक को लंबित नहीं रखा जा सकता था। वेंकैया नायडू के कार्यकाल में यूक्रेन पर हमले का ऐसा वैश्विक संकट आया जिन्हें लेकर देश में अलग-अलग राय थी। हालांकि सरकार ने जैसा स्टैंड ले लिया उसमें विपक्ष के पास विरोध करने का कोई बड़ा आधार नहीं रहा। लेकिन भविष्य में अगर चीन ताइवान के विरुद्ध आक्रामक कार्रवाई करता है तो भारत के लिए इसी प्रकार से निरपेक्ष रहना संभव नहीं होगा। निश्चित रूप से उसका असर संसद पर पड़ेगा और उस दौरान धनखड़ की परख होगी।

वैसे उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति अवश्य होते हैं लेकिन वह चाहे तो देश की वर्तमान परिस्थितियों में कई प्रकार की महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सरकार को कोई सुझाव देने या किसी मंत्री,अधिकारी आदि को बुलाकर बात करने आदि के लिए संविधान उपराष्ट्रपति पर कहीं से रोक नहीं लगाता है। देशभर में अलग-अलग राज्यों में जनप्रतिनिधियों से संवाद करते हुए बेहतर राजनीतिक वातावरण बनाने की भी भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ नवजवानों से संवाद का उदाहरण प्रस्तुत किया है। शैक्षणिक संस्थानों से लेकर वैज्ञानिक, धार्मिक, सांस्कृतिक संस्थानों के साथ संवाद कर वे भविष्य की दृष्टि से बेहतर उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं।

नोट :
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