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इस जवाब के कई सवाल हैं...

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Updated: सोमवार, 20 नवंबर 2017 (15:33 IST)
कक्षा नौवीं की गणित में प्रमेय सिद्ध करना सिखाते हैं। जो लोग शौकिया तौर पर हिन्दी पढ़ते हैं, उनके लिए बता दूं कि प्रमेय यानी थ्‍योरम। इन सवालों में उत्तर दिया जाता है- समबाहु त्रिकोण की तीन कोण समान हैं तो सिद्ध करो कि उनकी तीनों भुजाएं भी समान हैं। फिर कुछ अवधारणाओं को लेकर इसे सिद्ध किया जाता है।
 
अर्थात जवाब तय है फिर सवाल बनाया है। जिन लोगों का मानसिक विकास कक्षा नौवीं के बाद नहीं हुआ है, वे मंच से भी यही पूछते हैं- 'इस जवाब का सवाल दो।' बेतरतीब कटी दाढ़ी और फटी जेब का सफेद कुर्ता पहने ये शख्स भारत की संपूर्ण राजनीति में लगी इस 'जवाब से सवाल' की बीमारी के महत्वपूर्ण और लोकप्रिय उदाहरण हैं।
 
इसी उदाहरण का उदाहरण लीजिए। जवाब तय है- आपकी पदोन्नति होना है, देरी सिर्फ इसलिए कि सवाल नहीं मिल रहा है- मम्मी की तबीयत खराब है तो क्या करना चाहिए? पार्टी में नए जोश को भरने के लिए क्या करना है? डूबती हुई पार्टी की कौन नैया पार लगाएगा? इत्यादि। बस! सवाल मिलते ही नगाड़े बज उठेंगे, दुंदुभियां गाने लगेंगी और पुष्पवर्षा के साथ ही राजतिलक हो जाएगा।
 
दूसरी ओर इनके, उनके और सबके निशाने पर भव्य मंच पर खड़े एक और दाढ़ी वाले 'साहेब' भी इसी नाव में सवार हैं, भले ही वे इस वक्तव्य का परिहास करें। जब विमुद्रीकरण (शौकिया हिन्दीबाजों के लिए- डीमोनीटाईजेशन) कर दिया, तब सवाल खोज रहे हैं- 'कालेधन के लिए क्या कर‍ना चाहिए? आतंकवादियों की किस तरह कमर तोड़ें? भारत को डिजिटल कैसे बनाएं। जवाब तो 8 नवंबर को ही दे दिया, अब हर हफ्ते सवाल बदल-बदलकर उसमें फिट कर रहे थे। कुछ फिट हुए, कुछ मिसफिट, और कुछ मिसफायर। पर अधिकतर बैकफायर हुए। 
 
डेमोक्रेसी यानी जनतंत्र का चौथा खंभा मीडिया है। इसकी भी डेमोक्रेसी के जैसी ही ऐसी-तैसी हो रही है। सुना है कि कई घराने एक ही पंथ द्वारा खरीदे जा चुके हैं, और जो नहीं खरीदे गए, वो भी बिकने की कगार पर हैं। हर रात प्राइम टाइम पर ये चीख-चीखकर अपने जवाब देते हैं और पेनलिस्ट बढ़ाकर उपयुक्त सवाल ढूंढते हैं।
 
देखिए इन पति-पत्नी को, ये ही अपनी बेटी और नौकर के कातिल हैं- एक अमुक चैनल ने यलगार की थी। फिर जब कोर्ट से बरी हो गए तब प्रश्न पूछते हैं- क्या पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट से छेड़छाड़ हुई थी? क्या गवाह खरीदे गए थे? और अगर कोई सवाल आपके प्रसारित प्रश्न से मेल खा गया तो तुरंत होर्डिंग तन जाएंगे- 'आपके प्रिय चैनल ने सबसे पहले आपको बताया था'।
 
एक अजीब खिचड़ी है सोशल मीडिया। चाहे दाल और चावल साथ में उबाल भी दो तो भी वे अपनी रंगत और स्वाद नहीं छोड़ते। दाल, दाल रहती है और चावल, चावल। और हर रोज लगता है #विवाद_का_तड़का। पर अब तो बासी खिचड़ी में भी उबाल नहीं आता। सभी को मालूम है कौन दाल है, कौन चावल, कौन हल्दी है, कौन नमक। फॉलोवर्स की आंच पर यह पकती रहती है। अगर इसने कुछ कह दिया तो वो भक्त है और उसने कुछ कहा तो राष्ट्रद्रोही। सबके जवाब तय हैं। बस कोई विवाद उपजे तो सवालों में फिट करो। जिस दिन फिट हो जाए तो हैशटैग ट्रेंड करने लगता है।
 
'जवाब से सवाल' आज के हिन्दुस्तान की कहानी कह रहा है। ये गलती से बोला गया सच है। जब तक हम क्रम को नहीं तोड़ते, अपनी अवधार‍णाओं को कटघरे में नहीं खड़ा करेंगे, तब तक हम सिर्फ सवाल ही खोजते रहेंगे और नई परिस्थितियों के नए जवाब नहीं मिलेंगे। हर प्राइम टाइम डिबेट की तरह चलिए इसे भी यहीं छोड़ते हैं। प्रमेय तो सिद्ध हो ही गया। इति सिद्धम!
 
पुनश्च : इस घटना के पात्र काल्पनिक नहीं हैं। उनकी पहचान छुपाने के उद्देश्य से उनके नाम नहीं लिए गए हैं। क्योंकि मेरे पास अवमानना का केस लड़ने के लिए 100 करोड़ रुपए नहीं हैं।

(लेखक मेक्स सुपर स्पेश‍लिटी हॉस्पिटल, साकेत, नई दिल्ली में श्वास रोग विभाग में वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं) 
लेखक के बारे में
डॉ. आशीष जैन
Dr Ashish Jain.... और पढ़ें

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