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विमोचन समारोह

Updated: गुरुवार, 9 जून 2016 (11:55 IST)
हमारा देश विचित्रताओं से परिपूर्ण देश है। इसमें एक और जहां साहित्यकार पुरस्कार लौटाते हैं वहीं दूसरी ओर साहित्यकार विमोचन समारोह भी आयोजित करते हैं। अपने को कभी कोई पुरस्कार मिला नहीं, सो अपन विमोचन वालों के साथ हैं।


अभी मैं टाउन हॉल से एक पुस्तक विमोचन समारोह में हुई स्नेह बारिश से तरबतर  लौटा हूं। पास की सीट पर स्थित रचनाकार नुमा व्यक्ति ने बिन मांगे जानकारी उड़ेली-  "आजकल समय का ध्यान रखना ही पड़ता है साहब, हॉल प्रतिघंटे के हिसाब से जो मिल रहे हैं।" मैं उनके द्वारा दी गई जानकारी से इतना कृतज्ञ नहीं था जितना आभारी मेरे लिए किये गए “साहब” संबोधन से था। खैर  …
 
हॉल अपनी क्षमता और आमंत्रण देने वाली नवोदित लेखिका के फेसबुकीय संबंधों के अनुपात को दृष्टिगत रखते हुए काफी भरा हुआ था। हॉल में बिराजे अधिकांश  प्रबुद्धजन उनमें से थे, जो अपनी अनेक पुस्तकों का विमोचन पूर्व में इसी प्रकार से आयोजित करा चुके थे। इनका हिडन एजेंडा इस विमोचन की तुलना अपने  विमोचन कार्यक्रम से करना था। संचालिका के हाथों में प्रसिद्ध कवियों की कविताओं और शायरों की शायरियां दबी हुई थीं। संचालक की यही विशेषता होती है कि  वो मौके की नजाकत भांपकर साहित्य के खजाने से उचित पंक्तियां चस्पा कर सके। माखन दादा और सुमन जी की कुछ पंक्तियों का उवाच कर संचालिका ने  कार्यक्रम की शुरुआती तालियां बटोरीं।
 
संचालिका ने लेखिका तथा मुख्य अतिथियों का परिचय सदन से कराया। इस परिचय वेला में लेखिका की उपलब्धियों का यशगान किया गया और विमोचन पदार्थ  को सुस्वादु बनाने के लिए व्यक्तिगत संबंधों का बेसन भी भरपूर लगाया गया। समारोह के मुख्य अतिथियों के परिचय में उनके साहित्यिक पराक्रम का उल्लेख  हुआ। नवोदित लेखिका के प्रथम पुस्तक छपवानेे के साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा भी की गई। इसके बाद आमंत्रित किए गए मुख्य अतिथियों में से अपेक्षाकृत कम अनुभवी अतिथि को लोकार्पित होने वाली पुस्तक पर उनके विचार प्रगट करने हेतु आमंत्रित किया गया। अतिथि महोदय ने सनातन परंपरा का अनुसरण करते हुए पुस्तक को छपवाने की इस क्रिया को महत्वपूर्ण बताया। बातों-बातों में उन्होंने स्वयं की कुछ पुस्तकों का उल्लेख भी कर लिया।
 
इनके उवाच समाप्त होते ही संचालिका ने हरिवंश राय बच्चन की कुछ पंक्तियां सदन को सुनाई और स्वयं के साहित्यिक होने का एहसास भी कराया। इसके पश्चात प्रमुख मुख्य व्यक्ति को सादर आमंत्रित किया गया। आपने नवोदित लेखिका की पुस्तक की प्रशंसा करने के साथ-साथ रचनाओं में कुछ कमियां बता कर स्वयं के अनुभवी होने के पुख्ता प्रमाण सदन को दिए। रचनाओं की आलोचना हेतु आपने सदन के समक्ष ही नवोदित लेखिका की अनुमति लेकर अपने सहृदय होने का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।
 
अंत में लेखिका को पुस्तक के बारे में बताने का मौका दिया गया। लेखिका ने वरिष्ठों को नमन कर अपने इस दुस्साहस के पीछे अभिप्रेरक रहे कारकों मसलन  पारिवारिक सदस्यों, कार्यालयीन साथियों तथा मुख्य अतिथियों का भाव-भीना आभार माना। फिर चिर प्रतीक्षित स्वल्पहार की घड़ी आई। स्वल्पहार के दौरान प्रशंसा तथा आत्ममुग्धता का इत्र चारों और उड़ेला जा रहा था। सभी आमंत्रित एक दूसरे को अपेक्षा से अधिक सम्मान देते नजर आए।
 
इस आत्मप्रशंसा, आत्ममुग्धता तथा साहित्य के कुछ छींटे मुझ पर भी गिरे और मैं भी अपनी प्रथम पुस्तिका के छपने का स्वप्न लिए वहां से प्रस्थान कर गया। 
लेखक के बारे में
मनोज लिमये
लेखक जानेमाने व्यंग्यकार हैं तथा राज्य संसाधन केंद्र, इंदौर में सहायक समन्वयक के पद पर कार्यरत हैं।.... और पढ़ें
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