लॉक डाउन के साइड इफेक्ट्स-3 : पुरुष वर्ग की बदलती सोच और जिम्मेदारियों का अहसास

पुरुष वर्ग का यह बदला हुआ रूप और व्यवहार क्या कभी देखा जा सकता था , मतलब घर पर रहकर बर्तन मांजना, झाड़ू पोछा लगाना , सब्जी रोटी बनाना इत्यादि तो,आप इस का श्रेय को दे सकते हैं । महिला वर्ग के लिए तो यह सब एक स्वप्न मात्र ही रहा था । 
 
ऑफिस दुकानें, स्कूल कॉलेज सब बन्द है और भविष्य भी अनिश्चित है। घर पर काम वाली नहीं आ रही। सारे घर के कामकाज को अब घर के सदस्यों द्वारा ही किया जाना है, तो ऐसे में पुरुषों ने जो जिम्मेदारियों का भार अपनी पत्नी के साथ सांझा किया है, वह अविश्वनीय होने के साथ साथ प्रशंसनीय भी है । 
 
इतने लंबे समय के लिए यह सब जिम्मेदारियां स्वयं करते हुए अब तो पुरुष वर्ग को यह अहसास हो ही गया है कि घर के कामकाज , बच्चों को संभालना किसी स्त्री के लिए क्या मायने रखता है । अब शायद स्त्री वर्ग को यह उलाहना नहीं सुनने को मिलेगा कि तुम सारा दिन घर पर करती ही क्या हो !! 
 
घर के कामकाज, राशन पानी का खर्चा, बच्चों की पढाई, बच्चों की फरमाइशें, बूढ़े मां बाप की जिम्मेदारी, स्वयं की देखभाल इत्यादि इत्यादि - यह सूची बड़ी लम्बी है और अनगिनत काम हैं जो किसी गिनती में या पहचान में ही नहीं आते, एक औरत चुपचाप कैसे हंसी खुशी निभाती चली जाती है। 
 
कहते हैं न कि किसी काम को लगातार 21 दिनों तक करते रहने से उसकी आदत ही जाती है और यह आदत फिर जिम्मेदारी होकर कब दिनचर्या का हिस्सा हो जाती है, स्वयं को पता ही नहीं चलता। लॉक डॉउन के दौरान  पुरुष वर्ग की सोच में हुए इस बदलाव से समाज में एक नई जागरूकता आ जाने की संभावना है। 
 
सोच बदलेगी तो ही समाज बदलेगा ! 



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