गुरुवार, 22 जनवरी 2026
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भारत को कोसने वाले US और EU खुद कितने ईमानदार, रूस से खरीदते हैं तेल, गैस और अन्य सामान

Russia Ukraine war
Russia Ukraine war: रूस ने जबसे यूक्रेन पर आक्रमण किया है, यूरोपीय संघ और अमेरिका भारत को कोसने-धिक्कारने में लगे हैं कि वह रूसी तेल के आयात द्वारा अपने पैसे से रूस की झोली भर रहा है और बेचारे यूक्रेनियों के जले पर नमक छिड़क रहा है। यूरोपीय संघ और अमेरिका दोनों, बड़े चाव से अपने आप को दूध का धुला, यूक्रेन का सच्चा हितैषी और भारत को एक निर्मम कलुषित अवसरवादी के तौर पर पेश किया करते हैं। दोनों का मीडिया भी आंख मूंदकर अपने राजनेताओं की मनचाही कथा सुनाने में ही मस्त-व्यस्त रहता है।  
 
न तो यूरोपीय और न अमेरिकी आम जनता जानती है कि उनकी सरकारें अब भी रूस से कितनी सारी चीज़ें सीधे या बिचौलियों के द्वारा आयात करती हैं। अमेरिकी टेलीविज़न चैनल CNN के 15 अगस्त 2025 के एक आंकड़े के अनुसार, अमेरिका ने 2024 में रूस से 3 अरब डॉलर के बराबर विभिन्न चीज़ें आयात कीं। CNN का कहना है कि यह आंकड़ा किसी और का नहीं, अमेरिकी सरकार के 'आर्थिक विश्लेषण कार्यालय' (ब्यूरो ऑफ़ इकनॉमिक एनैलिसिस- BEA) का है। अमेरिका अब भी रूस से जिन चीज़ों का आयात करता है, 2024-25की उनकी लंबी सूची में अकेले इस वर्ष 59 करोड़ 40 लाख मूल्य के बराबर पलैडियम धातु है और 75 करोड़ 50 लाख डॉलर के बराबर यूरेनियम तथा प्लूटोनियम है। ये तीनों चीज़ें रोज़मर्रा की ज़िंदगी के काम आने वाली चीज़ें नहीं हैं।
 
यूरोप-अमेरिका हैं मौसेरे भाई : रूस के विरुद्ध प्रतिबंधों में अमेरिका का भरपूर साथ दे रहे 27 देशों वाले यूरोपीय संघ ने भी, 2024 में रूस से 41 अरब 90 करोड़ डॉलर (36 अरब यूरो) के बराबर मूल्य की सामग्रियां आयात कीं। यह आंकड़ा स्वयं यूरोपीय संघ के सांख्यिकी कार्यालय ने दिया है। 2022 से 2025 के बीच रूस से यूरोपीय संघ का सकल आयात 86 प्रतिशत घटा अवश्य है, पर अब भी 40 अरब डॉलर के आस-पास है। यूक्रेन पर रूसी आक्रमण से पहले, रूस ही यूरोपीय संघ का सबसे बड़ा पेट्रोलियम आपूर्तिकर्ता था। तेलवाही समुद्री जहाज़ों के आने पर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध के बाद से रूसी तेल का आयात, 2021 के 16 अरब 40 करोड़ डॉलर से घटकर 2025 की पहली तिमाही में 1 अरब 72 करोड़ डॉलर रह गया, पर पूर्णतः बंद नहीं हुआ है।
 
अमेरिका और यूरोपीय संघ चाहते हैं कि भारत रूसी तेल खरीदना पूरी तरह बंद कर दे, जबकि उन्होंने ख़ुद भी ऐसा नहीं किया है। अंतरराष्ट्रीय शोध संस्था 'ऊर्जा और शुद्ध वायु शोध केंद्र (सेंटर फॉर रीसर्च ऑन एनर्जी ऐंड क्लीन एयर)' ने जुलाई 2025 में पाया कि यूरोपीय संघ के सदस्य देश हंगरी, फ्रांस, स्लोवाकिया, बेल्जियम और स्पेन अभी भी धड़ल्ले से रूसी तेल आयात कर रहे हैं। हंगरी और स्लोवाकिया रूसी तेल के सबसे अधिक आयातक हैं।
 
यूरोप में रूसी गैस का आयात बढ़ा : सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि यूरोपीय संघ द्वारा तरल गैस के रूप में रूसी प्राकृतिक गैस (LNG) का मूल्यगत आयात पिछले चार वर्षों में बढ़ गया है। अकेले 2025 की पहली छमाही तक 5 अरब 23 करोड़ डॉलर मूल्य के बराबर रूसी गैस का आयात हुआ। गैस की मात्रा में कुछ कमी अवश्य आई है, पर लागत बढ़ती गई है। इसका साफ अर्थ यही है कि यूरोपीय संघ, व्लादिममीर पुतिन के रूस को अब गैस की कम मात्रा के लिए पहले कभी की अपेक्षा कहीं अधिक क़ीमत दे रहा है। इस वर्ष के पहले 6 महीनों में यूरोपीय संघ ने अमेरिका से भी 14 अरब डॉलर से कुछ अधिक मूल्य की तरल प्राकृतिक गैस ख़रीदी।
 
यूरोपीय संघ रूस से लोहा और इस्पात, उर्वरक, निकल तथा कुछ अन्य धातुएं भी ख़रीदता है। इस बीच इन धातुओं के आयात के लिए अमेरिका, कनाडा और नॉर्वे जैसे कुछ नए स्रोत भी अपनाए जा रहे हैं, पर रूस अब भी एक स्रोत बना हुआ है। क़रीब 100 अमेरिकी कंपनियां और कई यूरोपीय कंपनियां अब भी उसी पुतिन के देश में कार्यरत हैं, जिन्हें यूरोप-अमेरिका में चौबीसों घंटे धिक्कारा जाता है।  
 
2028 तक रूसी गैस का आयात : यूरोपीय संघ की सरकार के समान उसके कार्यकारी आयोग का कहना है कि यूरोपीय संघ द्वारा गैस के कुल आयात में रूसी गैस का अनुपात 2024 में 19 प्रतिशत था। उस वर्ष रूस से 15 अरब 60 करोड़ यूरो मूल्य के बराबर गैस ख़रीदी गई। कार्यकारी आयोग चाहता है कि 2028 तक रूसी गैस का आयात पूरी तरह बंद हो जाए। यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और ब्रसेल्स में संघ की संसद को तब तक तय कर लेना होगा कि इसके बाद गाड़ी कैसे चलेगी। नियम यही है कि जो भी निर्णय हो, उसके पक्ष में यूरोपीय संघ के कुल 27 सदस्य देशों में से कम से कम 15 ऐसे देशों हों, जो एकमत हों और संघ के समग्र देशों की जनसंख्या के 65 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हों। यानी, यदि ऐसा नहीं हुआ, तो 2028 के बाद भी रूसी गैस का आयात चलता रहेगा।
 
यूरोपीय संघ में जर्मनी की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी और तगड़ी है। जर्मनी की अपनी एक ऊर्जा कंपनी है, जिसे संक्षेप में ''सेफ़े (Sefe)'' कहा जाता है। यह कंपनी एक दीर्घकालिक अनुबंध के आधार पर आज भी रूसी तरल गैस (LNG) रूस से मंगाती है। रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले यह कंपनी, रूस की प्रख्यात सरकारी गैस कंपनी ''गासप्रोम'' की एक जर्मन शाखा हुआ करती थी। उस समय इसका नाम था ''गासप्रोम गेर्मानिया।'' यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद जर्मनी ने ''गासप्रोम गेर्मानिया'' का राष्ट्रीयकरण कर दिया, उसे ''सेफ़े'' नाम दिया। जर्मनी और यूरोपीय संघ अब इस दुविधा में हैं कि रूसी गैस का पूर्ण बहिष्कार होने पर इस कंपनी का भला क्या होगा? वह रहेगी या बंद होगी? दुविधा इस बात को लेकर भी है रूसी गैस का आयात पूर्णतः रोक देने पर यूरोपीय संघ के देशों मे प्राकृतिक तरल गैस इतनी मंहगी हो सकती है कि जनता शोर मचाने लगे।
 
पश्चिमी देशों का दोगलापन : यूरोपीय संघ के सभी 27 देशों की जनसंख्या मिल-मिलाकर लगभग 45 करोड़ 40 लाख है; भारत की अपेक्षा एक-तिहाई से भी कम। दुनिया की चौधराहट करने वाले अमरिका की भी 2025 की अनुमानित जनसंख्या केवल 34 करोड़ 72 लाख है; भारत की अपेक्षा एक-चौथाई से भी कम! ये दोनों चाहते हैं कि भारत तो रूसी तेल का बहिष्कार करे, पर ये अपनी जनता को अंधेरे में रखकर रूस से न केवल प्राकृतिक तरल गैस (LNG) मंगाते रहें, अनेक प्रकार की वस्तुएं और यूरेनियम, प्लूटोनियम जैसी घतक चीज़ें भी ख़रीदते रहें।
 
भारत के प्रसंग में इनका आरोप है कि रूसी कच्चा तेल ख़रीद कर भारत, आक्रमणकरी व्लादिमीर पुतिन के हाथ मज़बूत कर रहा है और बेचारी यूक्रेनी जनता का खून बहाने में पूतिन के हाथ बंटा रहा है। लेकिन, जब 2024 में रूस से अमेरिका 3 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुएं ख़रीदता है, या यूरोपीय संघ 2025 की पहली छमाही में ही रूस से 5 अरब 23 करोड़ डॉलर मूल्य के बराबर रूसी गैस का आयात करता है, तो यह पैसा मानो न तो पुतिन के रूस को मिलता है और न बेचारे यूक्रेनियों का अनायास खून बहता है! अमेरिका के सनकी राष्ट्रपति ट्रंप भारत को रूसी तेल ख़रीदने की सज़ा देने पर तुले हैं, जबकि अलास्का में लाल गलीचा बिछा कर पुतिन का इस तरह स्वागत करते फूले नहीं समाए, मानों दोनों जन सदियों से एक-दूसरे की बाट जोह रहे थे।
 
चाहे अमेरिका हो या यूरोप, यह वही पश्चिम है, जो अतीत में दुनिया पर अपना दमनकारी उपनिवेशवाद थोपा करता था और आज अपना पाखंडी उपदेशवाद थोप रहा है। बात जब भी भारत और पाकिस्तान की हो, तो इस पाखंडी पश्चिम का झुकाव पाकिस्तान की तरफ ही होता है।
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