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हाय रे मेरी छिपी कमाई

वर्षा चौधुरी
आधी रात से 500 और 1000 के नोटों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई है। इस खबर को सुनते ही देश में ही नहीं हमारे घर में हड़कंप मच गया। कुछ वक्त पहले ही घरखर्च के लिए एटीएम से रुपए निकाल कर लाए, घर के मुखिया का सर चकरा गया, हाथ में 500-500  के नोट दिखाकर लगे गरियाने। बेटे-बेटी को चिंता नहीं, वो लोग तो पर्स भी नहीं रखते, कार्ड इस्तेमाल करने के जमाने के हैं। इधर मेरी चिंता कुछ ज्यादा ही बढ़ गई। आखिर मुझे भी तो अपनी काली कमाई का हिसाब देना होगा अब।
 
अब इसे काली कमाई कहें या छिपी बचत। ये शायद ज्यादातर घरों की कहानी है। बैंक अकाउंट में चाहे कितना भी पैसा हो लेकिन घर में जो सेविंग अकाउंट है, उसकी खबर तो अब तक किसी को नहीं थी। मैं सोच-सोच कर परेशान हो गई कि आखिर अब सब कुछ सामने लाना पड़ेगा। हमेशा की तरह हैरान परेशान पतिदेव ने कहा कि अब बुधवार को बैंक भी बंद रहेंगे।
 
एटीएम मशीनों पर तो मधुमक्खी के छत्ते जैसा हाल है लोगों का। क्या करें, कहां से लाएं 100-100 के नोट।
आखिरकार मुझे मन मसोसकर अपना पिटारा खोलना पड़ा। दो कारणों से पहला, 100 के नोट देखकर हिसाब लगाना है कि दो-तीन दिन खर्चा चल पाएगा या नहीं।
 
दूसरा जिस रकम को घरवालों से छिपाया है, उसमें भी तो 500 और 100 के नोट हैं, उन्हें भी तो बदलना होगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- काले धन को रोकने के लिए ये बड़ा कदम उठाया जा रहा है।
 
प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर देशभक्त खुश हैं। मुझे ये तो अंदाज़ा नहीं कि काली कमाई के कुबेर कितने चिंताग्रस्त होंगे। लेकिन अपनी पोल खुल जाने और पिछले बनाए गए बहानों के खुलासे ने मुझे चिंता और थोड़ी सी शर्मिंदगी में जरुर डाल दिया है। लेकिन मरता क्या  ना करता।
 
आखिरकार मैंने सबसे पहले अपने सारे पर्स खोलना शुरू किए। मेरी मां कहती थीं कि कभी भी कोई भी पर्स खाली मत रखना। वो खुद भी कभी कोई पर्स खाली नहीं रखती थीं। किसी में 10, 20 या 100 रुपए जरुर रखतीं। उनकी इस आदत को मैंन परंपरा की तरह निभाया। अपने करीब 5 से 7 पर्सों को टटोला। उनमें से करीब 5000 रुपए निकले। कुछ 100 के नोट, कुछ 500 के तो कुछ 1000 के भी थे।
 
ये देखकर सबसे पहले पतिदेव का मुंह बना। कुछ बोलने की जरुरत ही नहीं पड़ी, चेहरा पूछ रहा था, कब कब और कैसे ये पैसे इकट्ठे किए, वो भी पर्स में यूं ही रख छोड़े।
 
मेरा हाथ अलमारी की एक दराज की तरफ बढ़ा। उसमें शगुन के लिफाफे रखे थे। वो लिफाफे जो पति को याद नहीं रहते और बच्चों से एक लिफाफे के बदले आसानी से लिए जा सकते थे। इन शगुन के लिफाफों में भी तो ज्यादातर 100 और 500 के ही नोट थे।
 
एक एक लिफाफे से नोट निकाले और साथ ही बच्चों के ताने साथ निकलते गए। इस मामले में पतिदेव कुछ नहीं बोले, उन्हें उस कमाई से लेना-देना नहीं, जो उन्होंने नहीं कमाई। मैंने थोड़ी राहत की सांस ली। फिर बारी आई सूटकेस की। अरे भई कहीं भी आओ जाओ तो रास्ते में चोर उचक्कों से बचाने के लिए रुपये छिपाने ही पड़ते हैं ना। उन्हें भी टटोला गया। अब बारी आई रसोई के डब्बों की। चावल, दाल, चीनी के डब्बों से रुपए निकालने की। सबसे ज्यादा दिक्कत आती है चीनी के डब्बे से रुपए निकालने में। लाख पॉलीथिन से लपेट कर रखा, पर नोट तो चीज़ ही ऐसी है, अच्छे-अच्छे चिपक जाते हैं तो फिर चीनी तो अपने मिज़ाज़ की मारी है। ठीक उसी तरह जैसे  इस वक्त मेरे पति और बच्चों की नज़रे मुझसे चिपकी हैं।
 
मुझे बहुत कुछ कहा जा रहा था, बहुत कुछ ना कहकर भी नज़रों से कहा जा रहा था। मुझे इस वक्त ऐसा लग रहा था मानों मैं मध्यप्रदेश की कोई आईएएस अधिकारी हूं, जिसके ठिकानों पर छापे पड़ने से लाखों-करोड़ों रुपए बरामद होते हैं।
 
मैंने अपनी छिपी कमाई का खुलासा कर दिया। 100 के नोट छांटकर, पति और बच्चों को दे दिए। कुछ खुद भी रख लिए। इस बात से अब पति और बच्चे खुश हैं कि उन्हें 2-3 दिन परेशान नहीं होना पड़ेगा। मेरी चिंता इस बात की है कि अब छिपी कमाई के ठिकाने बदलने पड़ेंगे। आखिर वो नए ठिकाने होंगे क्या। 
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