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'उस' पिता का नाम जरूरी नहीं, कतई जरूरी नहीं

स्मृति आदित्य
मातृत्व एक पवित्र सुख है लेकिन इसी मातृत्व को समाज जब स्त्री के लिए कलंक बना देता है तब हमें मिलते हैं झाडियों में फेंके प्लास्टिक में लिपटे नन्हे शिशु जिनके बदन पर चिंटियां चलती हैं। कितना ह्रदय विदारक होता होगा अपने ही अंश को यूं अपने से अलग कर मर जाने के लिए छोड़ देना। इन्हीं तमाम घटनाओं के बीच खबर आती है मध्‍यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग के माध्यम से कि दुष्कर्म से जन्मे बच्चे के लिए स्कूल में प्रवेश पर पिता का नाम लिखवाना जरूरी नहीं होगा। 
 
मध्‍यप्रदेश स्कूल शिक्षा विभाग ने फैसला लिया है कि दुष्कर्म की वजह से जन्म लेने वाले बच्चों के पिता का नाम यदि उसकी मां नहीं लिखवाना चाहती है या उसे पता नहीं है तो ऐसी स्थिति में बच्चे को स्कूल में प्रवेश देने से वंचित नहीं किया जा सकता। विभाग ने मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों पर यह फैसला लिया है।
 
यह फैसला स्वागत योग्य है लेकिन क्या यह फैसला समाज की सोच और विकृतियों पर नियंत्रण स्थापित कर सकेगा? क्या यह फैसला हमारी समाजिक ढांचे को बदल सकेगा? क्या स्कूलों में बच्चे के पिता का नाम न होने भर से मां को सम्मान की नजर से देखा जाने लगेगा? ऐसे कई सवालों के बावजूद इस फैसले ने महिलाओं के हक में एक मील का पत्थर रखने की कोशिश की है। 
 
एक शिशु का जन्म मां और पिता दोनों के लिए नया जीवन होता है किंतु जिसके सिर पर कलंक की तरह मातृत्व थोप दिया गया हो क्या वह अपने बच्चे को सामान्य रूप से स्वीकार कर सकती है? एक शिशु अभिभावक की संयुक्त जिम्मेदारी होती है लेकिन अगर इन हालातों के मद्देनजर कोई एक ही यदि जिम्मेदारी निभा रहा है तो उससे पिता का नाम क्यों पूछा जाना चाहिए? क्या वह व्यक्ति पिता कहलाने के योग्य है?

वह गंदी सोच का शख्स जिसने बलात किसी स्त्री के दामन में दर्द को रोपा है मां होने की सुखद अनुभूति को कुचल कर, उसका नाम क्यों कर पूछा जाना चाहिए? और अगर एक बच्चा और उसकी मां अगर नहीं बताना चाहते हैं उस व्यक्ति का नाम तो क्या उसे शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया जाना चाहिए? जाहिर है सोच के स्तर पर परिवर्तन की यह लहर ए क पीडिता के लिए सांस लेने की जगह बनाती है और उस बच्चे को सरस्वती का आशीष देने की राह प्रशस्त करती है। फैसला अमल में तत्काल लाया जाए शायद सोच की खिडकियां इन फैसलों के दबाव से ही खुलने लगे।  

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