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डावोस में मोदीजी द्वारा उदीयमान भारत की प्रभावी प्रस्तुति

Updated: शनिवार, 3 फ़रवरी 2018 (23:10 IST)
मोदीजी ने अभी तक के अपने कार्यकाल में अनेक सफल विदेशी दौरे किए हैं, किंतु गणतंत्र दिवस के ठीक पहले मोदीजी की डावोस (स्विट्ज़रलैंड) यात्रा कोई द्विपक्षीय या बहुपक्षीय राजनीतिक यात्रा नहीं थी और न ही यह कोई कूटनीतिक यात्रा थी।

उन्होंने डावोस में दुनिया के आर्थिक क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण महापंचायत को अपने उद्‍घाटन भाषण से मंत्रमुग्ध किया। डावोस की इस महापंचायत की महत्ता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस महापंचायत में सत्तर देशों के राष्ट्राध्यक्षों, संसार की अड़तीस प्रमुख वित्तीय संस्थाओं (जैसे वर्ल्ड बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि) के अधिकारियों और भारत सहित विश्व की दो हजार से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों ने शिरकत की। 

भारतीय प्रधानमंत्री मात्र एक भारतीय नेता के रूप में नहीं अपितु दुनिया के एक प्रभावशाली नेता के रूप में आमंत्रित थे। वर्षों से भारतीय प्रतिनिधि दल, दावोस में एक श्रोता की तरह हिस्सा लेता रहा है, किंतु पहली बार भारत ने एक लीडर के रूप में हिस्सा लिया। कहना न होगा कि अभी तक भारत को विश्व की अर्थव्यवस्था में एक नगण्य भागीदार समझा जाता रहा है।

वैसे भी हमारी अर्थव्यवस्था ऐसी थी भी नहीं कि वह विश्व की व्यापक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सके। इसका मूल कारण भारत के पास संसाधनों की कमी और ऊपर से लालफीताशाही, भ्रष्टाचार। आधारभूत सुविधाएं जैसे बिजली व पानी का अभाव और वैसे ही सड़क, रेल, हवाई और जल परिवहन की अदक्ष सुविधाओं ने भारत के विकास को लगभग एक सदी से अवरुद्ध कर रखा था।

इन परिस्थितियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत से अधिक अपेक्षाएं कभी नहीं थीं। इसीलिए भारत में न तो कोई निवेश करना चाहता था और न ही कोई आधुनिक तकनीक देता था। हमें तकनीक भी वही मिलती थी जो विकसित देशों में पुरानी और प्रचलन से बाहर हो गई होती थी।

वर्तमान सरकार ने सर्वप्रथम एक ओर तो भ्रष्टाचार और लालफीताशाही पर लगाम कसने का काम किया। साथ ही आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया और उन्हें सक्षम बनाने का प्रयास भी किया। कानूनों में आवश्यक फेरबदल किया। डावोस यात्रा से ठीक पहले मोदी मंत्रिमंडल ने महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए एकल खुदरा ब्रांड और अन्य क्षेत्रों में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) नियमों में व्यापक छूट का ऐलान किया है।

इस तरह खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को मंज़ूरी देते ही विदेशी कंपनियों में निर्णयकारी हलचल आरंभ हुई और उनका दृष्टिकोण भारत के प्रति सकारात्मक रूप से बदलने लगा। इस प्रकार निश्चित ही भारत का बुनियादी काम पूरा हो चुका था। अब अंतिम काम बचा था सही वक्त और मंच पर 'नए भारत' को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का। डावोस ने भारत को यह अवसर भी प्रदान कर दिया।

मोदीजी के आलोचक भी शायद इस बात से असहमत नहीं होंगे कि भारत को इस मंच पर प्रोजेक्ट (प्रक्षेपित) करने के लिए भारत के पास मोदीजी से श्रेष्ठ कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हो सकता था। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की हार के पश्चात स्वयं मनमोहनसिंह ने भी एक बार कहा था कि मोदीजी मुझसे अधिक माहिर विक्रेता, बेहतर संवाद कर्त्ता (कम्यूनिकेटर) और कुशल कार्यक्रम प्रबंधक (इवेंट मैनेजर) हैं।

सचमुच मोदीजी ने डावोस में निराश भी नहीं किया। सच कहें तो सारी अपेक्षाओं से बेहतर वे "नए भारत की छवि" को बनाने एवं दिखाने में सफल रहे। उन्होंने भारत में निवेश के दरवाजों को खोलकर दुनिया को आमंत्रित किया। निवेशकों को इससे अधिक और क्या चाहिए ? महत्वपूर्ण यही होता है कि आपके ग्राहक आप से क्या सुनना चाहते हैं?

यदि वही आप सुनाते हैं जो वे सुनना चाहते हैं तो आप एक सफल विक्रेता बन जाते है। मोदीजी ने बड़ी चतुराई से अवसर की सही नब्ज़ पकड़ी। अपने आर्थिक सुधारों का बड़ा खूबसूरती से बखान करते हुए लालफीताशाही को समाप्त करने और निवेशकों के लिए स्वागत का लाल कालीन बिछाने की घोषणा की। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ मुद्दों पर उन्होंने विश्व के बड़े नेताओं से उलट अपनी राय रखी, विशेषकर पर्यावरण और वैश्वीकरण के मुद्दे पर।

आज दुनिया वैश्वीकरण की बुनियादी नीति को छोड़कर पुनः संरक्षणवाद (जिस नीति में घरेलू उद्योगों और व्यवसायों को प्राथमिकता दी जाती है) की ओर बढ़ रही है विशेषकर अमेरिका जिसने राष्ट्रपति ट्रम्प के आने के बाद 'अमेरिका प्रथम' की नीति को अपनाया है। ऐसे में वैश्वीकरण की पुरजोर वकालत करना भारत के प्रधानमंत्री के साहस को दर्शाता है। 

ध्यान देने योग्य यह बात भी है कि प्रथमतः चीन के साथ स्पर्धा में प्रधानमंत्री ने भारत के प्रजातंत्र और उदारवाद को निवेशकों के सामने रखा। दूसरे, पाकिस्तान जैसे कुछ देशों को निवेशकों के रुझान से अलग थलग करने के लिए सभा में आतंकवाद पर भी ध्यान आकर्षित किया और तीसरे, अमेरिका के वैश्वीकरण के मुद्दे पर पीछे हटने की स्थिति का लाभ लेते हुए भारत के "विश्व एक परिवार" के इरादे को स्पष्ट किया।

उल्लेखनीय है कि इस अधिवेशन का समापन अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने किया। निश्चित ही उन्होंने मोदीजी के भाषण का सार देखा होगा, इसीलिए उनको अपने भाषण में "अमेरिका प्रथम" के अर्थ को मंद या मुलायम करना पड़ा। निस्संदेह अंतरराष्ट्रीय मंच पर आर्थिक ताकत बनने की ओर अग्रसर भारत की यह पहली लम्बी छलांग थी। विश्वास है कि यह गति अब निरन्तर बनी रहेगी और हम एक सामरिक शक्ति के साथ-साथ एक आर्थिक ताकत के रूप में विश्व में शीघ्र उभरेंगे।
लेखक के बारे में
शरद सिंगी

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