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बाल दिवस 2019: अपने भीतर के बच्चे को मुरझाने न दें, खिलने खिलखिलाने दें

Updated: गुरुवार, 14 नवंबर 2019 (11:51 IST)
जीवन में उम्र के लम्हे जितने बढ़ते जाते हैं हम धीरे-धीरे समझदार होने की कवायद में लग जाते हैं। एक बच्चे को कभी छल कपट की जरूरत नहीं पड़ती। कभी होशियारी के सबक नहीं सीखने पड़ते। दुनियादारी से उसका वास्ता नहीं होता। बच्चे के पास बस एक मासूम दिल होता है, एक भोला बचपन और उमंगों से भरी एक बहुत सुंदर दुनिया होती है। 
 
इस सुंदर सी दुनिया को बड़े बनने वाले बुरा बनाते चले जाते हैं। इतना बुरा कि कभी-कभी सांस भी लेना दुश्वार हो जाता है। मुझे लगता है हम सबको अपने अंदर एक बच्चा बचाए रखना चाहिए। मैं आज भी उसी बचपने की उम्मीदों से भरी दुनिया में उसी भोलेपन से चलने की कोशिश करती हूं, पर पता चलता है कि दुनिया से बहुत से सबक सीख रखें हैं। समझदार होने के कितने कठिन सबक हैं। सच कहूं मुझे समझ नहीं आते आज भी। 
 
मुझे बहुत दुनियादारी नहीं आती। फालतू की मक्खनबाजी भी नहीं आती। जब बुरा लगता है रूठ जाती हूं। खरी-खरी कह देती हूं। लड़ना पड़े तो लड़ लेती हूं पर अगले ही पल भूल भी जाती हूं। ये दुनिया मेरी तरह बचपने में नहीं है। बहुत बड़ी हो गई है। बहुत दुनियादार हो गई है। मुझे इससे सबक सीखने को कहा जाता है। जिससे मतलब हो उससे दोस्ती करो, मीठा बोलो और मतलब साध लो। मुझसे ये सबक सीखे ही नहीं जाते। 
 
मैं तो सबसे ही दोस्ती कर लेती हूँ निभा भी लेती हूं। कुछ लोग मुझसे निभा नहीं पाते और आजकल तो बहुत से लोग मुझसे निभा नहीं पा रहे...  शायद मेरे सबक में ही कोई कमी रह गई। फिर भी मैं नए सबक नहीं सीखना चाहती। मुझे होशियारी के, समझदारी के ऐसे सबक नहीं सीखना है। जिन्हें मुझ पर, मेरे ईमान पर, मेरी खुद्दारी पर, मेरी नेकनीयती पर, मेरे सच्चे मन पर भरोसा हो वो साथ चले मेरे... 
 
भीड़ तो यूं भी काम की नहीं होती। कभी-सभी लोगों से बचपने की ओर लौटने की गुजारिश... बाल दिवस के बहाने से बचपन याद रखें। चाचा नेहरू को नमन... एक प्रधानमंत्री चाचा के नाम से दिलों में विराजता है तो कहीं न कहीं कोई अच्छाई, कोई सच्चाई तो उनमें भी रही होगी। देश कांग्रेस का या भाजपा का या किसी दल की मिल्कियत नहीं है... देश हम सबका है और सबसे ज्यादा उनका है जो इसके लिए जीना चाहते हैं।
 
सच्चे दिल से देश के लिए सोचते हैं, करते हैं। सच्चे होने के लिए बच्चा होना जरूरी है। बच्चा होने के लिए उम्र को पीछे नहीं किया जा सकता, पर उम्र को पीछे रख मन में एक बच्चे को बचाया जा सकता है। उस सच्चे और अच्छे बच्चे को ही बचाने की जरूरत है। देश और दुनिया अपने आप अच्छी हो जाएगी...सच में।

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लेखक के बारे में
रीमा दीवान चड्ढा
स्वतंत्र पत्रकार एवं कवयित्री.... और पढ़ें

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