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बकरी, राष्ट्रद्रोह और मैं !

मनोज लिमये
गौरतलब मसला तो यह है कि न्यायपालिका से आहत मासूम बकरी का प्रकरण समाचार-पत्रों से विलुप्त हो गया है। सुप्रसिद्ध फिल्म शोले में जब यह संवाद सुना था कि 'गब्बर सिंग कोई बकरी का बच्चा नहीं जो दौड़े और पकड़ लिया', तब गब्बर सिंग के साथ-साथ इस बात की तस्दीक भी हुई थी, कि गब्बर भले ही खतरनाक हो किंतु बकरी की इमेज एक निरीह प्राणी की है।


भारतीय न्यायपालिका ने जबसे बकरी को अपराधिक प्रवृत्ति का ठहराया है, तभी से मन के विचलन की अवस्था चरम पर है। जिस बकरी की मिसाल निरीहता, करुणा तथा अहिंसा से बावस्ता रहती आई थीं, अनायास उस छवि को एक जोर का झटका जोर से ही लगा है। जबसे यह खबर समाचार पत्रों की सुर्खियां बनीं, तब से मैंने गूगल पर इतिहास में बकरी द्वारा किए समस्त प्रकार के कुकृत्यों को पूरी शिद्दत के साथ ढूंढने का प्रयत्न किया है किंतु सफलता से मीलों दूर हूं। 
 
गूगल से भी जब निराशा हाथ लगी तो मैं अपने प्रश्नों का कटोरा मस्तिष्क में लिए जवाब की तलाश में वैसे ही बाहर निकल लिया, जैसे कभी गौतम बुद्ध सत्य की खोज में निकले होंगे। घर के पास वाले बगीचे में कुछ बकरियां घास चरने का रेगुलर काज कर रही थीं। मन हुआ की क्यों न बकरी से ही बात कर लूं। वैसे भी जबसे ऑनलाइन खरीददारी शुरू की है, तबसे बिचोलियों को मसले में सम्मिलित करना अपनी आदत में नहीं रहा है।अब बकरी का विषय है तो कोई दूसरा उस पर प्रतिक्रियाएं दे इससे बेहतर है बकरी से ही बात कर ली जाए।
 
मैंने सड़क किनारे हरी घास बेचने वाले व्यक्ति से घास का एक गठ्ठर खरीदा तथा दोनों ओठों को जोड़ कर पुचकारने वाली ध्वनि का उच्चारण करते हुए बकरी को घास खाने का भाव-भीना निमंत्रण दे दिया। बकरी भोली जरूर है किंतु मूर्ख नहीं इस बात को सिद्ध करते हुए उसने मेरे आमंत्रण को एकदम से स्वीकार नहीं किया। दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है वाली कहावत का अनुसरण कर काफी फुटेज खाने के बाद बकरी घास खाने आई। 
 
सफलता को नजदीक पा कर मैंने नरम घास उसकी और बढ़ाते हुए हौले से पुछा 'तुम्हारी बिरादरी ने तो हमेशा अहिंसा तथा करुणा का संदेश दिया है, लेकिन आज तुम्हारे एक बागी स्वभाव के साथी की वजह से पूरी की पूरी प्रजाति की इमेज अपराधिक करार दी जा रही है ऐसा क्यों हुआ?' बकरी ने निश्चिंत भाव से घास की जुगाली करते हुए कहा 'देखो बाबू हम मानते हैं कि उस बकरी ने नादानी की है, किंतु क्या वो नादानी राष्ट्रद्रोह थी, क्या उस बकरी ने सीमा का उल्लंघन किया था , क्या उस नामाकूल ने दूसरी बकरियों को बरगला कर आजादी - आजादी के नारे लगाए थे ....नहीं ना'
 
'अकल घास चरने गई है क्या?' जैसी कहावत से मेरा शिक्षण के दौरान नजदीकी नाता रहा था, किंतु घास चरने से अकल आती है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मेरे समक्ष घास चर रहा था। मैंने कहा ' देखो मै मानता हूं कि न्यायप्रक्रिया में उलझी उस बकरी की हरकत राष्ट्रविरोधी नहीं थी परंतु अब्बुखां की बकरी चांदनी की शहादत कैसे याद नहीं रही उसको, उसने भी तो अपनी सीमा का उल्लंघन कर अपनी मौत को न्यौता दिया था '!
 
बकरी कातर दृष्टी से मेरी और देखते हुए बोली 'सही कह रहे हैं आप इस देश में अब सजा की सुपात्र सिर्फ बकरियां ही रह गई हैं, बाकी सभी तो निर्दोष ही साबित होते आए हैं और होते रहेंगे ' मैं निरूत्तर था। बकरी दूसरे कोने में घास चरने चली गई। पान की दूकान पर चल रहे टीवी पर राष्ट्रद्रोह पर बहस-मुबाहिसे रोजाना की तरह जारी थे।
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