शापित योद्धा से दानवीर, फिर मृत्युंजय बने महावीर कर्ण से सीखिए 6 गुण

रामायण और महाभारत को भारतीय साहित्य में 'आकर ग्रंथ' कहा जाता है। आकर का अर्थ है- खजाना या भंडार। इस विशाल खजाने में कथाओं, पात्रों और मूल्यों के अमूल्य रत्न भरे पड़े हैं। प्राचीन से आधुनिक काल तक रामायण और महाभारत की कई कथाओं को, पात्रों को विभिन्न साहित्यकारों, लेखकों ने कई भारतीय भाषाओं में अपने परिवेश, देश-काल और मूल्यों के आधार पर अपनी शैली में कहा है।

महाभारत के लगभग सभी प्रमुख पात्रों ने प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल के साहित्यकारों और रचनाकारों को प्रभावित किया है। कृष्ण, अर्जुन, द्रौपदी के अलावा कर्ण साहित्यकारों का एक चहेता पात्र है। मराठी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार शिवाजी सावंत का 'मृत्युंजय' कर्ण को केन्द्र में रखकर लिखा गया चरित्र-प्रधान उपन्यास है।

रामधारी सिंह दिनकर ने भी इसके पहले कर्म की महत्वता और नैतिकता पर 'रश्मिरथी' की रचना की थी जो कर्ण के जीवन और चरित्र पर रचा गया काव्य है।

किसी भी उपन्यास या कहानी की रचना-शैली का यह महत्वपूर्ण बिन्दु होता है कि कथा किस दृष्टिकोण से कही जा रही है। इस दृष्टिकोण को 'वैन्टेज़-प्वाइंट' कहते हैं। मृत्युंजय में पात्रों की वक्तव्य-शैली का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी है कि अलग-अलग घटनाओं को मिश्रित वैन्टेज-प्वाइंट की पद्धति, अलग-अलग पात्रों के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इस कारण कर्ण की त्रासदी, उसका संघर्ष और उसका चरित्र उभरकर सामने आते हैं और महाभारत पर लिखे अन्य कथानकों से इसे अलग ही स्तर पर ले जाते हैं।

कर्ण का चरित्र इसलिए भी हमें प्रभावित करता रहा है क्योंकि आधुनिक समाज में मानव जीवन में किसी कुल या वंश में जन्म लेने से ही श्रेष्ठता नहीं आती। व्यक्ति उत्तम बनता है अपने गुणों और व्यवहार से। किसी भी व्यक्ति का महत्व जाति अर्थात् उसके जन्मकुल से न होकर उसके गुणों, उसकी योग्यता से होता है। योग्यता सिद्ध करने के मूल्य को प्रतिष्ठा मिलती है।

वर्तमान समय में श्रेष्ठता को सिद्ध करना इतना आसान नहीं, व्यक्तिगत गुणों व प्रतिभा से ही आगे बढ़ा जा सकता है। यही आधुनिकता का आधार-स्तंभ कहा जा सकता है।

कर्ण इस कारण एक ऐसा चरित्र है जो सदा समाज में अपने गुणों के आधार पर मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता रहा और असफल रहा, राजसी रक्त होते हुए भी उसे अपनी सही जगह नहीं मिल पाई।


वह एक ट्रैजिक चरित्र है जिसे अपने जन्म से लेकर मरण तक दुर्भाग्य का सामना करना पड़ा लेकिन उसने संघर्ष करना नहीं छोड़ा। इसी कारण वह आज हमारे लिए न सिर्फ प्रासंगिक बल्कि अनुकरणीय बनकर उभरता है।

कर्ण से क्या सीखा जा सकता है। जन्म से ही त्याज दिए एक निर्दोष की पीड़ा, दंश, आक्रोश, अवसाद, अकेलापन उसे खलनायक बनाने के लिए बहुत थे लेकिन कर्ण अपने समकक्षों से यहां तक की पांडवों से भी श्रेष्ठ दिखाई देता है। इस उपन्यास में कर्ण की त्रासदी, उसका संघर्ष और उसका चरित्र उभरकर सामने आते हैं जो उसके गुणों को दर्शाते हैं।
विपरित परिस्थितियों में भी हार न मानना: कर्ण का जीवन भयंकर संघर्षमय रहा और यह उपन्यास उसके संघर्षों को प्रकट करने में सफल रहा है। कर्ण का चरित्र हमें इसलिए प्रभावित करता है क्योंकि उसे सदा समाज में अपने गुणों के आधार पर मान्यता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ा। वह एक ट्रैजिक चरित्र है जिसे अपने जन्म से लेकर मरण तक दुर्भाग्य तथा विपरित परिस्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन उसने संघर्ष करना नहीं छोड़ा। इसी कारण वह इस युग में एक चहेता पात्र बनकर उभरता है।

स्थिरप्रज्ञता और वचन-बद्धता: कर्ण का सबसे बड़ा गुण है स्थिरप्रज्ञता, जहां अपने सगे-संबंधियों को सामने देख महारथी अर्जुन के हाथ से गांडीव छुट गया था वहीं श्रीकृष्ण द्वारा पाडंवों से कर्ण के रक्तसंबंध का रहस्योद्द्घाटन के बाद भी कर्ण कौरवों का साथ देने के वचन से पीछे नहीं हटा और युद्ध में डटकर पांडवों का सामना किया। इन्ही दो गुणों के कारण कर्ण किसी भी पांडव से सौ गुना श्रेष्ठ है और जयेष्ठ पांडव कहलाने योग्य है।
आदर्शवादिता: कर्ण की श्रेष्ठता के कुछ बिंदु जग-जाहिर हैं वह महा-पराक्रमी, महावीर, अर्जुन से भी कुशल योद्धा था, अश्वमेध यज्ञ करने वाले कर्ण की ख्याति दिग्विजय कर्ण की जगह दान-वीर कर्ण के रूप में हुई। कर्ण एक आदर्श पुत्र, भाई, पति, राजा, योद्धा तथा आदर्श मित्र था। उसने हमेशा अपने आदर्शों को स्वयं के हितों से ऊपर रखा। कृष्ण द्वारा पांडवों से संधि कर हस्तिनापुर की गद्दी देने का प्रलोभन भी कर्ण को अपने आदर्शों से डिगा नहीं पाया। इसी वजह से श्री कृष्ण ने कर्ण को संपूर्ण नायक और 'पहला पाण्डव’कहा था।

त्याग और दयाभाव :
कर्ण की विलक्षण प्रतिभा का अद्भुत प्रमाण है - दान देने का प्रण। हर वर्ष वो अपनी संपत्ति जरूरतमंदों को दान कर दिया करता था। उसमें गहरा दयाभाव था, उसे अपनों का प्रेम कभी न मिल पाया उसकी भरपाई उसको असहाय लोगों की मदद कर पूरी की। दानवीर कर्ण, जिसने अपने कवच-कुंडल इंद्र को दे डाले और मृत्यु-शैय्या पर होने बाद भी याचकों के वेश में आए कृष्ण-अर्जुन को भी खाली हाथ नहीं लौटने दिया और सोने के दो दांत का महादान दिया। त्याग और दया मानव का सबसे बड़ा गुण है, प्रण को पूरा करना भी हर मनुष्य के बस की बात नहीं।

मित्रता और कृतज्ञता: कर्ण का सबसे अधिक प्रशंसनीय गुण है उसकी कृतज्ञता जो उसने दुर्योधन का साथ अंतिम क्षण तक निभा कर की। वह सच्चे मित्र की तरह मृत्युपर्यंत दुर्योधन की रक्षा करता रहा। कर्ण यह जानता था की दुर्योधन पथ-भ्रष्ट हो चूका है और विनाश की ओर अग्रसर है, फिर भी उसने दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा। वह युद्धशाला में दुर्योधन द्वारा दिए साथ को कभी नहीं भूला और आजीवन कृतज्ञ रहा। कर्ण का चरित्र हमें सिखाता है कि कितनी ही बड़ी विपत्ति क्यों न आ जाए, जो रास्ता आपने चुना है, उस पर टिके रहना लेकिन इस प्रकार की आपका सम्मान सुरक्षित रहे।

सहनशीलता: कर्ण की सहनशीलता का उदाहरण उस प्रसंग से मिलता है जब एक दिन अभ्यास के समय जब परशुराम थक चुके थे तो उन्होंने कर्ण से कहा कि वे थोड़ा आराम करना चाहते हैं। तब कर्ण बैठ गए और उनकी जंघा पर सिर रखकर परशुराम आराम करने लगे। थोड़े समय बाद वहां एक बिच्छू आया, जिसने कर्ण की जंघा को काट लिया।

अब कर्ण ने सोचा कि अगर वह हिले और बिच्छू को हटाने की कोशिश की तो गुरुदेव की नींद टूट जाएगी। इसलिए उन्होंने बिच्छू को हटाने की बजाय उसे डंक मारने दिया, जिससे उनका खून बहने लगा। इससे कर्ण को भयंकर कष्ट होने लगा और रक्त की धारा बहने लगी। जब धीरे-धीरे रक्त गुरु परशुराम के शरीर तक पहुंचा तो उनकी नींद खुल गई। परशुराम ने देखा कि कर्ण की जांघ से खून बह रहा है। यह देखकर परशुराम क्रोधित हो गए कि इतनी सहनशीलता केवल क्षत्रिय में ही हो सकती है।

इस उपन्यास में सबसे प्रभावी बात है कि उपन्यासकार ने भीष्म पितामह, अर्जुन, कर्ण जैसे महापराक्रमी, विलक्षण योद्धाओं यहां तक की भगवान श्रीकृष्ण को भी मानवतुल्य बताया है। देवगुणों से भरे ये सभी महापुरुष भी परिस्थितियों के सामने उतने ही दीन-हीन देखते हैं, जितने की हम और आप। सत्य की रक्षा, अधर्म का नाश करने के इस युद्ध की कथा में मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति, मूल्यों के प्रति समर्पण और निष्ठा कई ऐसे उदाहरण भरे हैं जो हर युग में प्रासंगिक रहेंगे।

कर्ण के चरित्र पर रश्मिरथी में
रामधारी सिंह 'दिनकर' के प्रथम सर्ग की यह पंक्तियां सटीक बैठती है:
जिसके पिता सूर्य थे, माता कुंती सती कुमारी, उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिटारी।

सूत-वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर, निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्‌भुत वीर।
तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी, जाति-गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी।

ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण ने आप स्वयं सुविकास।






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