सूखी जड़ों से लौटती हरियाली
अप्रैल का महीना था। मौसम पूरी तरह से नए पौधे लगाने के अनुकूल नहीं था, फिर भी घूमने के दौरान एक सुंदर सा पौधा मन को इतना भा गया कि उसे अपने साथ घर ले आए। घर पहुँचते ही उसे एक बड़े गमले में सावधानी से लगा दिया। यह जानते हुए भी कि समय शायद सही नहीं है, मन में एक छोटी-सी आशा थी- “शायद यह यहाँ भी खिल उठे।”
उसके बाद शुरू हुआ देखभाल का एक शांत सिलसिला। पौधे को कड़ी धूप से बचाकर छाँव में रख दिया, उसे रोज़ पानी देने लगे और उसकी मिट्टी को सँभालने लगे। लेकिन कुछ ही समय बाद महसूस हुआ कि पौधा धीरे-धीरे सूख रहा है; पत्तियाँ मुरझाने लगी हैं और उसकी हरियाली खोने लगी है। मन के लिए यह स्वीकार करना कठिन था कि इतनी देखभाल के बाद भी वह बच नहीं पा रहा। फिर भी, हमने पानी देना बंद नहीं किया; शायद भीतर कहीं एक उम्मीद बाकी थी।
धीरे-धीरे वह पौधा पूरी तरह सूख गया। उसके सूखे हुए हिस्सों को काट कर निकाल दिया गया, लेकिन उसकी जड़ें मिट्टी में वैसे ही रहने दीं। गमला भी उसी स्थान पर रखा रहा। समय बीतता गया; बाकी पौधों को पानी देते समय उस सूखे गमले में भी थोड़ी-सी नमी डाल देते। यह कोई नियम नहीं था, बस उस पौधे से मन का एक रिश्ता था, और शायद विश्वास भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
करीब डेढ़-दो महीने बाद, एक सुबह जब रोज़ की तरह पौधों में पानी डाल रहे थे, तभी अचानक नज़र उस गमले पर पड़ी। मिट्टी के भीतर से, जड़ के पास से एक नन्ही-सी हरी पत्ती बाहर झाँक रही थी! वह दृश्य साधारण होते हुए भी भीतर तक छू लेने वाला था। मन में एक साथ आनंद, संतोष और आश्चर्य की भावनाएँ उमड़ पड़ीं। ऐसा लगा जैसे सूखी मिट्टी के भीतर जीवन चुपचाप अपना रास्ता बना रहा था।
और उसी क्षण मन में एक प्रश्न कौंधा... “अगर मैंने पानी देना बंद कर दिया होता तो?”
शायद हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है। कई बार हमारे सपने, रिश्ते, प्रयास या परिस्थितियाँ बिल्कुल उसी सूखे पौधे की तरह दिखाई देने लगती हैं; बाहर से सब समाप्त-सा लगता है। हम मेहनत करते हैं, इंतज़ार करते हैं, फिर भी परिणाम नज़र नहीं आते। ऐसे समय में मन हार मानने लगता है; लगता है कि अब कुछ नहीं बदलेगा।
लेकिन सच यह है कि हर परिवर्तन तुरंत दिखाई नहीं देता। कुछ प्रक्रियाएँ मिट्टी के भीतर चलती रहती हैं, बिल्कुल जड़ों की तरह। बाहर भले ही सूखापन हो, भीतर जीवन अपनी तैयारी कर रहा होता है। ज़रूरत केवल इतनी होती है कि हम अपना विश्वास और प्रयास बनाए रखें।
सकारात्मकता का अर्थ हमेशा खुश रहना नहीं होता, बल्कि कठिन समय में भी उम्मीद का एक छोटा-सा दीपक जलाए रखना होता है। कई बार सफलता, नया आरंभ या जीवन की हरियाली ठीक उसी क्षण जन्म ले रही होती है, जब हम हार मानने वाले होते हैं।
उस छोटे से पौधे ने सिखाया कि हर सूखापन अंत नहीं होता, और हर प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं जाती। कभी-कभी जीवन बस यह देख रहा होता है कि हम अपनी उम्मीदों को कितनी देर तक पानी देते रह सकते हैं।

