Motivational: दोस्‍तों ने बना डाली ऐसी किट कि धांधली की तो हो जाएगा ‘दूध का दूध, पानी का पानी’

Milk Adulteration
Last Updated: शुक्रवार, 14 जनवरी 2022 (12:16 IST)
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दूध, घी, मावा और तमाम तरह की मिठाइयों में मिलावट की धांधली आजकल आम बात है, इस मिलावटखोरी के चक्‍कर में लोगों की जान पर बन आती है। लेकिन अब इमानदार लोगों ने इस धांधली से बचने के तरीके भी ईजाद कर लिए हैं।

दरअसल करनाल में ‘डेलमोस रिसर्च’ नाम से अपनी कंपनी चलाने वाले बब्बर सिंह और मनोज मौर्य ने अब दूध का दूध और पानी का पानी करने की ठान ली है।

दोनों ने करनाल स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट से डेयरी टेक्नोलॉजी में डिग्री हासिल करने के बाद मदर डेयरी, अमूल डेयरी जैसे कई संस्थानों में काम किया और कुछ अलग करने की चाहत में 2017 में ‘डेलमोस रिसर्च’ की शुरुआत की थी।

अब वे ‘डेल स्ट्रिप्स’ (Del Strips) नाम से मिल्क टेस्टिंग किट बनाते हैं। उनकी यह तकनीक इतनी आसान है कि कोई भी बिना किसी स्किल के आसानी से दूध का दूध और पानी का पानी कर सकता है। कमाल की बात तो यह है कि इसमें सिर्फ 5 रुपए खर्च आता है।

मनोज के मुताबिक वे और बब्बर, मदर डेयरी में एक साथ काम कर रहे थे। इसी दौरान उन्‍होंने कुछ अपना शुरू करने का फैसला किया। हम पहले खास तरीके से पिज्जा कॉर्नर शुरू करना चाहते थे। लेकिन प्रोसेसिंग सिस्टम का पेटेंट हासिल नहीं हो सका।

इसलिए वे कुछ ऐसा करना चाहते थे जिससे पेटेंट मिल जाए और कोई मॉडल को कॉपी नहीं कर पाए। इसके बाद हमने मिल्क एडल्ट्रेशन किट बनाने का आइडि‍या आया।

उन्‍होंने मिल्क प्रोक्योरमेंट में ही काम किया था और मिलावट की समस्या का अंदाजा पहले से था। उनके के इस आइडिया को सुनते ही हमने तय कर लिया कि हम इसी दिशा में काम करेंगे। उन्‍होंने फरवरी 2016 में काम शुरू किया और सितंबर 2017 से उनकी कंपनी शुरू हो गई।

मीडि‍या रिपोर्ट के मुताबिक दूध की टेस्टिंग तीन तरीके से होती है –
  • मशीन टेस्टिंग
  • केमिकल टेस्टिंग
  • रेपिड टेस्टिंग
मनोज ने बताते हैं कि दूध की जांच करने वाली मशीनों की कीमत 5 लाख से 80 लाख तक होती हैं। यही कारण है कि इसे सिर्फ चुनिंदा लैब में ही लगाए जाते हैं। वहीं, दूध जांच के सबसे पुराने तरीकों में एक केमिकल टेस्टिंग के लिए काफी स्किल की जरूरत होती है और इसे हर कोई नहीं कर सकता है।

इसलिए उन्होंने रैपिड टेस्टिंग किट को चुना। क्‍योंकि वे चाहते थे कि एक ऐसी तकनीक बनाई जानाचाहिए, जो न सिर्फ सस्ती हो, बल्कि कोई भी बिना किसी दिक्कत के इस्तेमाल कर सके।

कैसे यह तकनीक करती है काम?
गुड़गांव के रहने वाले बब्बर सिंह के मुताबिक हमारे स्ट्रिप में एंजाइम और अलग-अलग तरह के केमिकल इस्तेमाल में जाते हैं। टेस्टिंग के दौरान मिलावटी तत्व इससे रिएक्ट कर, एक खास तरीके के रंग को जन्म देते हैं। रंग के इंटेंसिटी को एक कलर चार्ट से मिलाया जाता है। जिससे पता चल जाता है कि दूध में कितने परसेंट की मिलावट है। आमतौर पर जो केमिकल टेस्टिंग होती है, उसमें सिर्फ यह पता चलता है कि मिलावट है या नहीं। लेकिन इस तकनीक में 0.005 परसेंट मिलावट को भी आसानी से पता लगाया जा सकता है।

कैसे समझे उपभोक्‍ता इसे?
अगर स्ट्रिप पीले रंग का होता है और यदि दूध में डालने के बाद इसका रंग नीला हो जाए, तो समझ जाना चाहिए कि दूध में मिलावट है। यदि रंग न बदले तो कोई दिक्कत नहीं। इस प्रक्रिया में 5-10 सेकेंड से लेकर ज्यादा से ज्यादा छह मिनट लगते हैं। शुरुआती दिनों में उनके इस स्ट्रिप किट की सेल्फ लाइफ बस 15-20 दिन थी। लेकिन अब छह महीने से अधिक हैं।

कितना होता है खर्च?
आजकल दूध में नमक, यूरिया, मेल्टोडेक्सट्रिन, स्टार्च, चीनी, ग्लूकोच, आटा जैसी कई चीजें मिला दी जाती हैं। यदि शुरुआती जांच में इसकी पकड़ हो गई, तो किसानों को नुकसान होता है। नहीं तो कंपनियों को। उनके पास ग्राहकों और कंपनियों के लिए अलग-अलग पैक हैं। ग्राहकों के लिए उनके पैक 20 रुपए का है, वहीं कंपनियों के लिए इसकी कीमत 3250 रुपए है।



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