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गंगे! ये जो तुम्हारी गोद में शव तैर रहे हैं न....

शुक्रवार,मई 14, 2021
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यह कहानी ओशो रजनीश ने अपने किसी प्रवचन में सुनाई थी। वैसे जो जेन भिक्षुओं की कई कहानियां हैं और वह बड़ी ही प्रेरक होती है। आओ इस बार पढ़ते हैं दो भिक्षुओं की कहानी।
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स्वप्न जो देखा था रात्रि में हमने सुबह अश्रु बन बह किनारे हो गए हैं चांद और मंगल पर विचरने वाले हम आज कितने बेसहारे हो गए हैं विकास की तालश में हमने हमेशा
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जिस समय देश के करोड़ों-करोड़ नागरिकों के लिए एक-एक पल और एक-एक सांस भारी पड़ रही है, सरकारें महीने-डेढ़ महीने थोड़ी राहत की नींद ले सकतीं हैं। यह भी मान सकते हैं कि जनता चाहे कृत्रिम सांसों के लिए संघर्ष में लगी हो, देश के नियंताओं को कम से कम किसी ...
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कैफी की कलम का करिश्मा ही था कि वे ‘जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझमें’, जैसी कलात्मक रचना के साथ सहज मजाकिया ‘परमिट, परमिट, परमिट....परमिट के लिए मरमिट’ लिखकर संगीत रसिकों को गुदगुदा गए।
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सच में आपदा के मौके पर भी अगर किसी की इंसानियत मर गई तो वह जीते जी मुर्दे से भी बदतर है। इससे बड़ा मौजूदा सवाल यह कि भरोसा किस पर करें? उन दवा विक्रेताओं पर जिन्हें हर कोई बहुत ही आशा भरी निगाहों से देखता है या नहीं?
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आज के दौर में समय और संबंध की वैल्यू बढ़ गई है। जो लोग यह समझते थे कि पैसा हर समस्या का हल है उनकी धारणा बदली है। फिर भी आपको यह समझना होगा कि भाग्य से बढ़कर आज के दौर में कर्म या भागीरथी पराक्रम महत्वपूर्ण हो चला है। इसके अलावा कई स्तर पर हमें अपनी ...
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महाराणा प्रताप की मृत्यु का समाचार सुनकर अकबर की आंखों में भी प्रताप की अटल देशभक्ति को देखकर आंसू छलक आए थे। मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, 'इस दुनिया में सभी चीज खत्म होने वाली है। धन-दौलत खत्म हो जाएंगे लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा ...
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राणा सांगा का ये वंशज, रखता था राजपूती शान। कर स्वतंत्रता का उद्घोष, वह भारत का था अभिमान। मानसिंग ने हमला करके, राणा जंगल दियो पठाय। सारे संकट क्षण में आ गए, घास की रोटी दे खवाय।
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माँ देहरी पर सजती कुंकुम रंगोली है, घर को आलोकित करता निष्कंप दीपक है, अंजुलि से 'आदित्य' को चढ़ता आस्था का अर्घ्य है और चमकते चंद्रमा सा एक शीतल धैर्य है। वह जीवन की पाठशाला की गुरुजी ही नहीं बल्कि चॉक, कलम, पट्‍टी और तड़ातड़ पड़ती छड़ी भी वही है।
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फिर एक मदर्स डे आया है और मैं एक खत लिख रही हूँ...किसे लिख रही हूँ नहीं जानती... किसे कहूं अपने मन की व्यथा? एक तरफ मैं हूँ मां....दूसरी तरफ एक सिस्टम है और बीच में है जिंदगियों को निगलता कोरोना... और हम मना रहे हैं (अन) हैप्पी मदर्स डे”
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कोरोना महामारी से हो रही मौतों के बीच सोशल मीडिया पर कुछ नागरिक समूहों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफ़े की मांग यह मानकर की जा रही है कि इससे मौजूदा संकट का तुरंत समाधान हो जाएगा। इसके लिए जन-याचिकाओं पर हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं।
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वेदों में 'मां' को 'अंबा','अम्बिका','दुर्गा','देवी','सरस्वती','शक्ति','ज्योति','पृथ्वी' आदि नामों से संबोधित किया गया है। इसके अलावा 'मां' को 'माता', 'मात', 'मातृ', 'अम्मा', 'अम्मी', 'जननी', 'जन्मदात्री', 'जीवनदायिनी', 'जनयत्री', 'धात्री', ...
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अमेरिकी महिलाओं ने 122 करोड़ बार सर्च किया कि -मदद करो, वो मुझे नहीं छोड़ेगा। 1.07 करोड़ बार सर्च किया - वह मुझे मार डालेगा. 32 करोड़ बार–वह मुझे मारता है। और अमेरिकी पुरुष सर्च कर रहे थे - 16.5 करोड़ बार - पत्नी को कैसे काबू करें? उन्हें प्रताड़ित ...
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कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देश और विदेशी साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था
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एक बार फिर साबित हुआ कि किसी भी चुनाव में मतदान का सिलसिला खत्म होने के बाद टीवी चैनलों पर दिखाए जाने वाले एग्जिट पोल की कवायद पूरी तरह बकवास होती है। पश्चिम बंगाल के मामले में लगभग सभी टीवी चैनलों और सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल औंधे मुंह गिरे ...
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भारतीय राष्ट्रगान के रचयिता रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को जोड़ासांको में हुआ था।
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रबीन्द्रनाथ ठाकुर या रवींद्रनाथ टैगोर का जन्‍म 7 मई सन् 1861 को कोलकाता में हुआ था। रवींद्रनाथ टैगोर एक कवि, उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार, और दार्शनिक थे। र
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विश्वास करते हैं कि कोरोना को परस्त करने वाली ये अनुभवों से भरी सच्ची कहानियां कहीं न कहीं आपको लाभ के साथ प्रेरणा भी देतीं होंगी। हमारा ये प्रयास उन सभी के लिए जो, कोरोना को ले कर भयभीत हो रहे/हो जाते हैं...उन्हें हिम्मत मिले...ताकत मिले...
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मां, तुम्हारी स्मृति, प्रसंगवश नहीं अस्तित्व है मेरा। धरा से आकाश तक
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