न्यूयॉर्क डायरी : पीढ़ियों की सी‍ढ़ियां

Last Updated: सोमवार, 6 अक्टूबर 2014 (20:03 IST)
यही वजह है कि अपने बेटों को हम अपनी मर्जी से शादी भी नहीं करने देते और अमेरिका में भी अपना तयशुदा रिवाज हमने बरकरार रखा है, ताकि जो बहुएं घर में आएं, वे हमारी मर्जी की हों, बुढ़ापे में हमारे काम आएं और बेटियां अपनी जात में ब्याहें ताकि कलुषित न हों। यही एक वजह है कि बहुत सी अमेरिकी-भारतीय लड़कियां अपनी बिरादरी के बाहर शादी करती हैं, जहां उनसे भारतीय परिवारों वाली अपेक्षाएं न की जाएं। और यहां के बहुत से लड़कों के लिए भारतीय वातावरण में पली बहुएं लानी पड़ती हैं, जो कि लड़के-लड़की में दूसरी तरह के तनाव पैदा करता है। फिर भारत भी बदल रहा है, इसका सही अंदाज यहां बैठे भारतीयों को नहीं हो पाता, जो कि प्रगति के उसी दशक में समाए रहते हैं जिसमें भारत छोड़कर यहां आए हैं, उन्हीं बरसों के भारतीय मूल्यों को अपने भीतर पोसते-ढोते रहते हैं। भारतीय समय उनके लिए इस तरह थम जाता है, जैसे आकाश की ओर बढ़ता हुआ त्रिशंकु!
लड़कों से अभी भी कई मां-बाप की ऐसी अपेक्षाएं बनी हैं कि वे बुढ़ापे में मां-बाप का खयाल रखें। उन्हें अपने पास रखें जबकि इस समाज में मां-बाप का बुढ़ापा बच्चों से स्वतंत्र होता है। न ही विवाहित स्त्रियां पति के मां-बाप की देखभाल को अपना फर्ज मानती हैं। यह स्थिति बहुत हद तक भारत में भी असहनीय हो रही है, जहां कि बूढ़े मां-बाप बहुत तकलीफ महसूस करते हैं कि बहुएं उनका खयाल रखना नहीं चाहतीं और सरकार ने ऐसे कोई बूढ़ों के संस्थान बनाए नहीं, जहां उनकी परवरिश की जा सके। हमारे समाज ने ऐसे मूल्य हमें दिए हैं, जहां श्रवण कुमार जैसे युवा मां-बाप की सेवा में प्राण त्याग देते हैं या ययाति जैसे पिता अपने बेटे का यौवन लेकर जीते हैं इसलिए बड़ों के लिए प्राण त्यागना कोई बड़ी बात नहीं दिखती है जबकि अमेरिकी समाज कहता है बच्चों को अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने का पूरा हक है इसलिए मां-बाप अगर गुस्सा बस में न कर बच्चे के मुंह पर तमाचा जड़ देते हैं तो बच्चे को न्याय मांगने का पूरा हक है। इसी तरह अगर बच्चे उनसे अलग होकर अपनी मर्जी का जीवन गढ़ना चाहते हैं ‍तो मां-बाप की नैतिकता यह है कि अपनी खुदगर्जी के मारे उन्हें रोकें नहीं।
यह सच है कि मां-बाप और बच्चों के रिश्ते में भी फर्क है। अमेरिकी मां-बाप शुरू से ही बच्चे को स्वतंत्र होना सिखलाते हैं, जबकि भारतीय बच्चा शुरू से ही सीखता है कि उसे बड़ों का आदर करना है, उनकी आज्ञा का पालन करना है और उनके बनाए रिश्तों, मर्यादाओं को मानकर चलना है। आज भी हमारे लिए आदर्श पुत्र राम है।

जो संस्कृति आज भी सदियों पुराने आदर्शों पर अपनी नींव बनाए चलती रहना चाहती है और जो नित नए की खोज में हमेशा आगे ही बढ़ती रहना चाहती है, उन दोनों के बीच हमारे युवा तालमेल कैसे बिठाएं, बड़ा सवाल इसी का है।
और यही विडंबना हमारे युवाओं की जिन्हें कभी एबीसीडी (अमेरिकन बोर्न कन्फ्यूज्ड देसीज) भी कह दिया जाता है। दो संस्कृतियों में एकसाथ जीना उनकी नियति है। बाहर गोमांस खाना और बियर पीना और घर पर शुद्ध शाकाहारी होना, उनके हर दिन को कई-कई हिस्सों में बांटता है। यह सवाल लगातार बना रहता है- क्या ठीक है, क्या शुभ है। किस अंदाज में उन्हें जीना चाहिए- भारतीय होकर जियें तो देसी कहकर डिसमिस कर दिया जाता है। अमेरिकी होकर जियें तो भी किसी न किसी तरह की अवहेलना सुनने को मिल जाती है- 'बड़ा अंग्रेज बना फिरता है।' निस्तार तो किसी भी स्‍थिति में नहीं है। हर चुनाव में कुछ न कुछ गलत दिखता है उनमें, किसी न किसी को। यही दोहरी जिंदगी उनका शाप है। हाल ही में मैंने इस शीर्षक की फिल्म देखी, जो कुछ युवकों की ही बनाई हुई है। फिल्म का मुख्य द्वंद्व अमेरिकीकरण और भारतीयकरण के बीच ही झूलता है। बहुत से युवक-यु‍वतियां लेखन या फिल्म के माध्यम से अपनी इसी डांवाडोल मन:स्थिति को शब्द दे रहे हैं।

यह शाप अगर व्यक्तित्व की मजबूती से गठ जाए तो वरदान बन सकता है और बहुतों ने वरदान बनाया भी है। दोनों को गुणों को लेकर एक नया व्यक्तित्व गढ़ना या दोनों में सामंजस्य बिठाकर जीवन को चलाना। यही ताकत युवा पीढ़ी से वह बहुत कुछ करा लेती है, जो आम भारतीय युवक नहीं कर पाते।

भारतीय पुरातन सोच और अमेरिकी मुक्तिभाव उन्हें किसी भी दिशा में जाने से रोकता नहीं। फिर लेखन हो या वैज्ञानिक विकास, कम्प्यूटर की दुनिया हो या शोध की, हर दिशा में ही उस निर्बाध विकास की झलकें ढेर-ढेर दिख रही हैं। आज साहित्य में सबसे ज्यादा जिन युवा लेखकों को पढ़ा-गुना जा रहा है वे भारत की सोच और विदेश की भाषा का मिलान करने वाले युवा भारतीय लेखक ही हैं। यूं भी स्कूलों, कॉलेजों में भारतीय विद्यार्थी हमेशा आगे होते हैं या यहां के सर्वोच्च धनी लोगों में भारतीयों ने अपना स्थान बना लिया है। ये सब जानी-मानी बातें हैं।
अब बात साहित्य के संदर्भ में की जाए।

हिन्दी साहित्य में यह पीढ़ियों का संघर्ष कहां दिखता है?

पीढ़ियों का संघर्ष बहुत सारे हिन्दी साहित्यकारों के लेखन का विषय बना है। मुझे याद आता है भगवती चरण वर्मा का 'भूले-बिसरे चित्र' जिसका व्यापक आयाम तीन पीढ़ियों के बदलाव और अलग-अलग जानकारियों को रेखांकित करता है। नागर, यशपाल और दूसरे लेखकों के लिए आधुनिक पीढ़ी का बदलता नजरिया खास दिलचस्पी का विषय बना है।
अमेरिकी हिन्दी लेखन की ओर देखूं तो मुझे सोमावीरा की एक कहानी याद आती है, जो छठे दशक में मैंने 'सारिका' पत्रिका में पढ़ी थी। कहानी का शीर्षक मुझे याद नहीं, पर मजमून याद है। कहानी यहां पर रहने वाली एक हिन्दुस्तानी मां-बेटी को लेकर चिंता के बारे में है। वह रोज दूध में घोलकर अपनी किशोर बेटी को गर्भनिरोधक गोली पिलाती हैं कि इस यौन-प्रधान समाज में क्या जाने कब किसके साथ उसकी बेटी सो जाए और गर्भ रह जाने की दुर्घटना हो जाए।
कहानी याद रह जाने वाली थी और इसीलिए अब तक याद है। उस समय भारत में रहते हुए इस बात का मुझे पूरा अंदाज था कि कौमार्य की रक्षा किसी भी लड़की के लिए उसकी जान से भी ज्यादा मूल्यवान है! उसके बाद उषा प्रियंवदा और सुनीता जैन की भी चीजें पढ़ीं। मेरी जो इस बारे में धारणा बनी, वह यह कि ज्यादातर लेखक जब यहां की युवा पीढ़ी के बारे में लिखते हैं तो वे पुरानी पीढ़ी के डर और ख्वाहिशों को व्यक्त करते हैं। मैं पुरानी पीढ़ी के इस रुख से सहमत नहीं हूं। पुरानी पीढ़ी यह भूल जाती है कि इन्होंने इतना बड़ा विद्रोह किया कि अपना देश तक छोड़ दिया तो अब अपने बच्चों को अपने समाज के अनुरूप विद्रोह क्यों नहीं करने देते। कृष्ण बलदेव वैद और राजी सेठ की कुछ कहानियों में यहां की नई पीढ़ी की महिला को समझने की अच्छी, समर्थ कोशिश दिखी।
अपने लेखन में मैं यही बात समझाने की कोशिश करती रहती हूं। मसलन 'सड़क की लय' की नेहा में कन्फ्यूजन है। वह बहुत कुछ उसकी मां का ही दिया हुआ है या ' चिड़िया और चील' की चिड़िया जब ताकतवर बन जाती है, जब अपनी पूरी उड़ान भर लेती है तो दूसरों को वह चील लगने लगे, पर अपनी ताकत पहचानना-संजोना क्या आज की नारी का दायित्व नहीं? इसी तरह 'विभक्त' की अनन्या भारत और अमेरिका के बीच अपनी पहचान की तलाश कर रही है। सन् 1989 के धर्मयुग में मेरी एक कहानी छपी थी जिसका शीर्षक था 'नाते'। उस कहानी के नायक का मूल दर्शन कुछ इस प्रकार था, मैं कहानी से ही उद्धृत कर रही हू- 'देखो बेटे, सारे पारिवारिक और पीढ़ियों के झगड़ों की जड़ ही यही है कि हम कुदरत के प्रोसेस को नहीं समझे। ...जितने भी प्राकृतिक जीव या पशु-पक्षी हैं, जब एक बार बड़े हो जाते हैं तो कहीं-के-कहीं फुर्र हो जाते हैं। मां शायद पहचानती भी न हो कि कौन उसका अपना बच्चा है। एक इंसान ही है, अंतिम सांस तक बच्चों के गले मढ़ा रहना चाहता है और फिर कुदरत के प्रोसेस के खिलाफ जाने की वजह से चोट खाता है।
इस कहानी के छपने पर मुझे यहां बहुत से खत आए और जब मैं हिन्दुस्तान गई तो कुछ बुजुर्ग लोग मिलने भी आए जिन्होंने कहा कि मेरी बात तो उनको पसंद आई, पर हम बूढ़े हो रहे लोग अगर बच्चों का मुंह न देखें तो जाएं कहां जबकि शरीर धोखा देने लगा है।

उनकी बात गलत नहीं थी और मैं जानती हूं कि इस दिशा में हल हमें खोजना ही है। पर वह हल बच्चों की आजादी का गला दबोचकर नहीं होगा।

अपनी लेखन की इस खोज में मैं रुकी नहीं और मूलत: यही कहानी मेरे ताजे उपन्यास 'गाथा अमरबेल की' का विषय बनी जिसमें मैंने मां-बाप के प्यार के स्वरूप और परिभाषा को लेकर ही सवाल उठा दिए हैं- 'प्रेम आत्ममोह है या परमोह? प्रेम, सुख पाकर फलना-फूलना ओर हरीतिमामय आनंद है या कि सर्वस्व देकर रिक्त हो जाना, सूख जाना! प्रेम की प्रकृति क्या है लोभ या संचय? दान या विलय? ...प़्रेम सच में इतना सर्वग्रासी होता है कि अपने प्रणय के पात्र को ही खा डाले।'
बात यह है कि किसी भी रिश्ते में आकाश यानी 'स्पेस' की जरूरत रहती है, वह चाहे मां-बाप के साथ हो। हमारे परिवारों में स्पेस की कोई आधारभूत परिकल्पना नहीं है, जैसी कि अमेरिकी समाज में है। पीढ़ियों का झगड़ा बहुत-कुछ उस स्पेस के ही छिनने और वापस छीने जाने का है। बजाय रंज करने के अगर हम अगली पीढ़ी को उसका सुयोग्य और अभीप्सित स्थान दे सकें तो छीनने-झपटने का सिलसिला ही नहीं होगा।

पर अपनी जगह छोड़ने को भला कौन कभी तैयार होता है, सो यह झगड़ा भी अनंत बना रहेगा।
पर इस दिशा में निश्चय ही वयस्क पीढ़ी की जिम्मेवारी ज्यादा बनती है, क्योंकि वयस्क पीढ़ी इस अनुभव से गुजर चुकी होती है। उसे याद होती है अपनी तकलीफें, अपने त्याग, अपने सफल या असफल विद्रोह। अपने तोड़ने और जोड़ने के सुख-दुख। अपनी उड़ान भरने की इच्छा, कुलांचे भरने की ललक सागर लांघने के इरादे!

फिर अगर आने वाली पीढ़ियां विद्रोह ही न करें तो दुनिया आगे कैसी बढ़ेगी? सब वहीं का वहीं न रुक जाएगा? सालभर एक-सा मौसम रहे तो क्या ऊब न होगी? आसमान रोज नए रंग न दिखाए, जीवन बेरंग न हो जाएगा? नालियों से पानी नहीं निकलेगा तो बदबू न छूटेगी!
हर पीढ़ी एक नई सीढ़ी बन जाती है जिस पर पैर रख अगली पीढ़ी और आगे बढ़ जाती है। यही क्रम है विकास का। यही स्वभाव है प्रकृति का। यही धर्म है जातियों का, संस्कृतियों का, सभ्यताओं का। और यही नियति है मानव जीवन की, मानवीय कर्म की।

हर पीढ़ी इतिहास की लंबी श्रृंखला की एक कड़ी भर ही तो है।

हमने जो बोया वह अभी नहीं फूटा तो अगर हमारे बीज में सत्व होगा तो कभी और जाकर फूटेगा।
इतिहास में कहीं और जाकर जुड़ जाएगी कड़ी। और जो कड़ियां घिसी, कमजोर या फिजूल की हैं, वे अपने-आप टूट जाएंगी। चाहे कितना जोर-जबरदस्ती जोड़ने की कोशिश करते रहें।
इन पीढ़ियों की सीढ़ियों पर ही हमें आगे बढ़ना है। सीढ़ियां चढ़ेंगे, तभी तो आगे बढ़ेंगे। सीढ़ियां पकड़कर ही बैठ गए तो अधरास्ते में ही विकास क्रम को अवरुद्ध कर डालेंगे।

मैं अपने पसंदीदा कवि भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'टूटने का सुख' के शब्दों में कहूंगी कि 'तीर से आगे बढ़ेंगे... इसलिए इन सीढ़ियों के फूटने का सुख, टूटने का सुख।'

हां, टूटने का भी एक सुख होता है और उसी को पहचानना है हर पीढ़ी को!



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