Hanuman Chalisa

श्रीकृष्‍ण जन्म के ये 5 रहस्य जान लिए तो बदल जाएगा आपका भी जीवन

Updated: गुरुवार, 30 अगस्त 2018 (18:32 IST)
'हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते।' -गीता
 

 
भगवान श्रीकृष्ण हिन्दू धर्म में सर्वोच्च हैं। वे हिन्दू धर्म के केंद्र में हैं। उनका जन्म, जीवन और मृत्यु तीनों ही बहुत ही रहस्यमयी है। उन्होंने जीवन को संघर्ष की बजाय उत्साह और उत्सव में बिताने का उदाहरण प्रस्तुत किया है। हालांकि भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन ही संघर्ष में व्यतीत हुआ लेकिन फिर भी उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक संघर्ष या संकट को बहुत हल्के में लेकर उसे अपनी तरह से संचालित किया। कहना चाहिए कि उन्होंने अपने जीवन को रोचक, रोमांचक और ऐतिहासिक बनाने के लिए खुद ही संकट और संघर्ष को जन्म दिया। आओ जानते हैं उनके जन्मकाल के पांच ऐसे रहस्य जिन्हें जानकर आप भी प्रेरित होंगे।
 
 
1. पहला रहस्य :
भविष्यवाणी के अनुसार भगवान विष्णु को देवकी के गर्भ से कृष्ण के रूप में जन्म लेना था, तब अपने 8वें अवतार के रूप में 8वें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के 28वें द्वापर में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के 7 मुहूर्त निकल गए और 8वां उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व को हुआ। ज्योतिषियों के अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था।
 
 
कृष्ण जन्म के दौरान आठ का जो संयोग बना उसमें क्या कोई रहस्य छिपा है? गौरतलब है कि कृष्ण की आठ ही पत्नियां थी। आठ अंक का उनके जीवन में बहुत महत्व रहा है। निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति को भी अपने जन्म के रहस्य को समझना चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति के जन्म में छुपा है उसके जीवन का सार।
 
2. दूसरा रहस्य :
जब भगवान श्रीकृष्‍ण का जन्म हुआ तब भारी बारिश हो रही थी और यमुना नदी में उफान था। उनके माता और पिता को उनकी मृत्यु का डर था। अंधेरा भी भयंकर था, क्योंकि उस वक्त बिजली नहीं होती थी।

ओशो रजनीश कहते हैं कि कृष्ण का जन्म अंधेरी रात में होता है और वह भी बंधन में, कारागृह में। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म इसी तरह होता है। मन के अंधेरे से और कारागृह से मुक्ति ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। बीज अंधेरे में ही फूटता और पनपता है।

श्रीकृष्ण ने अपने जन्म की परिस्थिति को दुनिया में सबसे अलग बनाया। क्या आप नहीं जानते हैं कि दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के जन्म की परिस्थिति अलग होती है लेकिन जो महान लोग होते हैं वे अपने जन्म की परिस्थिति को कठिन बनाते हैं।
 
 
3. तीसरा रहस्य :
जब कृष्ण का जन्म हुआ तो जेल के सभी संतरी माया द्वारा गहरी नींद में सो गए। जेल के दरवाजे स्वत: ही खुल गए। उस वक्त भारी बारिश हो रही थी। यमुना में उफान था। उस बारिश में ही वसुदेव ने नन्हे कृष्ण को एक सूपड़े में रखा और उसको लेकर वे जेल से बाहर निकल आए।

कुछ दूरी पर ही यमुना नदी थी। उन्हें उस पार जाना था लेकिन कैसे? तभी चमत्कार हुआ। यमुना के जल ने भगवान के चरण छुए और फिर उसका जल दो हिस्सों में बंट गया और इस पार से उस पार रास्ता बन गया। कहते हैं कि वसुदेव कृष्ण को यमुना के उस पार गोकुल में अपने मित्र नंदगोप के यहां ले गए। वहां पर नंद की पत्नी यशोदा को भी एक कन्या उत्पन्न हुई थी। वसुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को ले गए। गोकुल मां यशोदा का मायका था और नंदगांव में उनका ससुराल। श्रीकृष्ण का लालन-पालन यशोदा व नंद ने किया।
 
 
दुनिया में ऐसे कई बालक हैं जिन्हें उनकी मां ने नहीं दूसरी मां ने पाल-पोसकर बड़ा किया। दुनिया में योगमाया की तरह ऐसी भी कई बालिकाएं हैं जिन्होंने किसी महान उद्देश्य के लिए खुद का बलिदान कर दिया और फिर वे जीवनभर कृष्‍ण जैसे भाई का साथ देती रहीं।
 
4. चौथा रहस्य : 
जब कंस को पता चला कि छलपूर्वक वसुदेव और देवकी ने अपने पुत्र को कहीं ओर भेज दिया है तो उसने तुरंत चारों दिशाओं में अपने अनुचरों को भेज दिया और कह दिया कि अमुक-अमुक समय पर जितने भी बालकों का जन्म हुआ हो उनका वध कर दिया जाए।

पहली बार में ही कंस के अनुचरों को पता चल गया कि हो न हो वह बालक यमुना के उस पार ही छोड़ा गया है। उस बालक को मारने के लिए पूतना नामक राक्षसनी को भेजा जाता है लेकिन श्रीकृष्‍ण ने पूतना को नंदबाबा के घर से कुछ दूरी पर ही अपनी माया से मार दिया। इसके बाद नंदगांव में कंस का आतंक बढ़ने लगा तो नंदबाबा ने वहां से पलायन कर दिया।
 
 
कृष्ण के जन्म के बाद उनको मारने की बहुत तरह की घटनाएं आती हैं, लेकिन वे सबसे बचकर निकल जाते हैं। जो भी उन्हें मारने आता है, वही मर जाता है। कहना चाहिए कि मौत हारकर लौट जाती है। जिस व्यक्ति में जीने की तमन्ना है और जो मौत से नहीं डरता है वही जिंदगी को सुंदर बना सकता है।
 
5. पांचवां रहस्य :
कहते हैं कि श्रीकृष्ण के जन्म के समय छह ग्रह उच्च के थे। उनकी कुण्‍डली में लग्न में वृषभ राशि थी जिसमें चंद्र ग्रह था। चौथे भाव में सिंह राशि थी जिसमें सूर्य विराजमान थे। पांचवें भाव में कन्या राशि में बुध विराजमान थे। छठे भाव की तुला राशि में शनि और शुक्र ग्रह थे। नौवें अर्थात भाग्य स्थान पर मकर राशि थी जिसमें मंगल ग्रह उच्च के होकर विराजमान थे। 11वें भाव में मीन राशि के गुरु उच्च के होकर विराजमान थे।

हालांकि कई विद्वान उनकी कुण्‍डली के ग्रहों की स्थिति को इससे अलग भी बताते हैं। कुछ के अनुसार केतु लग्न में था तो कुछ के अनुसार छठे भाव में।
 
 
श्रीकृष्‍ण की जन्‍म कुण्‍डली को लेकर कई भेद हैं, लेकिन यह गणितीय स्थिति अब तक सर्वार्थ शुद्ध उपलब्‍ध है। इसके कई प्रमाण हमें मिलते हैं। श्रीमद्भागवत की अन्वितार्थ प्रकाशिका टीका में दशम स्‍कन्‍ध के तृतीय अध्‍याय की व्‍याख्‍या में पंडित गंगासहाय ने ख्‍माणिक्‍य ज्‍योतिष ग्रंथ के आधार पर लिखा है कि…
 
''उच्‍चास्‍था: शशिभौमचान्द्रिशनयो लग्‍नं वृषो लाभगो जीव: सिंहतुलालिषुक्रमवशात्‍पूषोशनोराहव:।' 
नैशीथ: समयोष्‍टमी बुधदिनं ब्रह्मर्क्षमत्र क्षणे श्रीकृष्‍णाभिधमम्‍बुजेक्षणमभूदावि: परं ब्रह्म तत्।।''

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

Show comments

सभी देखें

गुप्त नवरात्रि में ये मंत्र जप लिया तो तुरंत ही दूर होंगे संकट और माता का मिलेगा आशीर्वाद

गुंडिचा मंदिर क्यों है जगन्नाथ रथयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव? जानिए 5 खास बातें

भगवान जगन्नाथ की मौसी कौन हैं? जानिए रथयात्रा से जुड़ी यह रोचक परंपरा

गीता के छठे अध्याय के 10वें श्लोक की सही व्याख्या क्या है? मौलाना जरजिस अंसारी के दावे की पड़ताल

पुरी के जगन्नाथ मंदिर और रथयात्रा का इतिहास: कब, कैसे और क्यों हुई शुरुआत?

सभी देखें

आस्था की विजय: जब पंढरपुर में एक बालक के रक्षक बने स्वयं विट्ठल

क्यों 4 महीने की योगनिद्रा में जाते हैं भगवान विष्णु? देवशयनी एकादशी पर जानें योगनिद्रा का रहस्य और विधि

Devshayani Ekadashi Katha: देवशयनी/ हरिशयनी एकादशी की व्रत कथा

Weekly Numerology Horoscope: साप्ताहिक अंक भविष्यफल (27 जुलाई से 2 अगस्त 2026): जानें आपके मूलांक का सटीक राशिफल

Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी से शुरू होंगे चातुर्मास, 4 महीने के लिए लग जाएगी मंगल कार्यों पर रोक

अगला लेख