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नारी शक्ति का अधिकार और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी

मध्यप्रदेश की लोकस्वास्थ्य यांत्रिकीय मंत्री संपतिया उइके का आलेख

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026 (09:26 IST)
भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता है। एक ऐसी महिला, जिसने अपने जीवन में अभाव, संघर्ष और सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए सार्वजनिक जीवन में स्थान बनाया हो, वह भली-भांति समझ सकती है कि अवसर मिलने पर महिलाएं समाज को किस दिशा में ले जा सकती हैं।
 
आज जब देश में महिला आरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण पहल की जा रही है, तब यह आवश्यक है कि सभी पक्ष मिलकर इस विषय पर सकारात्मक और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाएं। यह देश की आधी आबादी की भागीदारी सुनिश्चित करने का सशक्त प्रयास है।
 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “नारी शक्ति वंदन” को 21वीं सदी का एक महत्वपूर्ण संकल्प बताया है। यह उस भारत की परिकल्पना है, जहां महिलाएं नीति निर्माण और नेतृत्व की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाएं और विकास की दिशा को सशक्त बनाएं।
 
महिला आरक्षण को लेकर सरकार द्वारा गंभीर और प्रतिबद्ध प्रयास किए गए हैं, जिससे महिलाओं की भागीदारी को संस्थागत स्वरूप दिया जा सके। इस दिशा में आवश्यक प्रक्रियाएं भी आगे बढ़ाई गईं, लेकिन सभी पक्षा की सहमति के अभाव में यह पहल अपने अपेक्षित परिणाम तक नहीं पहुंच सकी। यह विषय इतना महत्वपूर्ण है कि इसे सभी पक्षों के सहयोग और सकारात्मक सहभागिता के साथ आगे बढ़ाया जाना आवश्यक है, ताकि देश की आधी आबादी को उनका उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
 
महिला आरक्षण का 33 प्रतिशत प्रावधान केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना को संतुलित करने का एक सशक्त माध्यम है। इससे महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी मिलेगी, नीति निर्माण में संवेदनशीलता बढ़ेगी और समाज के विभिन्न वर्गों की आवाज को उचित मंच प्राप्त होगा। विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की महिलाओं के लिए यह अवसर अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
 
अनुभव यह दर्शाते हैं कि जब महिलाओं को अवसर मिलता है, तो वे समाज में व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन लाने में सक्षम होती हैं। ग्राम पंचायत से लेकर विभिन्न स्तरों तक, महिलाओं ने अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रभावी परिचय दिया है। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से भी महिलाओं ने आर्थिक और सामाजिक बदलाव को नई दिशा दी है, जो नारी सशक्तिकरण का सशक्त उदाहरण है।
 
यह आवश्यक है कि महिला सशक्तिकरण के इस प्रयास को सभी के सहयोग और समन्वय से आगे बढ़ाया जाए। यह किसी एक पक्ष का नहीं, बल्कि पूरे समाज का विषय है और इसमें सामूहिक प्रतिबद्धता ही सफलता का आधार बनेगी।
 
आज भारत की महिलाएं जागरूक हैं, आत्मनिर्भर हैं और अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं। उनकी यह बढ़ती भागीदारी देश के विकास को नई गति दे रही है और आने वाले समय में यह परिवर्तन और अधिक व्यापक रूप में दिखाई देगा।
 
नारी सशक्तिकरण का यह अभियान केवल एक पहल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक और लोकतांत्रिक भविष्य को सशक्त बनाने की दिशा में एक सतत और दूरदर्शी प्रयास है।
 
 
 

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