एक जीत जिसने श्याम होलानी को दी थी बड़ी पहचान

स्मृति शेष : भाजपा के दिग्गज कैलाश जोशी को दी थी चुनाव में शिकस्त

Author कुंवर राजेन्द्रपालसिंह सेंगर| पुनः संशोधित सोमवार, 11 जनवरी 2021 (22:05 IST)
बागली (देवास)। मध्यप्रदेश के गठन के साथ ही बागली विधानसभा का इतिहास कुछ इस प्रकार का रहा है कि अंगुली पर गिने जाने वाले लोगों के नाम ही बागली विधानसभा का पूर्व विधायक कहे जाने का खिताब हिस्से आया है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के दिवंगत उपाध्यक्ष श्याम होलानी उन चुनिंदा लोगों में से एक थे। वे जाति से माहेश्वरी थे, लेकिन उनके कार्य और विचार क्षत्रियों के थे। पूर्व ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष एवं अधिवक्ता राजेन्द्रकुमार ईनाणी बताते हैं कि मध्यप्रदेश के नगरीय निकायों में प्रशासक काले से पूर्व 1970 के दशक में बागली विधानसभा के सतवास सेक्टर में दो ग्राम पंचायतें लोहारदा और कांटाफोड़ हुआ करती थीं।
उस समय इन दोनों ग्राम पंचायतों को नगर निकाय में तब्दील किया गया था। चूंकि दोनों नई नगर पंचायतें थीं तो 11 सदस्यीय एडहॉक कमेटी गठित की गई थी और उसने कांटाफोड़ नगर पंचायत अध्यक्ष के पद पर युवा व्यापारी एवं उद्योगपति श्याम होलानी को मनोनीय किया था।

होलानी के राजनीतिक जीवन की सबसे बडी उपलब्धि थी राजनीति के संत पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कैलाशचंद्र जोशी को पराजय का पहला स्वाद चखाना। होलानी ने बागली विधानसभा का चुनाव तीसरे प्रयास में वर्ष 1998 में जीता था। इसी से वे देश के राष्ट्रीय पटल पर छा गए थे। उन्हें घर-घर में पहचाना जाने लगा था और बड़े-बड़े कद्दावर नेता उनसे मिलना चाहते थे कि वो कौनसा श्याम होलानी है जिसने जोशीजी को पराजित कर दिया।
पूर्व कांग्रेस जिला उपाध्यक्ष कमल सोनी ने बताया कि जीत के बाद तत्कालीन ब्लाक अध्यक्ष ईनाणी और होलानीजी के साथ तत्कालीन सीएम दिग्गी राजा से मिलने जाना हुआ। दिग्गी राजा ने ईनाणीजी का हाथ पकड़ा और कहा कि आखिर श्याम को जितवा ही लिया तुम लोगों ने। उसके बाद तो दिग्गी राजा हम लोगों का हाथ पकड़कर पूरे समय जनता से मिलते रहे।

इसी तरह होलानीजी ने एक छोटे से गांव के कांग्रेस कार्यकर्ता आजादसिंह बावरा को युवक कांग्रस जिला अध्यक्ष बनवा दिया था। जबकि उस समय राष्ट्रीय अध्यक्ष मनिंदरजीत सिंह बिट्‍टा के सामने जिले के कई नेता बस भर-भरकर दिल्ली दावेदारी करने पहुंचे थे।
वो करिश्माई जीत : होलानी ने अपने जीवन में 5 विधानसभा चुनाव लड़े और जीता केवल एक, लेकिन उनकी एक जीत का करिश्मा ही उन्हें ताउम्र की पहचान दे गया। उसके बाद वे देवास जिले में कांग्रेस की पहचान बने। एक पत्रकार के तौर पर उनके दबंग व्यक्तित्व की पहचान इंदौर-बैतूल राष्ट्रीय राजमार्ग पर पूर्व सरपंच रूगनाथसिंह चैहान के नेतृत्व में आयोजित एक धरने के दौरान हुई।

तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार तत्कालीन एसडीएम बागली को धरना स्थल पर पहुंचकर ज्ञापन लेना था। लेकिन वे समय से नहीं पहुंचीं और उन्होंने अपने स्थान पर तत्कालीन बागली तहसीलदार आरएल सोनिस को ज्ञापन लेने के लिए भेज दिया। होलानीजी एकदम से भड़क गए और उन्होंने कह दिया ये कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता हैं। ये आंदोलन कर रहे हैं और आप देरी से पहुंचे हैं।
उन्होंने आंदोलन को चक्काजाम का रूप दे दिया और सारे कांग्रेस कार्यकर्ता और पदाधिकारी सड़क पर जाकर बैठ गए। तहसीलदार सोनिस को माफी मांगनी पड़ी तब जाकर उन्होंने चक्का जाम समाप्त किया और ज्ञापन दिया।

होलानी जब शैशव अवस्था में ही थे तब भाजपा से पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कैलाशचंद्र जोशी लगातार बागली विधानसभा का मध्ययप्रदेश विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उस समय जोशीजी ने अपने सभी कांग्रेसी समकालीन स्थापित प्रतिद्वंदियों को एक के बाद एक पराजित किया था। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह से नजदीकियों के चलते वर्ष 1990 के विधानसभा चुनावों में अपेक्षाकृत नए नवेले युवा श्याम होलानी को कांग्रेस ने टिकट दिया, लेकिन होलानी भी जोशी का तिलिस्म तोडने में कामयाब नहीं हुए और 13 हजार 396 मतों के बड़े अंतर से पराजित हुए।
वर्ष 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा विंध्वस हुआ, दंगे भड़के और तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने मध्यप्रदेश सहित चार राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया। वर्ष 1993 में फिर से चुनाव हुए। इस दौरान लगातार सात विधानसभा चुनाव जीत चूके पूर्व मुख्यमंत्री जोशी फिर से जीते लेकिन इस बार जीत का अंतर केवल 401 मत था और सामने थे उनसे कहीं अधिक युवा और राजनीति में एक चुनाव पुराने होलानी।
बहरहाल प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह की सरकार बनी और व्यस्तता कुछ ऐसी रही कि वे प्रचार में सभा के लिए बागली नहीं आ सके थे तो उन्होंने कह दिया था कि मंत्रिमंडल बाद में गठित होगा, लेकिन होलानी को लाल बत्ती पहले मिलेगी। इसीलिए होलानी को राज्यमंत्री का दर्जा देकर भंडारगृह निगम का अध्यक्ष बनाया गया।

यहीं से होलानी को प्रदेश में पहचाना जाने लगा क्योंकि राजनीति के संत जोशीजी उस स्थिति में आ चूके थे कि उनसे हारने वाले को भी पहचान मिल जाती थी। भंडारगृह निगम का अध्यक्ष बनने के बाद होलानी ने कार्यकर्ता को मध्य पैठ कायम की और वर्ष 1998 के विधानसभा चुनावों में पूर्व सीएम जोशीजी को हार का स्वाद चखना पड़ा। होलानी ने उन्हें 6665 मतों से पराजित कर दिया।

यह जोशीजी के करियर की पहली हार थी और इसके बाद से ही वे विधानसभा चुनावों से विमुख हो गए। उनके उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हुई जो कि उनके पुत्र दीपक जोशी पर खत्म हुई। हालांकि जोशी भोपाल में रहते हुए छात्रसंघ की राजनीति कर चुके थे, लेकिन इस दौरान वे व्यापार में हाथ आजमा रहे थे। लेकिन कहीं ना कहीं यह तय हो गया था कि अब वे ही अपने पिता की हार का हिसाब लेंगे। इसलिए भाजयुमो प्रदेश उपाध्यक्ष के पद से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई।
होशंगाबाद संभाग का प्रभार उन्हें दिया गया और केवल रविवार को मिली छुट्‍टी में वे बागली विधानसभा का दौरा करते थे। इस दौरान केन्द्र में भारत रत्न अटलजी की सरकार थी और उनके कैबिनेट मंत्री जोएल ओराम का बागली विधानसभा के पुंजापुरा में कार्यक्रम था। इस दौरान दीपक जोशी संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है के नारे लगे और भाजपा को बागली में जोशीजी का उत्तराधिकारी मिला।

वर्ष 2003 में होलानी और दीपक में चुनावी भिड़ंत हुई और दीपक जोशी ने अपने पिता की हार का बदला ब्याज के साथ लिया होलानी को 17 हजार 574 मतों से पराजित होना पड़ा। होलानी ने इस हार के ठीक 10 साल बाद खातेगांव से फिर किस्मत आजमाई, लेकिन वर्ष 1998 का करिश्मा वे दोहरा नहीं सके और 21 हजार 717 मतों से अपनी तुलना में बहुत अधिक युवा आशीष शर्मा से हारना पड़ा।



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