शिक्षा पर सियासत
भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो वह शिक्षा के क्षेत्र में फिर से अपनी पुरानी नीति चलाएगी क्योंकि उसने कांग्रेस की वर्तमान शिक्षा नीति को बदलने की बात कही है। शिक्षा के निजीकरण के मामले में दोनों पार्टियों की सोच एक जैसी है जबकि वामदलों ने अपने घोषणा पत्र में इसका विरोध किया है।
भाजपा पर आरोप लगता रहा है कि उसने केन्द्र में अपने शासनकाल में शिक्षा का 'भगवाकरण' किया। इस बार पार्टी ने वर्तमान शिक्षा नीति को बदलने की बात अपने घोषणा पत्र में की है जिससे यह कयास लगाया जा रहा है कि वह फिर पुरानी राह पर चलेगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्कूल की सारी पाठ्यपुस्तक सामग्री को एक राष्ट्रीय संस्था के तहत लाने का निर्णय लिया है, भले ही स्कूल की स्थापना किसी संप्रदाय ने की हो।
शिक्षा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सवाल पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने चुनावी घोषणा पत्रों में चुप्पी साधे हुए हैं जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने इसका खुलकर विरोध किया है। केवल शिक्षा का बजट सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत किए जाने पर तीनों पार्टियाँ एकमत दिखती हैं। कांग्रेस ने दलितों तथा आदिवासी छात्रों को मुफ्त शिक्षा देने की बात कही है।
शिक्षा आयोग गठित करने और रैगिंग की रोकथाम के लिए कानून बनाने का जिक्र केवल भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में किया। कांग्रेस और भाजपा के घोषणा पत्र में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक का जिक्र नहीं है। वैसे कांग्रेस के शासनकाल में ही यह विधेयक बना जो राज्यसभा में लंबित है। माकपा ने अपने घोषणा पत्र में इस विधेयक को पारित कराने की बात कही है।
विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक के बारे में भी भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में कोई जिक्र नहीं किया है। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में इस विधेयक को तैयार किया पर वामदलों के विरोध के कारण वह इसे संसद में पेश नहीं कर पाई। माकपा ने अपने घोषणा पत्र में इस विधेयक को खत्म करने की बात कही है।
भाजपा पर आरोप लगता रहा है कि उसने केन्द्र में अपने शासनकाल में शिक्षा का 'भगवाकरण' किया। इस बार पार्टी ने वर्तमान शिक्षा नीति को बदलने की बात अपने घोषणा पत्र में की है जिससे यह कयास लगाया जा रहा है कि वह फिर पुरानी राह पर चलेगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्कूल की सारी पाठ्यपुस्तक सामग्री को एक राष्ट्रीय संस्था के तहत लाने का निर्णय लिया है, भले ही स्कूल की स्थापना किसी संप्रदाय ने की हो।
शिक्षा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सवाल पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने चुनावी घोषणा पत्रों में चुप्पी साधे हुए हैं जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने इसका खुलकर विरोध किया है। केवल शिक्षा का बजट सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत किए जाने पर तीनों पार्टियाँ एकमत दिखती हैं। कांग्रेस ने दलितों तथा आदिवासी छात्रों को मुफ्त शिक्षा देने की बात कही है।
शिक्षा आयोग गठित करने और रैगिंग की रोकथाम के लिए कानून बनाने का जिक्र केवल भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में किया। कांग्रेस और भाजपा के घोषणा पत्र में मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक का जिक्र नहीं है। वैसे कांग्रेस के शासनकाल में ही यह विधेयक बना जो राज्यसभा में लंबित है। माकपा ने अपने घोषणा पत्र में इस विधेयक को पारित कराने की बात कही है।
विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक के बारे में भी भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में कोई जिक्र नहीं किया है। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में इस विधेयक को तैयार किया पर वामदलों के विरोध के कारण वह इसे संसद में पेश नहीं कर पाई। माकपा ने अपने घोषणा पत्र में इस विधेयक को खत्म करने की बात कही है।
