भाजपा के लाल या लड़ाके
भाजपा के तेजतर्रार रणनीतिकार व महासचिव अरुण जेटली और टेंट मालिक सुधांशु मित्तल में कुछ बातें एक जैसी हैं तो कुछ एकदम उल्टी। जेटली आज मित्तल को पार्टी में जिम्मेदारी देने पर नाराज हैं। दोनों में समान बात यह है कि दोनों ही दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। दोनों ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता रहे हैं।
जेटली इमरजेंसी में जेल गए थे पर मित्तल ऐसे पचड़ों में नहीं पड़े। दोनों ही अपनी पार्टी लाइन तोड़ते रहे हैं। जेटली वकील होने के नाते भाजपा के विरोधी रहे लोगों के भी मुकदमे लड़ते रहे हैं तो मित्तल किसी के लिए टेंट गाड़ देते हैं। ये दोनों का बिजनेस है । जेटली अपनी ही राज्य सरकारों के खिलाफ मुकदमों की पैरवी करते रहे हैं। मित्तल कांग्रेसी नेताओं के लिए भी काम करते रहे हैं। एक समान बात और है दोनों अच्छे रणनीतिकार माने जाते हैं। राजस्थान विधानसभा के 2003 में हुए चुनाव में दोनों ने अलग-अलग रहते हुए वसुंधरा की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दोनों में एक बात और समान है, वह यह कि दोनों ही दिल्ली में रहते हैं पर दिल्ली की राजनीति से कोई लेनादेना नहीं। एक बात और बराबर है कि दोनों ही घाटे का सौदा नहीं करते। यह बात भी समान है कि दोनों को विरासत में व्यवसाय मिला। एक को वकालत तो दूसरे को टेंट का काम। जेटली की खास बात यह है कि दो करोड़ रुपए महीने वकालत से कमाकर टैक्स भी पूरा जमा करते हैं।
सुधांशु कितना टैक्स देते हैं यह पता नहीं। सुधांशु के पास संपत्ति कहां से आई, इसे लेकर तरह-तरह की चर्चा है। चर्चा दूसरे दलों के नेताओं से जेटली की नजदीकियों को लेकर भी है। एक बात और, जेटली के लिए उनके दोस्त खुलकर बोलने को तैयार हैं पर मित्तल के दोस्त बोलते तो हैं पर सामने आने को तैयार नहीं। दोनों के बारे में बता रहे हैं मेट्रो संपादक रासबिहारी
तोल-बोल का मोल : अरुण जेटली खानदानी वकील हैं। दादा और पिता वकील रहे। वह वकील इतने अच्छे हैं कि पक्ष-विपक्ष में दोनों में समान रूप से बोल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय के तेजतर्रार छात्र नेता रहे हैं। वादविवाद में उनका पहले भी कोई मुकाबला नहीं था।
दिल्ली भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक सुरेन्द्रपाल रातावाल बताते हैं कि 1972-73 में पहली बार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में परचम फहराया था। जेटली श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स के छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। रातावाल भी किरोड़ीमल कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने बताया कि जेटली की छवि बहुत सौम्य और अच्छे वक्ता की थी।
28 दिसंबर 1952 में जन्मे जेटली के परिवार में पत्नी संगीता और दो बच्चे हैं। जेटली विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के दौरान अतिरिक्त सालिसीटर जनरल रहे। यहीं से उन्हें लगातार सफलता मिलती रही। 1991 में पहली बार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। केंद्र में सूचना और प्रसारण मंत्री रहे। सन 2000 में राज्यसभा के सदस्य चुने गए। इसके बाद कानून और न्याय मंत्रालय संभाला। साथ ही कंपनी कानून मंत्री भी रहे। कई राज्यों के प्रभारी रहे और उन्हें एक सफल रणनीतिकार के रूप में जाना जाता है। कई राज्य विधानसभाओं में पार्टी को विजय दिलाने के बाद दिल्ली में ही हार का सामना करना पड़ा।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव और राज्यसभा सदस्य बलवीर पुंज कहते हैं कि जेटली शुरू से तेजतर्रार नेता रहे हैं। नेतृत्व करने का गुण उनको खास बनाता है। जोरदार और स्पष्ट तौर पर पक्ष रखना उनकी आदत रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के दौरान अशोक टंडन, राजकुमार भाटिया, कौशिक और जेटली की चौकड़ी थी। इस चौकड़ी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में भगवा फहराया। सन 74 में जेटली दिविवि छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। इमरजेंसी लगने के बाद 19 महीने जेल में रहे। पुलिस ने उनके साथ सख्ती भी की। पिता महाराज कृष्ण जेटली भी जाने-माने वकील रहे हैं। उनके साथ छात्रसंघ के सचिव रहे हेमंत कुमार बताते हैं कि घर में कार होने के बावजूद जेटली बस से आते-जाते थे।
जेटली के करीबी लोगों का कहना है कि उनके मन में एक टीस हमेशा रही कि उन्हें दिल्ली में भाजपा की तिकड़ी ने स्थानीय राजनीति में नहीं जमने दिया। अपनी वकालत, तर्क रखने की क्षमता और कागजात तैयार करने में महारत ने उन्हें अटल विहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का करीबी बना दिया। यही गुण उनके आगे बढ़ने में सहायक बना। जेटली ने अपने कई साथियों को भी निपटाया। कहते हैं कि जेटली जो भी करते हैं बहुत-सोच समझकर करते हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने प्रचार की जिम्मेदारी तो ली पर मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं बने। इस वक्त उन्होंने सुधांशु मित्तल पर निशाना साधा है तो कोई गहरा राज ही होगा। इतना खुलकर वह कभी नहीं खेलते हैं। मदनलाल खुराना और विजय कुमार मल्होत्रा जब उन्हें काटते तब भी वह खुला विरोध नहीं जताते थे। वह हमेशा मौके का इंतजार करते हैं।
फायदे की विचारधारा : भाजपा के तेजतर्रार नेता रहे प्रमोद महाजन के खासमखास सुधांशु मित्तल दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष तो रहे पर पार्टी में उन्हें कोई पद नहीं मिला। जो भी काम मिलता, करते रहे। नहीं भी मिला तब भी करते रहे। अब पार्टी में कोई जिम्मेदारी मिली है तो हायतौबा मची हुई है। कहा जाता है कि सुधांशु दोस्तों के दोस्त हैं और यारी निभाना उनकी आदत रही है। आज कोई दोस्त खुलकर साथ नहीं है, यह अलग बात है। भाजपा में उनके आलोचक ज्यादा और प्रशंसक कम हैं। 18 सितंबर 1959 को जन्मे मित्तल की पत्नी रूबिना और दो बच्चे हैं।
विवादों में घिरे रहना भी शायद उनकी नियति है। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति के दौरान उनके साथी उनको घेरते रहते हैं। आज भी घेर रहे हैं। उनकी छवि एक नेता की कम और लॉयजन करके आगे बढ़ने की ज्यादा रही। लोग इसके लिए तरह-तरह की उपाधि देते हैं। लोग कहते हैं कि मित्तल फायदा देखकर ही आगे बढ़ते हैं। एक जमाने में मित्तल दिल्ली सदर से सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर के खास रहे थे। टाइटलर के जमाने में उनकी भी खूब चलती थी। उस दौरान उनका टेंट का धंधा भी खूब चला।
जहां भी जरूरत होती, उनका टेंट लगा दिया जाता। इतनी चलती थी कि इंडिया गेट के पास ही टेंट का सामान रखा रहता था। जब जरूरत हुई, टेंट मौजूद। 1989 में टाइटलर सदर से चुनाव हारे तो जीतने वाले विजय कुमार मल्होत्रा के नजदीकी बन गए। मल्होत्रा के बदौलत भी उनका धंधा खूब चला। फिर मल्होत्रा से भी दूरी बन गई। उन्होंने प्रमोद महाजन का दामन ऐसा थामा कि बस कमाल ही हो गया। संपत्ति बढ़ती रही। अशोक विहार का मकान छोड़कर फिरोजशाह रोड की आलीशान कोठी में आ गए। कोठी भी अंसल से खरीदी। जंतर-मंतर रोड पर एक शानदार दफ्तर पहले से ही है।
मित्तल एक जमाने में भाजपा महासचिव विजय गोयल के खास दोस्त थे। उनके खेमे में तुलसीराम अग्रवाल, रमेश बिधूड़ी, आरती मेहरा, विजेन्द्र गुप्ता समेत कई लोग थे। रमेश विधायक, आरती मेहरा मेयर और विजेन्द्र निगम स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं। विजय गोयल को पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ाने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही।
राज्यसभा का चुनाव उत्तर प्रदेश से लड़ने गए तो माफिया मुख्तार अंसारी की मदद ली। उस समय चुनाव जीतने के लिए धन और बाहुबल का खूब खेल हुआ पर जीत नहीं पाए। प्रमोद महाजन की हत्या के बाद बेटे राहुल महाजन के ड्रग लेने के मामले में भी उनके ऊपर तमाम तरह के आरोप लगे। राहुल को बचाने का आरोप भी लगा। कहा जाता है कि महाजन की बदौलत भी उन्हें खूब दौलत मिली। एक कारपोरेट घराने ने भी उन्हें खूब मालामाल किया।
मित्तल खुद को भाजपा की विचारधारा से जुड़ा बताते हैं पर उनके आलोचक कहते हैं कि उनका ध्यान हमेशा मुनाफा कमाने पर रहता है। राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने पैसे का ही काम संभाला। पैसा और प्रचार का काम संभालना वह पसंद करते हैं। प्रमोद महाजन के समय मित्तल बाकी नेताओं को गांठते नहीं थे। अब उन्होंने राजनाथ सिंह को साध लिया है।
(नईदुनिया)
जेटली इमरजेंसी में जेल गए थे पर मित्तल ऐसे पचड़ों में नहीं पड़े। दोनों ही अपनी पार्टी लाइन तोड़ते रहे हैं। जेटली वकील होने के नाते भाजपा के विरोधी रहे लोगों के भी मुकदमे लड़ते रहे हैं तो मित्तल किसी के लिए टेंट गाड़ देते हैं। ये दोनों का बिजनेस है । जेटली अपनी ही राज्य सरकारों के खिलाफ मुकदमों की पैरवी करते रहे हैं। मित्तल कांग्रेसी नेताओं के लिए भी काम करते रहे हैं। एक समान बात और है दोनों अच्छे रणनीतिकार माने जाते हैं। राजस्थान विधानसभा के 2003 में हुए चुनाव में दोनों ने अलग-अलग रहते हुए वसुंधरा की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दोनों में एक बात और समान है, वह यह कि दोनों ही दिल्ली में रहते हैं पर दिल्ली की राजनीति से कोई लेनादेना नहीं। एक बात और बराबर है कि दोनों ही घाटे का सौदा नहीं करते। यह बात भी समान है कि दोनों को विरासत में व्यवसाय मिला। एक को वकालत तो दूसरे को टेंट का काम। जेटली की खास बात यह है कि दो करोड़ रुपए महीने वकालत से कमाकर टैक्स भी पूरा जमा करते हैं।
सुधांशु कितना टैक्स देते हैं यह पता नहीं। सुधांशु के पास संपत्ति कहां से आई, इसे लेकर तरह-तरह की चर्चा है। चर्चा दूसरे दलों के नेताओं से जेटली की नजदीकियों को लेकर भी है। एक बात और, जेटली के लिए उनके दोस्त खुलकर बोलने को तैयार हैं पर मित्तल के दोस्त बोलते तो हैं पर सामने आने को तैयार नहीं। दोनों के बारे में बता रहे हैं मेट्रो संपादक रासबिहारी
तोल-बोल का मोल : अरुण जेटली खानदानी वकील हैं। दादा और पिता वकील रहे। वह वकील इतने अच्छे हैं कि पक्ष-विपक्ष में दोनों में समान रूप से बोल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय के तेजतर्रार छात्र नेता रहे हैं। वादविवाद में उनका पहले भी कोई मुकाबला नहीं था।
दिल्ली भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक सुरेन्द्रपाल रातावाल बताते हैं कि 1972-73 में पहली बार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में परचम फहराया था। जेटली श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स के छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। रातावाल भी किरोड़ीमल कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने बताया कि जेटली की छवि बहुत सौम्य और अच्छे वक्ता की थी।
28 दिसंबर 1952 में जन्मे जेटली के परिवार में पत्नी संगीता और दो बच्चे हैं। जेटली विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के दौरान अतिरिक्त सालिसीटर जनरल रहे। यहीं से उन्हें लगातार सफलता मिलती रही। 1991 में पहली बार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। केंद्र में सूचना और प्रसारण मंत्री रहे। सन 2000 में राज्यसभा के सदस्य चुने गए। इसके बाद कानून और न्याय मंत्रालय संभाला। साथ ही कंपनी कानून मंत्री भी रहे। कई राज्यों के प्रभारी रहे और उन्हें एक सफल रणनीतिकार के रूप में जाना जाता है। कई राज्य विधानसभाओं में पार्टी को विजय दिलाने के बाद दिल्ली में ही हार का सामना करना पड़ा।
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव और राज्यसभा सदस्य बलवीर पुंज कहते हैं कि जेटली शुरू से तेजतर्रार नेता रहे हैं। नेतृत्व करने का गुण उनको खास बनाता है। जोरदार और स्पष्ट तौर पर पक्ष रखना उनकी आदत रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के दौरान अशोक टंडन, राजकुमार भाटिया, कौशिक और जेटली की चौकड़ी थी। इस चौकड़ी ने दिल्ली विश्वविद्यालय में भगवा फहराया। सन 74 में जेटली दिविवि छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। इमरजेंसी लगने के बाद 19 महीने जेल में रहे। पुलिस ने उनके साथ सख्ती भी की। पिता महाराज कृष्ण जेटली भी जाने-माने वकील रहे हैं। उनके साथ छात्रसंघ के सचिव रहे हेमंत कुमार बताते हैं कि घर में कार होने के बावजूद जेटली बस से आते-जाते थे।
जेटली के करीबी लोगों का कहना है कि उनके मन में एक टीस हमेशा रही कि उन्हें दिल्ली में भाजपा की तिकड़ी ने स्थानीय राजनीति में नहीं जमने दिया। अपनी वकालत, तर्क रखने की क्षमता और कागजात तैयार करने में महारत ने उन्हें अटल विहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी का करीबी बना दिया। यही गुण उनके आगे बढ़ने में सहायक बना। जेटली ने अपने कई साथियों को भी निपटाया। कहते हैं कि जेटली जो भी करते हैं बहुत-सोच समझकर करते हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने प्रचार की जिम्मेदारी तो ली पर मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं बने। इस वक्त उन्होंने सुधांशु मित्तल पर निशाना साधा है तो कोई गहरा राज ही होगा। इतना खुलकर वह कभी नहीं खेलते हैं। मदनलाल खुराना और विजय कुमार मल्होत्रा जब उन्हें काटते तब भी वह खुला विरोध नहीं जताते थे। वह हमेशा मौके का इंतजार करते हैं।
फायदे की विचारधारा : भाजपा के तेजतर्रार नेता रहे प्रमोद महाजन के खासमखास सुधांशु मित्तल दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष तो रहे पर पार्टी में उन्हें कोई पद नहीं मिला। जो भी काम मिलता, करते रहे। नहीं भी मिला तब भी करते रहे। अब पार्टी में कोई जिम्मेदारी मिली है तो हायतौबा मची हुई है। कहा जाता है कि सुधांशु दोस्तों के दोस्त हैं और यारी निभाना उनकी आदत रही है। आज कोई दोस्त खुलकर साथ नहीं है, यह अलग बात है। भाजपा में उनके आलोचक ज्यादा और प्रशंसक कम हैं। 18 सितंबर 1959 को जन्मे मित्तल की पत्नी रूबिना और दो बच्चे हैं।
विवादों में घिरे रहना भी शायद उनकी नियति है। दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति के दौरान उनके साथी उनको घेरते रहते हैं। आज भी घेर रहे हैं। उनकी छवि एक नेता की कम और लॉयजन करके आगे बढ़ने की ज्यादा रही। लोग इसके लिए तरह-तरह की उपाधि देते हैं। लोग कहते हैं कि मित्तल फायदा देखकर ही आगे बढ़ते हैं। एक जमाने में मित्तल दिल्ली सदर से सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर के खास रहे थे। टाइटलर के जमाने में उनकी भी खूब चलती थी। उस दौरान उनका टेंट का धंधा भी खूब चला।
जहां भी जरूरत होती, उनका टेंट लगा दिया जाता। इतनी चलती थी कि इंडिया गेट के पास ही टेंट का सामान रखा रहता था। जब जरूरत हुई, टेंट मौजूद। 1989 में टाइटलर सदर से चुनाव हारे तो जीतने वाले विजय कुमार मल्होत्रा के नजदीकी बन गए। मल्होत्रा के बदौलत भी उनका धंधा खूब चला। फिर मल्होत्रा से भी दूरी बन गई। उन्होंने प्रमोद महाजन का दामन ऐसा थामा कि बस कमाल ही हो गया। संपत्ति बढ़ती रही। अशोक विहार का मकान छोड़कर फिरोजशाह रोड की आलीशान कोठी में आ गए। कोठी भी अंसल से खरीदी। जंतर-मंतर रोड पर एक शानदार दफ्तर पहले से ही है।
मित्तल एक जमाने में भाजपा महासचिव विजय गोयल के खास दोस्त थे। उनके खेमे में तुलसीराम अग्रवाल, रमेश बिधूड़ी, आरती मेहरा, विजेन्द्र गुप्ता समेत कई लोग थे। रमेश विधायक, आरती मेहरा मेयर और विजेन्द्र निगम स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं। विजय गोयल को पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ाने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही।
राज्यसभा का चुनाव उत्तर प्रदेश से लड़ने गए तो माफिया मुख्तार अंसारी की मदद ली। उस समय चुनाव जीतने के लिए धन और बाहुबल का खूब खेल हुआ पर जीत नहीं पाए। प्रमोद महाजन की हत्या के बाद बेटे राहुल महाजन के ड्रग लेने के मामले में भी उनके ऊपर तमाम तरह के आरोप लगे। राहुल को बचाने का आरोप भी लगा। कहा जाता है कि महाजन की बदौलत भी उन्हें खूब दौलत मिली। एक कारपोरेट घराने ने भी उन्हें खूब मालामाल किया।
मित्तल खुद को भाजपा की विचारधारा से जुड़ा बताते हैं पर उनके आलोचक कहते हैं कि उनका ध्यान हमेशा मुनाफा कमाने पर रहता है। राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने पैसे का ही काम संभाला। पैसा और प्रचार का काम संभालना वह पसंद करते हैं। प्रमोद महाजन के समय मित्तल बाकी नेताओं को गांठते नहीं थे। अब उन्होंने राजनाथ सिंह को साध लिया है।
(नईदुनिया)
