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Lohri katha in hindi: लोहड़ी पर्व की प्राचीन और मध्यकाल की 3 कथाएं

Written By WD Feature Desk
Updated: सोमवार, 12 जनवरी 2026 (17:46 IST)
lohri katha in hindi kahani
Lohri katha in hindi: 'लोहड़ी' शब्द 'तिल+रोड़ी' शब्दों के मेल से बना है, जो समय के साथ बदलकर 'तिलोड़ी' और बाद में 'लोहड़ी' हो गया। पंजाब के कई इलाकों में इसे लोही या लोई भी कहा जाता है। मकर संक्रांति से जुड़ा एक पंजाब पर्व लोहड़ी मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व रात में मनाया जाता है। ईरान का प्राचीन पर्व चहारशंबे सूरी भी लोहड़ी की तरह का एक पर्व है जो नवरोज यानी ईरानी नववर्ष से पहले की रात को मनाया जाता है। लोहड़ी पर्व से कई तरह की कथा और कहानियां जुड़ी हुई है। 
 
लोहड़ी की कथा कहानी: 
पहली कथा (प्रह्लाद और होलिका): कुछ लोग इसे होलिका की बहन 'लोहिता' से जोड़ते हैं। माना जाता है कि लोहिता अग्नि में बच गई थी, इसलिए उनके नाम पर लोहड़ी मनाई जाती है।
 
दूसरी कथा (सती का त्याग): एक मान्यता यह भी है कि लोहड़ी की आग दक्ष प्रजापति के यज्ञ की उस अग्नि का प्रतीक है, जिसमें माता सती ने खुद को समर्पित किया था।
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तीसरी कथा (दुल्ला भट्टी की कहानी):
मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में पंजाब में दुल्ला भट्टी नाम के एक शख्स थे, जिन्हें 'पंजाब का नायक' माना जाता था। उस समय कुछ दुष्ट मुगल व्यापारी गरीब हिंदू लड़कियों को जबरन अमीर सौदागरों को बेच दिया करते थे।
 
बेटियों की रक्षा: दुल्ला भट्टी ने न केवल उन लड़कियों को मुगल व्यापारियों के चंगुल से छुड़ाया, बल्कि उनका कन्यादान भी खुद पिता बनकर किया।
 
सुंदरी और मुंदरी: ऐसी ही दो बहनें थीं- सुंदरी और मुंदरी। उनके पिता एक गरीब किसान थे और जमींदार उन पर बुरी नजर रखता था। दुल्ला भट्टी ने जंगल में आग जलाकर, उनके फेरे करवाकर उनकी शादी करवाई।
 
उपहार में शक्कर: क्योंकि उस समय उनके पास देने के लिए कुछ नहीं था, तो उन्होंने लड़कियों की झोली में सेर भर शक्कर डाल दी।
 
लोहड़ी गीत: यही कारण है कि आज भी लोहड़ी के गीतों में "सुंदर मुंदरिये हो, तेरा कौन बिचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो" गाकर उन्हें याद किया जाता है।
 
दुल्ला भट्टी मुगलों के समय का एक बहादुर योद्धा था जिसने मुगलों के बढ़ते जुल्म के खिलाफ कदम उठाया। कहा जाता है कि एक ब्राह्मण की 2 लड़कियों सुंदरी और मुंदरी के साथ इलाके का मुगल शासक जबरन शादी करना चाहता था, पर उन दोनों की सगाई कहीं और हुई थी और उस मुगल शासक के डर से उनके भावी ससुराल वाले शादी के लिए तैयार नहीं थे। इस मुसीबत की घड़ी में दुल्ला भट्टी ने ब्राह्मण की मदद की और लड़के वालों को मना कर एक जंगल में आग जलाकर सुंदरी और मुंदरी का ब्याह करवाया। दूल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहते हैं दूल्ले ने शगुन के रूप में उनको शकर दी थी। इसी कथा की हिमायत करता लोहड़ी का यह गीत है जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है-
 
सुंदर, मुंदरिये हो,
तेरा कौन विचारा हो,
दुल्ला भट्टी वाला हो,
दूल्ले धी (लड़की) व्याही हो,
सेर शक्कर पाई हो।
 
दुल्ला भट्टी की जुल्म के खिलाफ मानवता की सेवा को आज भी लोग याद करते हैं और उस रात को लोहड़ी के रूप में सत्य और साहस की जुल्म पर जीत के तौर पर मनाते हैं। इस त्योहार का सबंध फसल से भी है। इस समय गेहूं और सरसों की फसलें अपने यौवन पर होती हैं। खेतों में गेहूं, छोले और सरसों जैसी फसलें लहलहाती हैं।

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